जो देश खुद से यह झूठ बोलता है कि वह कानून के राज वाला लोकतंत्र है, वह उस जगह नहीं पहुँचेगा जहाँ कानून का राज समाजों को ले जाना चाहता है।
एक लोकतांत्रिक समाज के तौर पर, यह उम्मीद की जाती है कि भारत के अधिकारी कानून के शासन का पालन करेंगे। इसमें यह भी शामिल है कि शासन मनमाना नहीं होगा, खासकर तब, जब बात क्रिमिनल लॉ की हो। यह बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि क्रिमिनल लॉ से किसी की ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है। ऐसा ही हाल ही में एक जज ने कॉलेज छात्रों के एक ऐसे समूह को याद दिलाया था, जिन्होंने एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
मैं जिस बारे में बात करना चाहता हूं, वह कुछ अलग है। यह अब अपनी जड़े जमा चुका है और भारत के लोकतंत्र का हिस्सा बन गया है। इस हफ़्ते की दो हेडलाइन से यह साफ़ हो जाएगा कि मेरा क्या मतलब है। पहली हेडलाइन है: ‘इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की आरोपी व्यक्तियों को पैरों में गोली मारने के तरीके प्रैक्टिस की आलोचना की’। इस खबर के सबहेड में लिखा है: ‘बेंच ने कहा – ऐसा व्यवहार पूरी तरह से गलत है, क्योंकि सज़ा देने का अधिकार सिर्फ़ अदालतों के पास है।’
पहले मामले में, उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल जुलाई में आंकड़े जारी किए थे। 2017 से अब तक पुलिस मुठभेड़ में 9,467 लोगों को पैर में गोली मारी गई थी। इसका मतलब है कि प्रदेश में पिछले नौ सालों से रोज़ाना लगभग तीन लोगों को पुलिस ने पैर में गोली मारी है।
एक ऐसा राज्य जो हिरासत में लोगों को मारता है, जो हिरासत में लोगों को अपाहिज बनाता है, जो बिना सही कानूनी प्रक्रिया के और सुप्रीम कोर्ट सहित पूरी न्याय व्यवस्था को नज़रअंदाज़ करके लोगों की निजी संपत्ति को नष्ट करता है, वह ज़ाहिर तौर पर पहले से ही एक पुलिस स्टेट नहीं है!
दूसरी रिपोर्ट की हेडलाइन थी: ‘उत्तराखंड के धर्मांतरण कानून के तहत मामले कोर्ट ध्वस्त: 7 साल, 5 पूरे ट्रायल, सभी 5 में बरी’। यह ज़िक्र उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 का है, जो ‘लव जिहाद’ की साज़िश की थ्योरी फैलने के बाद बीजेपी द्वारा पेश और लागू किए गए कई राज्यों के कानूनों में सबसे पहले बनाया गया था।
यह मुसलमानों और हिंदुओं के बीच शादी को तब अपराध मानता है, जब दोनों में से कोई एक पार्टनर धर्म बदलता है, लेकिन कानून कहता है कि ‘अगर कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म में वापस आता है’ तो इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा, बिना यह बताए कि ‘पैतृक धर्म’ का क्या मतलब है। इसका मतलब है कि अगर कोई गैर हिंदू अपना धर्म छोकर हिंदू धर्म अपनाता है तो उसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा।
हमारे दौर में हमारे आस-पास जो हो रहा है, उससे हम क्या नतीजा निकाल सकते हैं? दो बातें। पहली यह कि पूरे भारत में अधिकारी जानबूझकर कानून तोड़ रहे हैं ताकि वे बीजेपी सरकारों की मर्ज़ी के हिसाब से चल सकें। वे ऐसा पूरे भरोसे के साथ कर रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी और सच तो यह है कि जैसा कि यूपी कोर्ट ने कहा है, उन्हें ऐसा करने के लिए इनाम भी मिल सकता है।
दूसरी बात हमें वहीं ले जाती है जहां से हमने शुरुआत की थी और हम पूछें कि जब एक लोकतांत्रिक समाज के अधिकारी जानबूझकर कानून के शासन, खासकर आपराधिक कानून का उल्लंघन करते हैं, तो क्या होता है? इसके छोटे और लंबे समय के नतीजे होते हैं और दोनों ही टाले नहीं जा सकते।

