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    कभी ईवीएम की सबसे बड़ी आलोचक बीजेपी थी, कई बार विश्वसनीयता पर उठाए थे सवाल: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का दावा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 15, 2026

    एस वाई कुरैशी ने बताया कि बीजेपी ईवीएम की सबसे बड़ी आलोचक थी। जी.वी.एल. नरसिम्हा राव ने ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। इसमें ईवीएम की विश्वसनीयता और इसके भरोसेमंद होने पर सवाल उठाए गए थे।

    भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस वाई कुरैशी ने मंगलवार को एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि बीजेपी कभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की सबसे बड़ी आलोचक थी और उसने कई बार और यहां तक की एक पुस्तक भी प्रकाशित कर इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।

    एक न्यूज एजेंसी को दिए खास इंटरव्यू में पूर्व सीईसी एस वाई कुरैशी ने यह भी याद किया कि तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू ने ही वोटर वेरीफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) लागू करने का सुझाव दिया था। उनके अनुसार, इस व्यवस्था ने ईवीएम प्रणाली में जनता का भरोसा दोबारा स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    बीजेपी ईवीएम की सबसे बड़ी विरोध थी

    एस वाई कुरैशी ने कहा कि जब उन्होंने वर्ष 2010 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला, उस समय ईवीएम को लेकर विवाद अपने चरम पर था। उन्होंने बताया कि उस दौर में बीजेपी ने ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित की थी, जिसमें ईवीएम की विश्वसनीयता और भरोसेमंद होने पर सवाल उठाए गए थे।

    उन्होंने कहा, “बिल्कुल, उस समय ईवीएम को लेकर विरोध अपने चरम पर था। 2010 में मेरे मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले भी बीजेपी ईवीएम की सबसे बड़ी आलोचक थी। जी.वी.एल. नरसिम्हा राव ने ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। इसमें ईवीएम की विश्वसनीयता और इसके भरोसेमंद होने पर सवाल उठाए गए थे।”

    नायडू ने वीवीपैट का सुझाव दिया था

    पूर्व सीईसी ने बताया कि पद संभालने के तुरंत बाद उन्होंने सभी विपक्षी दलों की बैठक बुलाई थी, ताकि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े उनके संदेहों पर चर्चा की जा सके। उस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व चंद्रबाबू नायडू कर रहे थे, जिसे देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि नायडू को तकनीक समर्थक नेता माना जाता रहा है। उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि चंद्रबाबू जी, आपकी क्या शिकायत है, बताइए। मैं उसे दूर करने की कोशिश करूंगा। मेरी चुनौती है कि दिन के अंत तक या तो आप मुझे मना लेंगे या मैं आपको ईवीएम का ब्रांड एंबेसडर बना दूंगा।”

    कुरैशी के अनुसार, नायडू ने स्पष्ट किया कि उनका आरोप यह नहीं है कि ईवीएम में छेड़छाड़ हुई है या चुनाव परिणामों में हेरफेर किया गया है। उनकी चिंता केवल यह थी कि मतदान प्रक्रिया में प्रत्यक्ष पारदर्शिता दिखाई नहीं देती। उन्होंने नायडू के हवाले से कहा, “हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि इसमें पारदर्शिता नहीं है। जब आप बटन दबाते हैं, तो वोट मशीन के भीतर चला जाता है, लेकिन यह दिखाई नहीं देता कि वह सही उम्मीदवार के खाते में गया या नहीं।”

    कुरैशी ने बताया कि इसके बाद उन्होंने नायडू से समाधान पूछा। इस पर नायडू ने वीवीपैट लागू करने का सुझाव दिया, जिससे मतदाता यह स्वयं देख सके कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के नाम दर्ज हुआ है, जिसे उसने चुना है। उन्होंने कहा, “वीवीपैट में मशीन के साथ एक प्रिंटर जुड़ा होगा। बटन दबाने पर स्क्रीन पर चुने गए उम्मीदवार का नाम या चुनाव चिह्न दिखाई देगा, जिससे मतदाता पुष्टि कर सकेगा कि उसका वोट सही उम्मीदवार को गया है। इसके बाद एक पर्ची अपने आप कटकर सीलबंद बॉक्स में चली जाएगी और बाद में मशीन के आंकड़ों का इन पर्चियों से मिलान किया जा सकेगा।”

    पूर्व सीईसी ने कहा कि वीवीपैट लागू होने के बाद चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता काफी मजबूत हुई। उन्होंने बताया कि सत्यापन के दौरान लाखों वीवीपैट पर्चियों का ईवीएम में दर्ज वोटों से मिलान किया गया और सभी का रिकॉर्ड पूरी तरह मेल खाता पाया गया। उन्होंने कहा, “वीवीपैट की मदद से हम ईवीएम की विश्वसनीयता को फिर से स्थापित करने में सफल रहे।”

    राजनीतिक दलों के सवाल सुनने चाहिए

    वीवीपैट सत्यापन को लेकर मौजूदा बहस पर कुरैशी ने कहा कि कितनी पर्चियों की गिनती होनी चाहिए, यह एक तकनीकी और प्रक्रियात्मक विषय है। उनका मानना है कि यदि कई राजनीतिक दल इस पर सवाल उठा रहे हैं, तो उनकी बात सुननी चाहिए। उन्होंने कहा, “आज वीवीपैट को लेकर यह सवाल उठ रहे हैं कि कितनी पर्चियों की गिनती होनी चाहिए। यह एक प्रक्रियागत विषय है और इसका समाधान निकाला जा सकता है। यदि कई दल इस पर सवाल उठा रहे हैं, तो हमें उनकी बात सुननी चाहिए। जैसे पहले बातचीत के जरिए समाधान निकाला गया था, वैसे ही अब भी संवाद से रास्ता निकलेगा।”

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