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    डिलिमिटेशन ड्रामा: सुप्रिया सुले के NDA में जाने से इनकार के बावजूद कांग्रेस क्यों है सतर्क

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 16, 2026

    सुले ने संकेत दिया है कि उनकी पार्टी 131वें संविधान संशोधन बिल का समर्थन कर सकती है, उन्होंने कहा कि पार्टी आखिरी फैसला लेने से पहले बिल की स्टडी करेगी.

    नई दिल्ली: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी 131वें संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन कर सकती है. उनके इस बयान ने विपक्ष, खासकर कांग्रेस में हैरानी और चिंता बढ़ा दी है. मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में लोकसभा में बारामती से सांसद सुले ने कहा, “50 प्रतिशत वाली शर्त लिखित में दीजिए, फिर हम इस पर चर्चा करेंगे.”

    उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम फैसला लेने से पहले पार्टी इस विधेयक को स्टडी करेगी.

    सुले का यह रुख अप्रैल में हुए विशेष सत्र के दौरान एनसीपी (एसपी) के कड़े विरोध से अलग है. उस समय विपक्ष ने इस विधेयक के खिलाफ वोट किया था क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि सरकार नए परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना चाहती है.

    अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या समान अनुपात में बढ़ाई जाएगी, लेकिन सुले के बयान ने, भले ही उन्होंने बाद में कहा कि अंतिम फैसला लेने से पहले पार्टी इंडिया गठबंधन के सहयोगियों से सलाह करेगी, शरद पवार की पार्टी की राजनीतिक दिशा को लेकर अटकलें तेज़ कर दी हैं. चर्चा यह भी है कि क्या पार्टी आगे चलकर एनडीए या कांग्रेस के और करीब जा सकती है.

    कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी अब पहले से ज्यादा सतर्क हो गई है. हाल ही में शरद पवार से मिले नेताओं ने कांग्रेस को बताया कि पवार परिसीमन के खिलाफ नहीं हैं, अगर इसके साथ ज़रूरी सुरक्षा उपाय हों. हालांकि, पवार पर पार्टी के अंदर भी दबाव है.

    सूत्र के मुताबिक, एनसीपी (एसपी) के 8 लोकसभा सांसदों में से 5 एनडीए के करीब जाने के पक्ष में हैं. हालांकि, शरद पवार ने अभी तक इस मुद्दे पर अपना रुख साफ नहीं किया है.

    कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर पवार परिवार कांग्रेस में शामिल होने का फैसला करता है, तो पार्टी दिल्ली में सुप्रिया सुले को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने पर विचार कर रही है. एनसीपी 1999 में कांग्रेस से अलग होकर बनी थी. हालांकि, पवार परिवार ने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस में विलय की अटकलों को खारिज किया है, लेकिन सूत्र का कहना है कि वरिष्ठ नेता “सभी राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.”

    सूत्र ने कहा, “परिवार ने सार्वजनिक तौर पर विलय की बातों को खारिज किया है, लेकिन पवार यह देख रहे हैं कि उनके लिए राजनीतिक रूप से सबसे सही विकल्प क्या होगा.” खुद शरद पवार ने 2024 में एक इंटरव्यू में संकेत दिया था कि भविष्य में क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के साथ और करीब आकर काम करना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा था कि कांग्रेस और एनसीपी के बीच वैचारिक मतभेद बहुत कम हैं.

    इन अटकलों के बावजूद शरद पवार कई बार कह चुके हैं कि एनसीपी (एसपी) इंडिया गठबंधन के साथ पूरी तरह जुड़ी हुई है. मंगलवार देर रात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सरकारी आवास ‘वर्षा’ में सत्तारूढ़ एनसीपी और एनसीपी (एसपी) के नेताओं की बैठक के बाद राज्य की बदलती राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चाएं और तेज़ हो गईं.

    यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए एनसीपी (एसपी) और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) जैसे क्षेत्रीय दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है.

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर चिदंबरम ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस में टूट कराने के बाद अब बीजेपी दूसरे क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है. उनका कहना था कि इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य परिसीमन का रास्ता साफ करना है. उन्होंने कहा कि अगर ये दल इस विधेयक का समर्थन करते हैं, तो यह बजट सत्र के दौरान अपनाए गए उनके रुख के साथ विश्वासघात होगा. उन्होंने कांग्रेस का यह रुख भी दोहराया कि मौजूदा फार्मूले के तहत परिसीमन होने पर उन राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सफलतापूर्वक लागू किए हैं.

    राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे का मानना है कि सुप्रिया सुले का नया बयान एनसीपी (एसपी) के रुख में बड़ा बदलाव दिखाता है. उन्होंने कहा, “पहले एनसीपी (एसपी) ने इस प्रस्ताव का पूरी तरह विरोध किया था. अब पार्टी कह रही है कि पहले विधेयक का अध्ययन करेगी, फिर फैसला लेगी. इससे साफ है कि उसका रुख पहले से नरम हुआ है.”

    देशपांडे के मुताबिक, अब पार्टी का रुख टकराव वाला नहीं, बल्कि शर्तों पर आधारित है. उन्होंने कहा, “पार्टी कह रही है कि अगर सभी राज्यों में बराबर सीटें बढ़ती हैं, ताकि दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों को नुकसान न हो और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर साफ भरोसा दिया जाए, तो वह इस विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है.”

    देशपांडे का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा है. उन्होंने कहा, “एनसीपी नेतृत्व जानता है कि बीजेपी इस विधेयक को पास कराने के लिए ज़रूरी संख्या जुटाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में अगर उनकी चिंताओं का समाधान किया जाता है, तो पार्टी के सांसद समर्थन कर सकते हैं. इस तरह वह बीजेपी को यह संदेश भी दे रही है कि विधायकों या सांसदों को तोड़ने की जरूरत नहीं है. मेरी राय में यह जितना परिसीमन का मामला है, उतना ही पार्टी को एकजुट रखने की रणनीति भी है.”

    उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ शरद पवार के लंबे समय से रहे कामकाजी रिश्ते भी पार्टी के इस रुख को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि, एनसीपी (एसपी) ने सार्वजनिक रूप से अपने गठबंधन में किसी बदलाव का संकेत नहीं दिया है.

    कांग्रेस के महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने दिप्रिंट को दिए इंटरव्यू में 17 अप्रैल को एक बड़ा मोड़ बताया. रमेश के मुताबिक, संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए बीजेपी को 352 वोट चाहिए थे, लेकिन उसे सिर्फ 298 वोट मिले. उन्होंने कहा कि यह सरकार के लिए बड़ा झटका था. रमेश ने कहा, “अब जो कुछ हो रहा है, वह बदले की राजनीति है.”

    उन्होंने हाल में विपक्षी दलों के नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटनाओं को इस विधेयक के लिए ज़रूरी संख्या जुटाने की बीजेपी की कोशिश से जोड़ा. रमेश ने आगे कहा कि संसद में एनडीए की ताकत बढ़ने के बावजूद भी बीजेपी के पास संविधान संशोधन कराने के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत अभी नहीं है.

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