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    जंतर-मंतर आंदोलन और आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 6, 2026

    लोकतांत्रिक ताकतों को कंधे से कंधा मिलाकर जोर लगाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि टी. मोहनदास और उनके विचारधारात्मक गुरू इस सुंदर प्रतिरोध पर काबिज होकर हिन्दू राष्ट्रवाद के विभाजनकारी एजेंडे को सशक्त बनाने में कामयाब न हो पाएं।

    राम पुनियानी

    Published: 06 Aug 2026, 7:59 AM

    Follow us on:

    सरकार द्वारा जंतर-मंतर पर धरना दे रहे आंदोलनकारियों की मांगें स्वीकार करने के बाद भी मामला पूरी तरह से सुलझा नहीं है। गिरफ्तारियां जारी हैं और कई जगहों पर गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया है। ऐसी खबर है कि प्रदर्शनों की वजह से गिरफ्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या अन्य वर्गों के लोगों की तुलना में अधिक है। जुनैद (जुनैद भाई) का मामला काफी परेशान करने वाला है। उन्होंने एक दल बनाया जो आंदोलनकारियों को पानी और खाना उपलब्ध करवाता था। अभिजीत दिपके ने उनके चरण स्पर्श कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। पुलिस ने उन्हें और उनके परिवार को उत्पीड़ित करने में अति सक्रियता और अति तत्परता दिखाई।

    युवाओें का उत्साह काबिले तारीफ

    उनके पास खाना बांटने के लिए पैसा कहां से आया? उन्होंने शुरू में केवल पानी उपलब्ध करवाया और बाद में अपने कुछ रिश्तेदारों के सहयोग से खाना बांटना शुरू किया। इसके बाद उन्हें कई दानदाताओं ने खाने-पीने का सामान उपलब्ध करवाया और उनका समूह एक तरह से आंदोलन स्थल पर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का सबसे प्रमुख स्त्रोत बन गया। एक सराहनीय बात यह थी कि आंदोलनकारियों ने केन्द्र सरकार की साम्प्रदायिक  राजनीति के खिलाफ भी नारेबाजी की।

    यह अच्छा है कि युवाओं को इस बात का ध्यान है कि सरकार लिखित समझौते में किए गए वायदे पूरे करने में अब तक असफल रही है। इस आंदोलन का सारे देश में यह सुखद प्रभाव हुआ है कि जो लोग दबा हुआ महसूस कर रहे थे अब वे कुछ हद तक अपने मुद्दों को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं और ऐसा महसूस कर रहे हैं कि वे अब खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। यह विरोध अभी अधबीच में है और युवाओें का उत्साह काबिले तारीफ है। वे दमनकारी तंत्र की जकड़ को ढीला करने के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा के अधिकारी हैं।

    आरएसएस की विचारधारा का असली रंग सामने आया

    सवाल यह है, कि क्या यह जारी रह पाएगा, सवाल आम जनता के व्यापक असंतोष को सही दिशा देने का है, सवाल यह है कि क्या बड़े राजनैतिक गठबंधन इसे आगे बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि कुछ हद तक लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हो।

    इस आंदोलन का एक परिणाम यह भी हुआ कि कंगना रनौत जैसे कई लोगों, जिनके अनुसार देश ‘‘2014 में स्वतंत्र हुआ’’ ने जेन-ज़ी को गटर जनरेशन बताया! शर्मनाक है ऐसे लोगों का नजरिया जिन्हें जंतर-मंतर में व्याप्त सकारात्मकता और रचनात्मकता नजर नहीं आई। इसके साथ ही बीजेपी के बौद्धिक प्रकोष्ठ के पूर्व प्रमुख टी. मोहनदास जैसे लोग भी हैं, जो बीजेपी-आरएसएस में कई जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं और जिनके कथनों से इन संस्थाओं की वास्तविक राजनैतिक विचारधारा और असली रंग सामने आता है। वे फरमाते हैं ‘‘अगर सत्ता पर मेरा नियंत्रण होता तो जंतर-मंतर पर मौजूद आंदोलकारियों को बंदूक की गोलियों से मौत के घाट उतार दिया गया होता‘‘। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘आंदोलन में शामिल महिलाएं चाहती हैं कि उनके साथ दुष्कर्म हो और अगर ऐसा होगा तो वे शिकायत तक नहीं करेंगीं‘‘।

    हालांकि रणनीतिक कारणों से उनके वक्तव्य को खारिज कर दिया गया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यदि आरएसएस का कोई सदस्य कोई वीभत्स या भयावह कार्य करता है या ऐसी कोई बात कहता है तो वह यह दावा करने लगता है कि उस व्यक्ति से उसका कोई संबंध नहीं है। ऐसा ही नाथूराम गोडसे के मामले में किया गया था जिसके बारे में आरएसएस ने दावा किया था कि उसका संघ से कोई लेनादेना नहीं था। यह इस तथ्य के बावजूद कि नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक ‘मे इट प्लीज योर ऑनर‘‘ में लिखा है कि नाथूराम सहित सभी भाईयों ने आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

    लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति तिरस्कार

    हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहनदास लोकतांत्रिक मानदंडों और महिलाओं की समानता दोनों को अवांछनीय बताते हैं और दोनों के प्रति तिरस्कार भाव रखते हैं। जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को काबू में करने के लिए वे जो कदम उठाते वे उनका क्रम भी बताते हैं। सबसे पहले वे उस क्षेत्र में कर्फ्यू लागू करते, फिर भीड़ को तितर-बितर होने की चेतावनी देते, अगर इस आदेश का पालन नहीं होता तो गोलियां चलाने का आदेश दिया जाता और इसके नतीजे में जान गंवाने वाले और घायल हुए लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया जाता।

    लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति जो तिरस्कार का भाव वे दिखा रहे हैं, वह बीजेपी के नेतृत्व में पिछले 12-13 सालों से चल रही एनडीए सरकार के क्रियाकलापों में साफ नजर आ रहा है। वैश्विक सूचकांकों को देखने पर पता लगता है कि लोकतांत्रिक मानदंडों पर हमारा स्थान हर साल गिरते हुए निर्वाचित तानाशाही की श्रेणी तक पहुंच चुका है। सरकार जिस रास्ते पर चल रही है उससे बीजेपी का मार्गदर्शक मंडल तक विक्षुब्ध है। पहले लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि यह अघोषित आपातकाल है और अब मुरली मनोहर जोशी ने आंदोलनकारियों से निपटने के लिए पुलिस द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों की आलोचना की है।

    फ्रीडम हाउस (आजादी का वैश्विक सूचकांक) पर भारत का स्थान 100 देशों में से 62वें स्थान पर है और भारत को राजनैतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बुरी स्थिति के मद्देनजर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र‘ की श्रेणी में रखा गया है। इकोनोमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) लोकतंत्र सूचकांक ने भारत को ‘दोषपूर्ण लोकतंत्र‘ की श्रेणी में रखा है। व्ही-डीम इंस्टीट्यूट (डेमोक्रेसी रिपोर्ट्स) ने भारत के शासन तंत्र को नागरिक एवं न्यायिक स्वतंत्रताओं की स्थिति में आई भारी गिरावट का हवाला देते हुए करीब-करीब ‘लोकतांत्रिक तानाशाही‘ के वर्ग में रखा है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स (विश्व में प्रेस स्वतंत्रता का सूचकांक) ने देश में मीडिया की आजादी पर बढ़ते प्रतिबंधों और पत्रकारों की सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति के चलते 180 देशों में भारत को 157वें स्थान पर रखा है।

    इतिहास

    इसे भी पढ़ेंः राम पुनियानी का लेख: हिन्दू राष्ट्र के विचार को सही ठहराने कोशिश, RSS मुखिया ने गिनाईं हिन्दुओं की किस्में

    आरएसएस में सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला

    धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोष से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था आरएसएस से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है। साम्प्रदायिक  राजनीति महिलाओं के शरीरों पर आधारित होती है। आरएसएस केवल पुरूषों की संस्था है जिसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। उसके अधीनस्थ महिलाओं की संस्था का नाम राष्ट्र सेविका समिति है। यहां महिलाएं मात्र सेविका (नौकरानी) हो सकती हैं।

    सेवी पत्रिका (अप्रैल 1994) में भाजपा की नेत्री मृदुला सिन्हा ने अपना नजरिया बताते हुए कहा था कि ‘दहेज लेने और देने में कुछ भी अनुचित नहीं है, पत्नियों के साथ मारपीट करना ठीक है और जब तक जबरदस्त आर्थिक संकट न हो तब तक महिलाओं को घर से बाहर निकलकर कामकाज नहीं करना चाहिए।’ यह हिटलर के महिलाओं के लिए जारी किए गए आदेशों जैसा ही है कि महिलाओं का जीवन रसोईघर, बच्चों और चर्च के इर्दगिर्द घूमना चाहिए।

    आरएसएस सच बार-बार सामने आ ही जाता है

    हिन्दुत्व के प्रमुख विचारक सावरकर ने महान राजा शिवाजी की इस बात के लिए निंदा की थी कि उन्होंने बसेन के राजा की बहू को ससम्मान वापिस भिजवा दिया था जिसे एक तोहफे के रूप में शिवाजी की सेना ले आई थी। उनके अनुसार प्रतिशोध के लिए मुस्लिम महिलाओं पर जुल्म ढाना जरूरी था।

    इस बार सावधान रहने की जरूरत

    आरएसएस अपनी वास्तविक विचारधारा को छिपाने के लिए भ्रामक बातें करता है लेकिन सच बार-बार सामने आ ही जाता है। पिछली बार अन्ना और केजरीवाल के नेतृत्व में हुए आंदोलन को आरएसएस ने सहारा दिया था ताकि उसके जरिए कांग्रेस को बदनाम किया जा सके। इसलिए इस बार हमें सावधान रहने की जरूरत है। यह जरूरी है कि हम धीरे-धीरे लोकतंत्र के रास्ते पर वापिस लौटें, लोकतांत्रिक ताकतों को कंधे से कंधा मिलाकर जोर लगाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि टी. मोहनदास और उनके विचारधारात्मक गुरू इस सुंदर प्रतिरोध पर काबिज होकर हिन्दू राष्ट्रवाद के विभाजनकारी एजेंडे को सशक्त बनाने में कामयाब न हो पाएं।

    सरकार

    देश के ज्यादातर लोग वर्तमान शासकों से तंग आ चुके हैं और अगर चुनाव ईमानदारी से करवाए गए (यह एक बड़ा अगर है) तो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में इन्हें कोई जगह नहीं मिल पाएगी। मोहनदास का वक्तव्य एक अन्य मोहनदास की राजनीति का धुर विरोधी है जिन्हें नेताजी बोस का अनुसरण करते हुए हम ‘राष्ट्रपिता‘ कहते हैं।

    (लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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