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    छात्र-युवा आंदोलन: भारत ने सीख ली मुस्कुराते हुए सरकारी अहंकार और हठधर्मिता से लड़ने की नई कला

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 3, 2026

    अधिनायकवादी सत्ता भव्यता का आडंबर रचती है, जिसे हास्य तार-तार कर देता है। भारत की ‘जेन जी’ ने इस व्यंग्य का लोकतंत्रीकरण किया। एक छात्र ने तख्ती लिखी, दूसरे ने उसका वीडियो बनाया, तीसरे ने रील एडिट की, चौथे ने मीम में बदला और देखते-देखत वायरल…

    जयदीप हार्दिकर

    Published: 01 Aug 2026, 9:00 PM

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    यह वीडियो इंस्टाग्राम पर वायरल हो गया। इसे मोबाइल से शूट किया गया था। इसमें दृश्य कुछ इस तरह उभरता है: पुलिसकर्मियों की एक टुकड़ी ढाल उठाए और हाथों में लाठियां लिए आगे बढ़ रही है। पटना की भीड़भाड़ वाली एक सड़क पर उनके सामने है छात्रों का हुजूम। टकराव तय लग रहा है। तभी भीड़ के बीच से एक परिचित धुन गूंजती है: ‘जन गण मन..’। कुछ ही क्षण में बाकी लोग भी इसमें शामिल हो जाते हैं। भीड़ राष्ट्रगान गाने लगती है। पुलिसकर्मियों को कदम रोकने पड़ते हैं, सीधे खड़े होकर राष्ट्रगान गाना पड़ता है। उन सेकंडों में किसी को नहीं पता होता कि आगे क्या होने वाला है। वह क्षण वास्तविक था, नाटक था, व्यंग्य था, असहयोग था, गुरिल्ला रणनीति थी या कुछ और? शायद सब कुछ एक साथ।

    अगर आप ‘अंधभक्त’ नहीं हैं, तो शायद ही हंसी रोक पाएं। उसी विरोध प्रदर्शन में, एक लड़का खास बिहारी लहजे में पुलिसकर्मियों से पूछता है: ‘कोई आंसू गैस का इंतजाम नहीं किए? वाटर कैनन ही चला दीजिए।’

    पटना और भारत के तमाम शहर कई दिनों के लिए जंतर-मंतर बन गए। हर प्रदर्शन स्थल से रील्स निकल रही थीं, और आप उनकी रचनात्मकता, उनके अंदाज और स्वैग, उनकी भाषा, उनके हास्य, उनकी जीवंतता और बेबाकी को देखकर हैरान!

    विद्रोह एक उत्सव बन गया, मौज-मस्ती से सराबोर! युवाओं में गुस्सा था, और इस बारे में वे किसी तरह का संदेह नहीं रहने दे रहे थे। लेकिन वे मुस्कुराते हुए चीखने में भी कामयाब हो रहे थे। यह बेशक विरोध प्रदर्शन था, लेकिन अंदाज अलग। एक लड़की के हाथों मेंं तख्ती थी जिसपर लिखा था: ‘तुमने गलत पीढ़ी से पंगा ले लिया’। जिस सत्ता को उन्होंने चुनौती दी, उससे टकराने में उन्हें न कोई डर था, और न ही अपशब्द दागने में कोई झिझक।

    एक अधेड़ व्यक्ति से जब इंस्टाग्राम फीड के लिए किसी ने पूछा कि आप यहां कैसे, तो उसने कहा कि वह लंदन में अटके अपने बेटे का प्रतिनिधित्व करने कोलकाता से आए हैं। उनके बेटे ने उनसे कहा था कि वह जंतर-मंतर जाएं और अगर संभव हो, तो उसकी तरफ से पुलिस की लाठियां भी खा लें! वह यह सब अपने बेटे और उसके साथी प्रदर्शनकारियों के लिए कर रहे थे।

    एक तख्ती पर लिखा था: ‘मेरे हिंज (एक डेटिंग ऐप) के मैच सरकार से तेजी से जवाब देते हैं।’ (इसमें युवाओं के बीच संवाद में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाने वाला शॉर्ट फॉर्म आईसीवाईडीके का इस्तेमाल किया गया है जिसका मतलब है शायद आपको पता न हो)।

    एक तख्ती में बातचीत से सरकार के शुरुआती इनकार का मजाक उड़ाया गया था: ‘मेरी पूर्व प्रेमिका ने भी मुझे इतना नजरअंदाज नहीं किया था!’ कोई बैटमैन बनकर आया था। तो वहीं थोड़ी ही दूरी पर स्पाइडर-मैन तस्वीरों के लिए पोज दे रहा था।

    ‘डोरा द एक्सप्लोरर’ यहां ‘डोरा द प्रोटेस्टर’ बन गई थी। बॉलीवुड के गानों के बोल को राजनीतिक व्यंग्य में ढालकर गाए जा रहे थे। कुछ ने पुलिस से भागते समय ‘सबवे सर्फर्स’ गेम के साउंडट्रैक के साथ उसी शैली में रील बनाई। किसी ने तो विरोध प्रदर्शन के दौरान तय किए गए किलोमीटर का ‘स्ट्रावा’ स्क्रीनशॉट अपलोड कर दिया।

    यहां एक और उल्लेखनीय बदलाव दिखा। जहां पहले के आंदोलन भीड़ की मौजूदगी पर टिके होते थे, वहीं यह आंदोलन ‘शेयर करने की क्षमता’ पर सवार था। तख्ती दस फुट दूर खड़े पुलिसकर्मी के लिए नहीं थी, उसका निशाना बहुत दूर बैठकर इंस्टाग्राम स्क्रॉल करने वाला हर व्यक्ति था। नारा एक स्क्रीनशॉट बन गया और भाषण एक रील। मार्च को जीपीएस कोऑर्डिनेट्स मिल गए। हर मारक और हास्यप्रद तख्ती को इस तरह डिजाइन किया गया था कि वह दोपहर ढलने के बाद भी एल्गोरिदम में जिंदा रहे। 

    हालांकि तात्कालिक कारण बार-बार होते परीक्षा के पर्चा लीक थे, लेकिन गुस्से की असली वजह घटते अवसरों, महंगी शिक्षा और अनिश्चित रोजगार से उपजी निराशा, बढ़ती कट्टरता, संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण और इस कड़वे अहसास का जमा हुआ आक्रोश था कि निष्पक्षता की गारंटी देने वाली संस्थाएं भी भरोसेमंद नहीं रहीं।

    जब पिछली पीढ़ियों ने विरोध किया, तो आपने उनका नैतिक आक्रोश देखा; लेकिन इस पीढ़ी ने व्यंग्य और ‘विडंबना’ को चुना। बेशक यह पीढ़ी इंटरनेट की ताकत जानती है, लेकिन शायद यह भी समझती है कि हास्य आक्रोश की तुलना में दूर तक जाता है। वे जानते हैं कि व्यंग्य सेंसरशिप से बच सकता है, और एक चुटकुला किसी राजनीतिक पर्चे की तुलना में अधिक तेजी से फैलेगा। जहां विचारधारा के लिए दरवाजे बंद होते हैं, वहां भी एक मीम चुपके से भीतर दाखिल हो जाता है।

    राजनीतिक विश्लेषक इस बात को लंबे समय से जानते हैं। रूसी दार्शनिक मिखाइल बख्तिन का तर्क था कि कार्निवल के दौरान सामाजिक पदानुक्रम नहीं रहता। राजा साधारण इंसान बन जाते हैं। हास्य मनोरंजन करता है; यह शासकों और शासितों के बीच के संबंधों को पुनर्गठित कर देता है।

    जेम्स सी. स्कॉट ने अपनी पुस्तक ‘डोमिनेशन एंड द आर्ट्स ऑफ रेजिस्टेंस’ में चुटकुलों, अफवाहों और व्यंग्य को आम लोगों के ‘छिपी संवाद शैली’ के रूप में वर्णित किया है। इससे पहले कि नागरिक खुले तौर पर सत्ता को चुनौती दें, वे अक्सर उस पर हंसते हैं। उपहास चुपचाप विद्रोह का पूर्वाभ्यास करता है। इतिहास ऐसे पूर्वाभ्यासों से भरा पड़ा है।

    1980 के दशक में कम्युनिस्ट पोलैंड में, भूमिगत आंदोलन ‘ऑरेंज अल्टरनेटिव’ ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जहां छात्रों ने परियों की कहानियों के बौनों के कपड़े पहने थे। असंतोष को कुचलने पर आमादा पुलिस आखिरकार काल्पनिक पात्रों के कपड़े पहने लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। सरकार ने व्यवस्था तो बनाए रखी, लेकिन अपनी गरिमा खो दी।

    1990 के दशक के उत्तरार्ध में सर्बिया के प्रसिद्ध ‘ओटपोर’ छात्र आंदोलन में, स्लोबोदान मिलोसेविच का विरोध कर रहे छात्र कार्यकर्ताओं ने एक चौराहे पर उस तानाशाह के चेहरे के तौर पर पेंट किए गए एक ड्रम को लुढ़का दिया, और राहगीरों से उसमें सिक्का डालकर लाठी से मारने का आह्वान किया। पुलिस आखिरकार उस ड्रम को ‘गिरफ्तार’ करने आई, और इस व्यंग्यात्मक अभियान ने सत्ता को हास्यास्पद बना दिया, जब दुनिया भर के अखबारों में पुलिस अधिकारियों द्वारा पेंट किए गए ड्रम को ले जाने की तस्वीरें छपीं। उस एक बेतुकी तस्वीर ने सालों से बनी सत्ता की धमक को हवा में उड़ा दिया।

    अधिनायकवादी सत्ता, चाहे उसकी विचारधारा कुछ भी हो, एक झूठी भव्यता का निर्माण करती है जिसे हास्य बड़ी आसानी से पंचर कर देता है। भारतीय लोककथाएं बीरबल और तेनालीराम का उत्सव इसलिए नहीं मनातीं कि उन्होंने तलवारों से राजाओं को हराया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपनी बुद्धि से उनके अहंकार को चूर-चूर कर दिया। आपातकाल के दौरान, अबू एब्राहम के कार्टून अक्सर वह कह जाते थे जो संपादकीय नहीं कह पाते थे। हबीब तनवीर के रंगमंच ने हमेशा नाम लिए बिना सत्ता का मजाक उड़ाया। शरद जोशी की रचना ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खान’, और चो रामास्वामी के ‘तुगलक’ ने उन्हीं हथियारों से सत्ता का उपहास उड़ाया।

    लेकिन भारत की ‘जेन जी’ ने कुछ अलग किया। उन्होंने व्यंग्य का लोकतंत्रीकरण किया और इसे पंख दे दिए। यह किसी एक पीढ़ी की पीड़ा को जताने वाले कुछ चुनिंदा कार्टूनिस्ट, नाटककार या स्तंभकार नहीं थे। यदि किसी ने तख्ती लिखी, तो दूसरे ने उसका वीडियो बनाया, तीसरे ने रील एडिट की, चौथे ने ट्रेंडिंग ऑडियो जोड़ा, और पांचवें ने उसे मीम में बदल दिया। रात होने तक, संसद के बाहर फुटपाथ पर पैदा हुआ चुटकुला किसी भी प्राइम-टाइम टीवी बहस की तुलना में कहीं लंबी यात्रा कर चुका था।

    एक दशक से अधिक समय से, नरेन्द्र मोदी की राजनीति एक विशेष आभामंडल के निर्माण पर टिकी रही है- जहां एक विशाल जननेता की छवि गढ़ी गई। इंस्टाग्राम की यह नई पीढ़ी रील्स, मीम्स और पंचलाइनों के जरिये उसका मजाक उड़ाकर उस आभामंडल को ध्वस्त कर रही है।

    बेशक, हास्य किसी राजनीतिक संगठन का विकल्प नहीं हो सकता। किसी चतुर तख्ती की वजह से आज तक कोई सरकार नहीं गिरी है। मीम्स कोई राजनीतिक घोषणापत्र नहीं हैं। रील्स किसी आंदोलन का विकल्प नहीं हो सकतीं। हर विरोध प्रदर्शन को नेतृत्व, रणनीति और राजनीतिक दिशा के मुश्किल सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं।

    लेकिन शायद इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि कैसे इसने खुद को हंसी के साथ संभाले रखा और डर को घोलकर खत्म कर दिया, कैसे इसने डरते हुए लोगों को साहस दिया, और कैसे इसने बदलाव को संभव किया। हमने देखा कि कैसे इन युवा प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस की बर्बरता का सामना किया। हमने देखा कि पुलिस कार्रवाई के बाद उनका समर्थन कैसे बढ़ा। यह देखना अद्भुत था कि पुलिस की लाठियां उनके उत्साह या उनके हास्यबोध को नहीं मार सकीं। जंतर-मंतर पर लौटने वाले कई लोगों ने छात्रों को घसीटे जाने, उनके खून बहते पट्टियों से बंधे सिर और टूटी टांगों के वीडियो देखे थे। वे जोखिम जानते थे। फिर भी वे लौटे।

    यह कहना मुश्किल है कि वे यहां से किस ओर जाते हैं, लेकिन शक नहीं कि उनके इस दुस्साहस ने सत्ता के अजेय आभामंडल को ध्वस्त कर दिया है।

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