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    बेहद केंद्रीकृत और गैर-जवाबदेह राज व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े हुए आंदोलन हमारी साझी विरासत के रखवाले

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 28, 2026

    नीट पेपर लीक से भड़का युवा असंतोष केवल प्रशासनिक विफलता का विरोध नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आंदोलनों को नैतिक-सामाजिक सूत्र में पिरोने का मौका है।

    अली खान महमूदाबाद

    Published: 26 Jul 2026, 4:00 PM

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    विरोध प्रदर्शन वैचारिक चेतना और जागरण का माध्यम रहे हैं। यह चेतना उनके लिए भी है जो अपने अतीत की भूलों को स्वीकार करते हैं, उनके लिए भी जो खुद को राजनीति-निरपेक्ष मानते हैं, और उनके लिए भी जिन्हें लगता है कि राज्य केवल हाशिये पर मौजूद उपद्रवी तत्वों को ही निशाना बनाता है। आज भारत भर में तमाम विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन जिस आंदोलन ने किशोरावस्था और वह भी 20 वर्ष के आसपास के लाखों-लाख युवाओं की सोच को झकझोर डाला है, वह नीट परीक्षा के सवाल लीक होने के खिलाफ जारी प्रदर्शन है।

    एक तरफ दिल्ली की सीमाओं की ओर बढ़ते किसान हैं, तो दूसरी तरफ खुद प्रधानमंत्री ने पेपर लीक को ‘घोर पाप’ मानते हुए भी प्रदर्शनकारियों को ‘गलत राह’ पर चलने वाला करार दिया है। किसी भी बड़े जन-आंदोलन के सभी जरूरी तत्व यहां मौजूद हैं: एक व्यापक तकलीफ (प्रश्नपत्र लीक), समाधान का अभाव (जवाबदेही की अनसुनी मांग), एक साझा लक्ष्य (शिक्षा मंत्री का इस्तीफा), एक उत्प्रेरक घटना (सोनम वांगचुक का अनशन और उन्हें धरना स्थल से जबरन हटाया जाना, हालांकि उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया है), व्यापक लामबंदी (सामाजिक और राजनीतिक हलकों से हजारों लोगों का जुड़ना) और आंदोलन को भड़का देने वाली चिंगारी (पुलिसिया दमन)।

    यह समझना बेहद जरूरी है कि नीट प्रश्नपत्र लीक या सीबीएसई मूल्यांकन घोटाला कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये पूरी तरह जर्जर और चरमराई हुई व्यवस्था के लक्षण मात्र हैं। भले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया, आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को शायद मुआवजा भी मिल जाए और नेता संसद में इन मुद्दों पर चर्चा कर लें, यह सब अधिक से अधिक केवल तात्कालिक सांत्वना दे सकता है; इससे तंत्र नहीं सुधरने वाला। युवाओं को महसूस करना होगा कि वे इस ऐतिहासिक मोड़ का उपयोग अधिक बड़े बदलावों की मांग के लिए कर सकते हैं, और वे देश भर में चल रहे अन्य आंदोलनों के लिए एक सेतु का काम कर सकते हैं।

    पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल के किसान हों या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सुलगती औद्योगिक श्रमिकों की असंतोष की आग; हरियाणा में आशा कार्यकर्ता और श्रम संघों का संघर्ष हो या मध्य प्रदेश में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का विरोध करती आदिवासी महिलाएं; उत्तराखंड में 4,000 पेड़ों की कटाई के खिलाफ ‘चिपको 2.0’ हो या उत्तर प्रदेश में जौहर विश्वविद्यालय के परिसर को बचाने में जुटे छात्र; कर्नाटक में एआई टाउनशिप के लिए जमीन के अधिग्रहण का विरोध करते किसान हों या छत्तीसगढ़ में विधायकों के फ्लैट बनाने के लिए 70 घरों के विध्वंस के खिलाफ उठे ग्रामीण; तमिलनाडु में सहकारी बैंक के कर्मचारियों का वेतन आंदोलन हो या महाराष्ट्र में लोक सेवा आयोग की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का आक्रोश; मणिपुर में ग्राम स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के खिलाफ बेमियादी धरने पर बैठी महिला विक्रेता हों या उत्तर प्रदेश में बच्ची की हत्या के खिलाफ बहुजन समाज का विरोध।

    प्रथमदृष्टया अधिकतर लोग इन आंदोलनों को एक-दूसरे से भिन्न देखेंगे। बेशक इनकी परिस्थितियां बिल्कुल जुदा हों, लेकिन यह साफ है कि वे सब एक बेहद केन्द्रीकृत और गैर-जवाबदेह राज व्यवस्था के खिलाफ खड़े हैं, जो भ्रष्ट संस्थानों द्वारा पोषित और तकनीक-केन्द्रित प्रशासनिक व्यवस्था पर टिकी है। नागरिक अपने जीवन से जुड़े अधिकारों का नियंत्रण खो रहे हैं, और नागरिकता की मूल अवधारणा ही अनिश्चितता से भर गई है।

    अब अहम सवाल यह नहीं है कि ये समूह आपस में विचारधारा साझा करते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे एक-दूसरे को किस नजरिये से देखते हैं और आपस में कैसे संवाद करते हैं। पहला कदम अपने सामाजिक ताने-बाने को दुरुस्त करना है, न कि तत्काल राजनीतिक गठबंधनों के बारे में सोचना। यह चुनौती पहले सामाजिक है, और उसके बाद राजनीतिक।

    आज इन समुदायों के बीच की दूरी केवल भौगोलिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी है। सोशल मीडिया ने हमें दूसरों के दुखों के प्रति असंवेदनशील बना दिया है और ऐसे वैचारिक घेरे खड़े कर दिए हैं जो केवल हमारे पीड़ित होने के अहसास को ही हवा देते हैं। साझा सरोकारों की तो बात ही छोड़िए, हम एक-दूसरे से बात करना तक भूल चुके हैं। प्रथम दृष्टया, बुलडोजर कार्रवाई का सामना कर रहे एक मुस्लिम और राम मंदिर के चंदे में हेरफेर से आक्रोशित एक हिन्दू के बीच कोई समानता नहीं दिखेगी। महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के उम्मीदवार मध्य प्रदेश के आदिवासियों को प्रगति-विरोधी मान सकते हैं; गुजरात के किसान पंजाब के किसानों को राष्ट्र-विरोधी समझ सकते हैं; और कश्मीरियों को लग सकता है कि जो हो रहा है, उसके जिम्मेदार लोग खुद हैं।

    आज हमें केवल साझा विचारधारा या निष्क्रिय सहानुभूति की नहीं, बल्कि ‘सहानुभूतिपूर्ण संवेदना की राजनीति’ की जरूरत है। सभी हितधारकों की समान भागीदारी के बिना कोई फैसला न लिया जाए- यह सिद्धांत राज्य का दर्जा चाहने वाले कश्मीरी और करोड़ों रुपये के मुआवजे के बावजूद अपनी जमीन देने से इनकार करने वाली कर्नाटक की महिला किसान, दोनों के दिलों में गूंजेगा। शिकायतें अलग हो सकती हैं; सिद्धांत वही रहता है। आज के विरोध प्रदर्शन काफी हद तक दूसरों की समस्याओं को अपनी समस्याओं से असंबद्ध मानने की ऐतिहासिक भूल का परिणाम हैं।

    ऐतिहासिक रूप से जयप्रकाश नारायण (जेपी) का आंदोलन और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (आईएसी) आंदोलन इसलिए अहम थे क्योंकि वे व्यापक और समावेशी आंदोलन थे। हालांकि जेपी आंदोलन ने अनियंत्रित सत्ता की ज्यादतियों से पीड़ित अलग-अलग लोगों को एक साथ लाने के लिए एक नैतिक शब्दावली (‘संपूर्ण क्रांति’) का सफल इस्तेमाल किया, लेकिन उसकी विफलता यह थी कि उसने शासन चलाने के लिए एक साझा दर्शन तैयार नहीं किया। वह अपने स्वभाव में केवल सत्ता-विरोधी था। आईएसी आंदोलन भी ऐसे समूहों को साथ लाने में सफल रहा जिनमें कोई समानता नहीं थीं, क्योंकि उसने भ्रष्टाचार के रूप में एक साझा समस्या की पहचान की थी। उसकी विफलता यह रही कि उसने केवल राजनेताओं को जवाबदेह ठहराया, जबकि वास्तविकता यह है कि पूरी शासन व्यवस्था में क्षरण हुआ है और नागरिक भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इसका हिस्सा बन जाते हैं।

    आंशिक समाधानों या नीतियों में तदर्थ बदलावों की तलाश करने के बजाय, एक बेहतर भारत का सपना देखने वाले युवाओं को एक साझा नैतिक शब्दावली खोजने की चुनौती से जूझना होगा। 

    देखना होगा कि शिक्षा को बौद्धिक कसरत की जगह आत्मीयता का साधन माने वाले सावित्रीबाई फुले के विचार, आम्बेडकर के गरिमा के विचार, लोहिया के सतर्क नागरिक के विचार, गांधी के स्वराज के विचार, बेगम रुकैया के राजनीतिक जागरण के विचार, खान अब्दुल गफ्फार खान के सेवा और अमानतदारी के विचार, राम दयाल मुंडा के प्रकृति व मानव के सह-अस्तित्व के विचार और संविधान के समान नागरिकता के वादे को एक साथ कैसे पिरोया जाए- खासकर तब जब हम इतने संकीर्ण हो गए हैं कि केवल उन्हीं मुद्दों से सरोकार रखते हैं जो हमें सीधे प्रभावित करते हैं?

    शायद इसका जवाब सभी नागरिकों की एक अमानत के ‘रक्षक’ या ‘संरक्षक’ के रूप में कल्पना करने में निहित है। कैसी अमानत? दरअसल, यह भारत का वह बहुलवादी विचार है जो हमें विरासत में मिला है- विविध लोग, विविध परंपराएं, विविध धर्म,विविध नदियां, विविध पर्वत, विविध जंगल, विविध मरुस्थल, विविध जीव-जंतु और वनस्पतियां। यह अमानत हमारे संविधान की प्रस्तावना है।

    ‘संरक्षकता’ हमें अतीत से जोड़ती है, लेकिन भविष्य के प्रति जिम्मेदारी भी जगाती है। यह लोगों के आपसी रिश्तों सहित हर चीज को केवल एक राज्य या सत्ता के चश्मे से नहीं देखती। यह अनुबंधों पर नहीं, बल्कि नैतिक संकल्पों पर; बाजारों पर नहीं, बल्कि घरों पर; वर्तमान ही नहीं भविष्य पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। अगर नागरिकता व्यक्ति को अधिकार देती है, तो संरक्षकता केवल हमारे लिए नहीं बल्कि सभी के लिए जिम्मेदारी का भाव भरती है।

    अभी भारत का ‘भविष्य’ दिल्ली की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। उसने अपनी आवाज उठाने की कीमत भी जान ली है। भारत किसी सरकार, किसी समुदाय या किसी पार्टी का नहीं है, बल्कि यह एक साझी अमानत है जहां राज्य के जनता से रिश्ते ‘मर्यादा’ यानी नैतिक संयम के आधार पर होने चाहिए। एक अच्छा समाज वह है जिसमें सत्ता का प्रयोग करने वाले सभी घटक- सरकार, कॉरपोरेट, धार्मिक संस्थान, नौकरशाही और स्वयं नागरिक- ‘मर्यादा’ से बंधे हुए एक अमानत के रक्षक के रूप में काम करते हैं। भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’, यानी सर्वोच्च नैतिक संयम का प्रतीक कहा जाता है। आदर्श शासक स्वयं को सीमित करता है; वह अनिवार्य रूप से सबसे ताकतवर नहीं होता, बल्कि महान नैतिक संयम वाला होता है। जब मर्यादा का उल्लंघन होता है, तो अमानत के रूप में सुरक्षित व्यवस्था खतरे में आ जाती है, और तब उसकी रक्षा जरूरी हो जाती है।

    (अली खान महमूदाबाद इतिहासकार, राजनीति विज्ञानी, लेखक,कवि और प्रोफेसर हैं)

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