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    होसबोले, धनखड़, शिवराज और हिमंत ने मोदी को BJP के संविधान में बदलाव करने की एक और वजह दी

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 1, 2025

    समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता ऐसे शब्द हैं जिन्हें भाजपा नेता न पूरी तरह अपनाना चाहते हैं और न ही खुले तौर पर नकार पा रहे हैं. इसी उलझन की वजह से पार्टी अब इन विचारों का अपना मतलब गढ़ने की कोशिश कर रही है और वह भी थोड़े अटपटे और बेतुके तरीके से.

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने बीजेपी नेताओं के बीच एक नई बहस शुरू कर दी है. पिछले हफ्ते उन्होंने मांग की कि संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के समय जोड़े गए ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की फिर से समीक्षा की जाए. हालांकि, उन्होंने अपनी बात बहुत सोच-समझकर रखी. उनका कहना था कि ये विचार सरकार की नीतियों का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन ये भारत के मूल संविधान में नहीं थे.

    होसबोले ने बताया कि जब संसद और न्यायपालिका पंगु हो गईं थी, न्यायपालिका कमजोर थी और लोगों के अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था, तब ये बदलाव किए गए थे.

    दिप्रिंट ने अपने संपादकीय में होसबोले की इस मांग का समर्थन किया. दिप्रिंट ने अपने 50 शब्दों के संपादकीय में लिखा, “अगर वैचारिक बहस को छोड़ भी दें, तो भी आपातकाल के दौर की उस संसद द्वारा किया गया संविधान संशोधन वैध नहीं कहा जा सकता.” दिप्रिंट ने ये भी कहा कि 42वें संविधान संशोधन के सभी बदलाव, सिर्फ ये दो शब्द नहीं, हटाए जाने चाहिए. इसमें खास जोर दिया गया कि वह संसद ‘नाजायज़’ थी.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि 42वें संशोधन से जो ‘मौलिक कर्तव्य’ जुड़े हैं, उन्हें निभाना हर नागरिक की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए.

    एक और उदाहरण के तौर पर, 42वें संशोधन के जरिए शिक्षा, जंगल, वजन-तौल, न्याय व्यवस्था और जंगली जानवरों की सुरक्षा जैसे पांच विषयों को राज्यों से लेकर समवर्ती सूची में डाल दिया गया था. अब राज्य चाहते हैं कि इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार उन्हें वापस मिल जाए.

    बीजेपी का संविधान बनाम भारत की प्रस्तावना

    उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और जितेंद्र सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस—सभी ने दत्तात्रेय होसबोले की उस मांग का समर्थन किया जिसमें उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की समीक्षा की बात कही थी. यह समर्थन समझा जा सकता है, क्योंकि होसबोले को संघ प्रमुख मोहन भागवत का संभावित उत्तराधिकारी माना जाता है. वैसे भी संघ परिवार में ये चर्चा तेज़ है कि सितंबर में जब भागवत 75 साल के होंगे, तो वे आगे क्या फैसला लेंगे.

    भागवत भी शायद बीजेपी नेताओं की इस उत्साही प्रतिक्रिया को गौर से देख रहे होंगे. हो सकता है वे सोच रहे हों, ‘‘जब मैं कहता हूं कि हिंदू और मुस्लिम का DNA एक है या हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने की ज़रूरत नहीं है, तब ये नेता इतना उत्साह क्यों नहीं दिखाते?’’

    लेकिन इन नेताओं की होसबोले के समर्थन में जोश में की गई बातें, खुद बीजेपी के अपने संविधान के खिलाफ चली जाती हैं. यहां धनखड़ को छोड़ दें, क्योंकि तकनीकी रूप से वे बीजेपी के सदस्य नहीं हैं, लेकिन सवाल ये है कि इतने बड़े बीजेपी नेताओं को अपने ही पार्टी के संविधान की बात याद क्यों नहीं रहती?

    बीजेपी के संविधान के अनुच्छेद II में, जो कि पहले पन्ने पर ही है, साफ लिखा है: “पार्टी सच्ची निष्ठा और विश्वास के साथ समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों का पालन करेगी…”

    अब सवाल यह है कि जब बीजेपी के नेता हम अपने संविधान के अनुसार समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता से प्रतिबद्ध हैं, तो वही लोग भारत के संविधान से इन शब्दों को हटाने की मांग कैसे कर सकते हैं?

    समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता ऐसे विचार हैं जिन्हें बीजेपी नेता न तो पूरी तरह अपना पा रहे हैं और न ही साफ तौर पर नकार पा रहे हैं. यही वजह है कि पार्टी ने इनकी अपनी-अपनी व्याख्या करने की कोशिश की है.

    बीजेपी के संविधान के अनुच्छेद IV में लिखा है: “पार्टी सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता यानी ‘सर्व धर्म समभाव’ के लिए प्रतिबद्ध रहेगी.”

    बीजेपी के ‘पंच निष्ठा’ यानी पांच मार्गदर्शक सिद्धांतों में से एक है: गांधीवादी समाजवाद, जिसे पार्टी ऐसे परिभाषित करती है — “एक ऐसा गांधीवादी नजरिया जो सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को इस तरह देखता है कि एक ऐसा समाज बने जो शोषण से मुक्त हो.”

    बीजेपी की आधिकारिक वेबसाइट के ‘हमारा दर्शन’ सेक्शन में लिखा है: “भारत की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता एक प्रमुख विचार रही है, लेकिन इसे इस कदर तोड़ा-मरोड़ा गया है कि अब इसका असली मतलब पहचानना मुश्किल है. पश्चिम में यह विचार चर्च और सरकार को अलग करने के लिए आया था, लेकिन भारत में न पहले कभी धर्म आधारित शासन था, न ही भविष्य में ऐसा संभव है. भारतीय संस्कृति का मतलब है – सभी धर्मों का समान आदर, यानी ‘सर्व पंथ समभाव’ या ‘पंथ निरपेक्षता’.”

    वेबसाइट आगे कहती है: “दुर्भाग्य से भारत में धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यकों को खुश करने का ज़रिया बना दिया गया और वो भी बहुसंख्यकों के हितों को नज़रअंदाज़ करके. इसी को लालकृष्ण आडवाणी ने ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ (Pseudo-Secularism) कहा था. जब हम ‘राम राज्य’ या ‘धर्म राज्य’ की बात करते हैं, तो हमारा मतलब होता है — संविधान के कानून पर आधारित एक नैतिक शासन. इसका किसी भी धर्म या पूजा पद्धति से कोई लेना-देना नहीं है.”

    ‘सच्ची धर्मनिरपेक्षता’

    अब ज़रा देखें कि प्रधानमंत्री मोदी धर्मनिरपेक्षता को लेकर क्या कहते हैं, खासकर जब उनकी सरकार अब तक की सबसे अधिक समाजवादी सरकारों में से एक मानी जा रही है.

    28 अप्रैल 2014 को मोदी ने ट्वीट किया: “हम धर्मनिरपेक्ष इसलिए नहीं हैं क्योंकि यह शब्द हमारे संविधान में जोड़ा गया. धर्मनिरपेक्षता हमारे खून में है. हम ‘सर्व पंथ समभाव’ में विश्वास करते हैं.”

    यह उस समय कहा गया था जब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे और 2024 में, प्रधानमंत्री बनने के एक दशक बाद, उन्होंने कहा: “मोदी गारंटी देता है कि योजनाओं के 100 प्रतिशत लाभ 100 प्रतिशत लाभार्थियों को मिलें. यही सच्चा सामाजिक न्याय है. यही सच्ची धर्मनिरपेक्षता है.”

    जितना आप बीजेपी नेताओं के ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ पर रुख को सुनते और पढ़ते हैं, उतना ही आप उलझन में पड़ते हैं कि उनकी असली सोच क्या है. दत्तात्रेय होसबोले की प्रस्तावना में बदलाव (या समीक्षा) की मांग, भले ही कई केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों का समर्थन पा जाए, लेकिन इसके आगे बढ़ने की संभावना कम है. सिर्फ इसलिए नहीं कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन बदलावों को सही ठहरा चुका है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के ज्यादातर घटक दल इसका समर्थन नहीं करेंगे. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), जो कि NDA का हिस्सा है, ने इस तरह की किसी भी कोशिश का पहले ही विरोध कर दिया है.

    जब तक प्रधानमंत्री मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर चुप्पी नहीं तोड़ते, तब तक यह बहस सिर्फ होसबोले और उनके करीबी RSS नेताओं तक सीमित रह जाएगी या उन तक, जो संघ नेतृत्व को खुश करना चाहते हैं, लेकिन मोदी और शाह को कम से कम बीजेपी के संविधान में संशोधन करने पर ज़रूर विचार करना चाहिए. सिर्फ इसलिए नहीं कि ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ को लेकर पार्टी की स्थिति को साफ किया जा सके (जो अब काफी उलझी हुई दिखती है), बल्कि इसलिए कि मोदी-शाह युग में बीजेपी का संविधान अब बेसुरा और अप्रासंगिक (irrelevant) दिखने लगा है.

    एक ताज़ा और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला उदाहरण लें. बीजेपी के संविधान में लिखा है: “कोई भी पद छह महीने से ज्यादा खाली नहीं रह सकता.” लेकिन पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद एक साल से खाली है. बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने जेपी नड्डा को जून 2024 तक विस्तार दिया था. इसके बाद न तो राष्ट्रीय परिषद, न कार्यकारिणी और न ही संसदीय बोर्ड ने उन्हें आगे का कोई विस्तार दिया. क्या यह हो सकता है कि संसदीय बोर्ड ने बैठक करके उनका कार्यकाल फिर बढ़ा दिया हो और किसी को पता ही न चला हो? ये अजीब लग सकता है, लेकिन मोदी-शाह की बीजेपी में कुछ भी मुमकिन है. अगर ऐसा हुआ भी हो, तो बीजेपी ने इसे औपचारिक रूप से घोषित क्यों नहीं किया? कम से कम जेपी नड्डा की छवि के लिए तो करना ही चाहिए था. नड्डा निश्चित तौर पर यह नहीं चाहेंगे कि वे एक अनाधिकृत राष्ट्रीय अध्यक्ष की तरह दिखें.

    यह भी संभव है कि मोदी और शाह ने मौखिक रूप से नड्डा से कहा हो कि जब तक नया अध्यक्ष तय नहीं होता, तब तक वे पद पर बने रहें—संघ से बातचीत होने तक. किसी को इससे आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आखिरकार, मोदी ही बीजेपी हैं और बीजेपी ही मोदी है. उन्होंने अपनी शक्तियों को शाह, अपने भरोसेमंद सहयोगी, को सौंप दिया है. बीजेपी का संविधान क्या कहता है, यह ज़्यादा मायने नहीं रखता.
    विजयी जोड़ी से ऊपर तो नहीं है, है ना?

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