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    बांग्लादेश में ‘भारत विरोधी’ भावनाओं को कौन भड़का रहा है?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldDecember 24, 2025

    मैं बांग्लादेश विजय दिवस के दो दिन बाद ही 18 दिसंबर की रात दो शीर्ष मीडिया और कुछ सांस्कृतिक संस्थानों पर भीड़ के अभूतपूर्व हमले की गवाह बनी.

    इंकलाब मंच के संयोजक और प्रवक्ता उस्मान हादी की मौत के बाद उत्तेजित भीड़ ने दो मीडिया संस्थानों- प्रथम आलो और द डेली स्टार के साथ ही छायानट भवन में हमले, तोड़फोड़ और आगजनी की.

    इन संस्थानों को ‘भारत के दलाल’ और ‘फ़ासीवादी के मित्र’ जैसे तमगे दिए गए हैं.

    विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने स्वाधीनता की लड़ाई में बांग्लादेश की सहायता ज़रूर की थी, लेकिन उसके बाद सीमावर्ती इलाकों में लोगों की हत्या, और पानी के बंटवारे के सवाल पर उसकी भूमिका या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगने के कारण बांग्लादेश में अक्सर भारत विरोधी भावनाएं सामने आती रही हैं.

    कइयों का मानना है कि बांग्लादेश की राजनीति में समय-समय पर भारत विरोधी भावनाओं का जो इस्तेमाल देखा जाता रहा है, ताज़ा हमले उसी की मिसाल हैं.

    विश्लेषकों का कहना है कि अंतरिम सरकार के 16 महीने के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति एक बड़ा मुद्दा रही है.

    अब चुनाव ही इस अस्थिर परिस्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है.

    कई राजनेताओं ने आशंका जताई है कि एक गुट आगामी चुनावों में गड़बड़ी पैदा करने के लिए भारत विरोधी भावना का इस्तेमाल करके हिंसा भड़का रहा

    बांग्लादेश में लंबे समय से विभिन्न वजहों से पनपने वाली भारत विरोधी भावना में बीते साल जुलाई के आंदोलन के बाद एक नया आयाम जुड़ गया.

    उस आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत अवामी लीग के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के राजनयिक संबंधों में तनाव पैदा हुआ.

    ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर काज़ी मारफूल इस्लाम कहते हैं, “लंबे समय से चले आ रहे आधिपत्य के खिलाफ एक सक्रिय प्रतिरोध तो हमेशा रहा है. इसके अलावा उसने (भारत सरकार ने) सत्ता गंवाने वाली सरकार का समर्थन भी किया है.”

    विश्लेषकों का कहना है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण के अनुरोध के बावजूद उनको वापस नहीं भेजने और उस्मान हादी की हत्या के बाद अभियुक्तों के भाग कर भारत जाने के सोशल मीडिया प्रचार ने दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों में तनाव और बढ़ा दिया है.

    हालांकि सरकार और प्रशासन ने कहा है कि अभियुक्तों के देश छोड़ कर जाने के बारे में कोई निश्चित सबूत नहीं मिले हैं.

    बांग्लादेश पुलिस के अतिरिक्त आईजी खांडेकर रफ़ीकुल इस्लाम ने रविवार को कहा, “हम अब तक इस बात की पुष्टि नहीं कर सके हैं कि अभियुक्तों ने सीमा पार की है या नहीं.”

    उसके अगले दिन सोमवार को गृह मंत्रालय के सलाहकार ने एक प्रेस कांफ़्रेंस में कहा, “अगर अभियुक्तों के ठिकाने के बारे में पक्की जानकारी होती तो उनको गिरफ़्तार कर लिया गया होता.”

    भारत विरोधी भावना के नाम पर हिंसा भड़काई जा रही है?

    मीडिया संस्थानों पर भीड़ के हमले की निंदा करते हुए सोमवार को संपादक परिषद, राजनेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने राजधानी ढाका में मानव श्रृंखला बनाई.

    इमेज स्रोत,अबू सुफियान ज्वेल / एएफ़पी वाया गेटी इमेजेस

    इमेज कैप्शन,मीडिया संस्थानों पर भीड़ के हमले की निंदा करते हुए सोमवार को संपादक परिषद, राजनेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने राजधानी ढाका में मानव श्रृंखला बनाई.

    विश्लेषकों का कहना है कि बांग्लादेश की राजनीति में भारत-विरोध के मुद्दे का समय-समय पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.

    हाल में मीडिया संस्थानों, सांस्कृतिक संगठन छायानट और धानमंडी-32 के आवास पर नए सिरे से तोड़फोड़ के दौरान भारत विरोधी नारे लगे थे. इन हमलों के दौरान जमात के अलावा छात्र संगठनों के नेता भी इन संस्थानों के खिलाफ बयान देते नज़र आए थे.

    बीते बृहस्पतिवार को उस्मान हादी की मौत की ख़बर फैलने के बाद स्वतस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए. उसके बाद आयोजित सभा में राजशाही विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष मोस्ताकुर रहमान ने कहा था, हम आज के इस कार्यक्रम से एलान करते हैं कि प्रथम आलो औऱ द डेली स्टार जैसे अख़बारों को बंद करवा देंगे.

    उसी दिन इस्लामी छात्र शिविर के जहांगीरनगर विश्वविद्यालय शाखा के सचिव मुस्तफिजुर रहमान ने कहा था, “राजनीतिक लड़ाई के ज़रिए बांग्लादेश की असली आज़ादी हासिल करना संभव नहीं है. हमारी लड़ाई शहीद उस्मान हादी के इंकलाब मंच की सांस्कृतिक लड़ाई से शुरू होगी. कल बाम, शाहबागी, छायानट और उदिची का विध्वंस कर देना होगा. उसके बाद ही बांग्लादेश को असली आज़ादी मिलेगी.”

    वामपंथियों को संक्षेप में बाम कहा जाता है जबकि शाहबागी शब्द 2013 में शाहबाग में हुए विरोध प्रदर्शन से निकला है. इसी तरह छायानट एक प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान है और उदिची देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन.

    मीडिया संस्थानों पर भीड़ के हमले की निंदा करते हुए सोमवार को संपादक परिषद, राजनेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने राजधानी ढाका में मानव श्रृंखला बनाई.

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,मीडिया संस्थानों पर भीड़ के हमले की निंदा करते हुए सोमवार को संपादक परिषद, राजनेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने राजधानी ढाका में मानव श्रृंखला बनाई.

    बीबीसी बांग्ला की ओर से संपर्क करने पर उन लोगों ने अपनी टिप्पणियों से इनकार तो नहीं किया. लेकिन उन्होंने अलग-अलग तरीकों से इसकी व्याख्या की है. उनका दावा है कि इस बयान के माध्यम से वो सांस्कृतिक संस्थानों की ओर से अवामी लीग को दी गई वैधता को ख़त्म करने और दोनों मीडिया संस्थानों के पक्षपातपूर्ण रवैए पर अंकुश लगाने की बात कर रहे थे.

    दूसरी ओर, इस्लामी छात्र शिविर ने दावा किया है कि नेताओं की ज़ुबान फिसलने के कारण की गई टिप्पणियों के कारण हमले का दोष संगठन के माथे मढ़ने की साज़िश रची जा रही है. संगठन ने ऐसी कोशिशों का कड़ा विरोध किया है.

    लेकिन सचिव परिषद के अध्यक्ष नुरूल कबीर कहते हैं, “धर्म आधारित राजनीति को मजबूत करने के इच्छुक गुटों के लिए भारत विरोधी नारे लगाना सुविधाजनक है. जुलाई आंदोलन के दौरान और उसके बाद भारत की ओर से जताई गई प्रतिक्रिया ने उसके ख़िलाफ़ नाराज़गी और बढ़ा दी है. अब हादी की मौत के बाद अपनी धर्म आधारित राजनीति को मजबूत करने के इच्छुक लोग या संगठन इस भावना को और नए सिरे से और ज़्यादा प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं.”

    वह कहते हैं, “जब इसी देश के लोगों का एक वर्ग लोकतांत्रिक संस्थानों को बर्बाद करने का प्रयास करता है तो भारत-विरोधी नारों की आड़ लेना उसके लिए सुविधाजनक है.”

    हिंसा में सरकार की मिलीभगत का आरोप

    प्रथम आलो और दे डेली स्टार ने आरोप लगाया है कि हमलावरों के मौके पर पहुंचने से पहले सरकार के शीर्ष स्तर पर मदद की गुहार लगाने के बावजूद उनको किसी तरह की सहायता नहीं मिली.

    प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सुरक्षा बलों के मौके पर पहुंचने के बावजूद उन्होंने भीड़ पर अंकुश लगाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. यही वजह है कि इस हिंसा और आगजनी के पीछे सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.

    न्यू एज के संपादक और संपादक परिषद के अध्यक्ष नुरुल कबीर

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,न्यू एज के संपादक और संपादक परिषद के अध्यक्ष नुरुल कबीर

    प्रोफ़ेसर काज़ी मारफूल इस्लाम कहते हैं, “दरअसल यह पूरी तरह अंतरिम सरकार की विफलता है. अब तक किसी भी संस्थान पर सरकार के नियंत्रण के सबूत नहीं मिले हैं. काफ़ी हद तक ऐसा लगता है कि यह अंतरिम सरकार संभवतः इस तमाम उकसावे और हिंसा को बढ़ावा दे रही है.”

    छायानट ने हमले की घटना में तीन सौ से ज्यादा अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत की है. प्रथम आलो और द डेली स्टार पर हुए हमले के मामले में कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

    हालांकि घटना वाले दिन सोशल मीडिया पर वायरल हुए कई वीडियो में से एक में एक सेना अधिकारी को हमलावरों का विरोध करने के बजाय उनसे बातचीत करते हुए देखा गया था. उस अधिकारी को इमारत में फंसे पत्रकारों को बचाने के लिए हमलावरों से बीस मिनट का समय मांगते हुए भी देखा गया था.

    नुरुल कबीर का कहना है कि सरकार के एक गुट के समर्थन के कारण ही हिंसा की ऐसी घटनाएं हो रही हैं.

    वह कहते हैं, “सत्ता में रहने वाली सरकार ने द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों में आगजनी के बाद इस मामले में हस्तक्षेप के लिए जो देरी की, वह पूरी तरह उसकी विफलता है. मैं तो कहूंगा कि सरकार, प्रशासन और मोहम्मद यूनुस सरकार के मंत्रिमंडल में निश्चित तौर पर ऐसे लोग हैं जो इन घटनाओं को होने देना चाहते थे.”

    नेशनल सिटीज़न पार्टी (एनसीपी) के संयोजक नाहिद इस्लाम ने भी यही आरोप लगाया है. इस पार्टी की कमान संभालने से पहले नाहिद करीब साढ़े सात महीने तक अंतरिम सरकार के सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं.

    अख़बार के संपादकों के संगठन संपादक परिषद और मालिकों के संगठन न्यूज़पेपर ओनर्स एसोसिएशन की पहल पर सोमवार को आयोजित संयुक्त विरोध सभा में नाहिद इस्लाम का कहना था, “उन लोगों ने हमारे नारे का इस्तेमाल कर हमले किए और उसके पक्ष में आम सहमति बनाई. इस घटना के बाद हमारा कहना है कि इन हमलों में सरकार में शामिल एक गुट की भी मिलीभगत है.”

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