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    पाक-तुर्क-सऊदी गुटबंदी सिर्फ कूटनीतिक घटना नहीं है, इससे भारत की सैन्य रणनीति प्रभावित होगी

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 10, 2026

    पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने हाल में जिस मक्का समझौते की घोषणा की है उसका भारत के रक्षा योजनाकारों को काफी सावधानी से विश्लेषण करने की जरूरत है. जब इसकी तैयारी चल रही थी, तब भारत इसे भू-राजनीति वाले पहलू के चश्मे से देख रहा था और इस सवाल पर विचार कर रहा था कि कहीं यह मध्य-पूर्व में बन रहे एक नए समीकरण का संकेत तो नहीं है या क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के लिए एक कूटनीतिक संदेश तो नहीं है. विश्लेषण में मुख्यतः ज़ोर इसके क्षेत्रीय और रणनीतिक प्रभावों पर रहा है.

    वैसे, भारतीय सेना के लिए सवाल ऑपरेशन से जुड़ा है. सैन्य अभियान दो प्रमुख तत्वों से तय होते हैं—एक तो रणक्षेत्र से, जहां युद्ध होना है; दूसरे, उन राजनीतिक स्थितियों से, जिनके तहत युद्ध होना है. यह जो गुटबंदी हुई है वह इन दोनों तत्वों में बदलाव ला सकती है. यह लड़ाई के मैदान में पाकिस्तान की क्षमता बढ़ा सकती है और उस राजनीतिक दबाव को बढ़ा सकती है जो लड़ाई को जल्दी खत्म करा सकता है. और यह भारत को अपनी सैन्य सफलताओं को रणनीतिक उपलब्धियों में बदलने के लिए कम समय दे सकता है.

    घटती राजनीतिक समयसीमा

    ऑपरेशन सिंदूर ने संकेत दे दिया है कि भावी भारत-पाकिस्तान लड़ाइयां लंबी, थकाऊ लड़ाई की जगह राजनीतिक दृष्टि से कम समय की मुहिमों जैसी होंगी. ऐसे ऑपरेशन गहरी अंतरराष्ट्रीय निगरानी में होंगे, जिन्हें खत्म कराने की कूटनीतिक कवायद ऑपरेशन शुरू होते ही शुरू हो जाएगी.

    छोटी लड़ाई भारतीय रणनीति के लिए ज्यादा प्रतिकूल होगी. भारत विश्वसनीय लक्ष्यों के लिए लड़ता है जिसके लिए चरणबद्ध ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है—दुश्मन को कमजोर करने, उसका शोषण करने, खुद को मजबूत करने, और इतना बड़ा नतीजा हासिल करने के ऑपरेशन, जो पाकिस्तान को अपना हिसाब-किताब बदलने को मजबूर कर दे. हर चरण अपना समय लेता है. पाकिस्तान युद्धविराम की घोषणा तक ही टिके रहने की लड़ाई लड़ता है. राजनीतिक समयसीमा के लिहाज से कम होता एक-एक दिन भारत को पाकिस्तान के मुक़ाबले महंगा पड़ता है.

    सऊदी अरब के अच्छे-खासे हित दोनों के साथ जुड़े हैं. ऊर्जा, निवेश, और आर्थिक क्षेत्रों में भारत के साथ उसके गहरे संबंध हैं. और पाकिस्तान के साथ रक्षा, वित्त और रणनीतिक मामलों में उसके संबंधों में विस्तार हो रहा है. सऊदी अरब का हित इसी में है कि क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा बाज़ारों, और ‘विजन 2030’ के तहत उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को खतरा पहुंचाने वाली कोई लंबी लड़ाई न हो. ये हित नयी गुटबंदी से पहले भी मौजूद थे, और सऊदी अरब ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन हितों के मद्देनजर ही कदम उठाए.

    इस गुटबंदी से फर्क यह पड़ा है कि सऊदी अरब की स्थिति बदल रही है. यह मुल्क एक उदार तीसरे पक्ष वाली मध्यस्थ की भूमिका से पाकिस्तान के साथ संधि करके उसके सहयोगी की भूमिका में आ गया है. वह पाकिस्तान के सैन्य तंत्र में सीधी समान भागीदारी करेगा, उसके कमांड ढांचे में उसकी संस्थागत पहुंच बनेगी, और वह दावा करेगा कि उससे सलाह की जाए. और पाकिस्तान को भी सऊदी अरब से संधि के तहत समर्थन हासिल करने का जायज अधिकार होगा. सऊदी अरब की मंशा निश्चित बनी रह सकती है लेकिन उसके पीछे की ताकत और उसे लागू करने की गति, दोनों बढ़ जाएगी. भारतीय कमांडरों के लिए सामरिक सफलता को ऑपरेशन संबंधी उपलब्धि में बदलने की गुंजाइश छोटी हो जाएगी.

    डिफेंस का नया उभरता माहौल

    यह गुटबंदी लड़ाई के मैदान का स्वरूप भी बदल सकती है. यह पाकिस्तान की सेना के आधुनिकीकरण में चीन की भूमिका को खत्म करने की जगह उसे केंद्रीय भूमिका प्रदान कर रही है.

    चीन रणनीति की रीढ़ बना हुआ है. पाकिस्तान चीनी लड़ाकू विमानों, लंबी दूरी वाला एअर डिफेंस, सटीक मार करने वाले हथियारों, नौसैनिक अड्डों, और उपग्रह से निर्देशित जहाजरानी का इस्तेमाल करता है. खुफियागीरी, निगरानी, और टोही व्यवस्था (ISR), AI, कमांड-व-कंट्रोल, मिसाइल टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रोनिक युद्ध आदि के मामलों में चीनी सहायता बढ़ती जा रही है. जे-35 समेत फ़िफ्थ जेनरेशन वाले लड़ाकू विमानों को शामिल किए जाने के साथ यह सहयोग और गहरा होगा और चीन को इस उपमहादेश में सैन्य संतुलन को प्रभावित करने का एक और कुंजी थमाएगा.

    तुर्किये अलग तरह की क्षमताएं हासिल करने में योगदान देगा. बायकर, असेल्सन, रॉकेटसन, हवेल्सन और टर्किश एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ जैसी कंपनियों ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, युद्धक्षेत्र संचार, लॉइटरिंग म्यूनिशन, सटीक-निर्देशित हथियार, क्रूज़ मिसाइल और नौसैनिक युद्ध प्रणालियां विकसित की हैं, साथ ही उन्हें एकीकृत करने का परिचालन अनुभव भी हासिल किया है. यह वर्षों के द्विपक्षीय प्रयासों से विकसित हुआ जिसमें MILGEM कोरवेट प्रोग्राम, और पाकिस्तान की अगोस्टा-90B पनडुब्बी का आधुनिकीकरण शामिल है. इसके अलावा, तुर्क और पाकिस्तानी सेना, खासकर वायुसेनाएं एक नियमित संस्थागत तरीके से साथ-साथ ट्रेनिंग लेती हैं. सऊदी अरब वित्तीय मजबूती और औद्योगिक क्षमता बढ़ाता है, जो हथियारों की खरीद में तेजी लाती है और निरंतर आधुनिकीकरण में भी मदद करती है.

    जो कुछ हो रहा है उसमें ज्यादा योगदान चीन-पाकिस्तान संबंधों का है और यह सऊदी अरब के बिना भी चलता रहेगा. इस गुटबंदी का योगदान यह है कि गति और पहुंच बढ़ी हैं. सऊदी अरब के पैसों ने पाकिस्तान की जरूरतों को ऑर्डर में बदल दिया है. तुर्किये के उद्योग वह सब उपलब्ध करा रहे हैं जो चीन कम सप्लाई करता है. यह सब युद्ध के दौरान चीन के साथ-साथ नाटो के एक सदस्य के जरिए सप्लाई का दूसरा चैनल तैयार करता है.

    एकीकरण के कारण टकराव भी पैदा होता है. चीनी कमांड ढांचा, डाटा, और उपग्रह नेटवर्क के साथ तुर्किये की युद्धक्षेत्र मैनेजमेंट सिस्टम, इलेक्ट्रोनिक युद्ध के सूईट्स, और संचार तंत्र का बेमेल जुड़ाव होता है. मानकों, सॉफ्टवेयर, और साइबर सिक्यूरिटी प्रोटोकॉल आदि में अंतर वास्तविक हैं, और टाइमिंग के लिहाज से इनका काफी महत्व होता है. दो सप्लायर्स की संरचनाओं में सेंसर से शूटर तक तालमेल बैठाने में वर्षों लग सकते हैं. भारतीय योजनाकार इसे एक दीर्घकालिक समस्या मान सकते हैं. म्यूनिशंस, मंडराने वाले म्यूनिशंस, इलेक्ट्रोनिक युद्ध में काम आने वाले औजार, कल-पुर्जे आसानी से उपलब्ध हैं. इन्हें मौजूदा भंडारों और उत्पादन कारखानों से सप्लाइ किया जाता है, इनके लिए सिस्टम्स के एकीकरण से ज्यादा व्यापारिक तालमेल की जरूरत पड़ती है. सिस्टम्स के एकीकरण में वर्षों लगते हैं लेकिन युद्ध के दौरान दोबारा सप्लाइ सप्ताहों के अंदर की जाती है. छोटी लड़ाइयों का फैसला इससे होता है कि कौन कितना टिक सकता है.

    लड़ाई का मैदान कैसे बदल रहा है

    हाल में हुई गुटबंदी का महत्व इस बात में है कि यह युद्ध के अलग-अलग प्लेटफॉर्म को निशाना बनाने की जगह पूरी संरचना को निशाना बनाती है. चीन उपग्रहों और हवाई सेंसरों के जरिए रणनीतिक ‘ISR’ उपलब्ध कराता है. तुर्किये इसमें ऑपरेशन और सामरिक स्तरों पर ड्रोन ‘आइएसआर’ और युद्धक्षेत्र की निगरानी की व्यवस्था जोड़ता है. ये दोनों मिलकर युद्धक्षेत्र की ज्यादा मजबूत तस्वीर तैयार कर सकते हैं. इसके कारण भारत को सेना की तैनाती, रिजर्व सेना के मूवमेंट, साजोसामान, और हेडक्वार्टरों को गुप्त रखने में मुश्किल हो सकती है.

    यह संरचना पाकिस्तान की नई आर्मी रॉकेट फोर्स के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ का काम करेगी. लंबी दूरी तक सटीक मार करने वाले हथियारों को नेटवर्क का सहारा चाहिए. चीन के रणनीतिक ‘आइएसआर’ के साथ तुर्क की सामरिक निगरानी सिस्टम के बूते पाकिस्तान दूर तक अपने टार्गेट की खोज और पीछा करने तथा निशाना बनाने की क्षमता बढ़ा सकता है. ऐसे में भारतीय सेना के हेडक्वार्टर्स, साजोसामान के अड्डे, पुल, रिजर्व सेना के अड्डे, हवाई अड्डे, गोला-बारूद के भंडार, और डिफेंस मैनुफैक्चरर तथा सैन्य उद्योग निशाने पर आ जाएंगे. भारत के पास काफी दूर तक मार करने वाली मिसाइलें हैं लेकिन उसे ऐसी आर्मी रॉकेट फोर्स तैयार करनी है जिसके साथ एक ओपरेशनल कमांड के तहत थिएटर के काम आने वाली ‘ISR’, निशाना बनाने वाली व्यवस्था और लंबी दूरी तक फायर करने वाली क्षमता जुड़ी हो.

    ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, प्रिसीजन वेपन के साथ जमीनी कार्रवाइयों का तालमेल बैठाने के जो तुर्क प्रयोग हैं वे पाकिस्तानी सेना के साथ तालमेल से काम करने की पाकिस्तानी वायुसेना की लंबी परंपरा को मजबूती दे सकते हैं. यह परंपरा पूर्व संघीय ढांचे के तहत जनजातीय इलाकों, खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान की सीमा पर चलाए गए ऑपरेशनों के दौरान कायम हुई. तुर्किये के मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहन के साथ चीनी फाइटर्स, लंबी दूरी तक मार करने वाले वेपन्स, और कमांड सिस्टम्स जवाबी हवाई सहारा उपलब्ध कराने के अलावा दुश्मन के अंदरूनी इलाके में उसकी सप्लाइ व्यवस्था को ठप करने, हवाई तथा जमीनी ऑपरेशनों में तालमेल बैठाने की पाकिस्तान की क्षमता में इजाफा कर सकते हैं. भारतीय वायुसेना लड़ाकू विमानों के अधिकृत से कम संख्या में स्क्वाड्रन ऑपरेट करती है. इसके कारण उसे यह फैसला करना पड़ता है कि वह इन विकल्पों में से किसे चुने—काउंट-एअर, रणनीतिक हमले, एअर डिफेंस, और थल सेना को सहारा. थिएटर के लिहाज से एकीकरण में देरी तेज रफ्तार वाले छोटे अभियानों के दौरान तालमेल में उलझन पैदा कर सकती है. पाकिस्तान में जो सुधार हो रहे हैं उनसे भारत के लिए ऑपरेशन से संबंधित कोई नई चुनौती नहीं पैदा हुई है. वे मौजूदा कमजोरियों को गंभीर बनाते हैं.

    आधुनिक ऑपरेशंस लचीली, गुप्त और मोबाइल संचार तंत्र पर निर्भर होते हैं, जो सेंसरों, कमांडरों और शूटरों से जुड़े हों. तुर्किये ने युद्धक्षेत्र में नेटवर्किंग और कमांड सिस्टम के मामलों में जो काम किया है उसके साथ AI, कमांड-व-कंट्रोल, इलेक्ट्रोनिक युद्ध के मामलों में चीनी निवेश का मेल हमले के दौरान ऑपरेशन में तालमेल कायम रखने तथा दुश्मन की निर्णय प्रक्रिया को छिन्न-भिन्न करने की पाकिस्तान की क्षमता बढ़ाएगा. तब लड़ाई का दारोमदार इस पर होगा कि किसका संचार तंत्र निरंतर इलेक्ट्रोनिक हमलों के बीच ज्यादा समय तक टिका रहता है.

    यूक्रेन, नागोर्नो-काराबाख, और मध्य-पूर्व ने दिखा दिया है कि इलेक्ट्रोनिक युद्ध के साथ सस्ते ड्रोन पारंपरिक किस्म की सेना को कितना भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. जवाबी मानव रहित एरियल सिस्टम और इलेक्ट्रोनिक युद्ध ही कुशल सेना, साजोसामान, तोपखानों, और हेडक्वार्टर्स के टिकाऊपन का फैसला करेंगे. एकीकृत सैन्य टुकड़ियों की ओर कदम बढ़ाने के बावजूद भारत में ऑपरेशनों की जो अवधारणा है वह बड़े हेडक्वार्टर्स, केंद्रीकृत साज-ओ-सामान अड्डों, आर्मर्ड फॉरमेशनों पर आधारित है जिन्हें बीते दौर के लिए डिजाइन किया गया था. मजबूत ‘ISR’, ड्रोन, इलेक्ट्रोनिक युद्ध और प्रिसीजन फायर यह सवाल खड़ा करते हैं कि वे ढांचे कितनी देर तक टिक पाएंगे. चुनौतियां केवल खरीद के मामले में नहीं हैं. सवाल ऑपरेशन के डिजाइन के भी हैं, जो अगला युद्ध लड़ने की भारतीय सेना की योजना को स्वरूप प्रदान करेंगे.

    आधुनिकीकरण के दो रास्ते

    पाकिस्तान ने साझीदारी आधारित मॉडल को अपनाया है, कई विदेशी साझीदारों से क्षमताएं हासिल करके उन्हें तेजी से समाहित किया है. यह खर्चीला है. विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता से रणनीतिक स्वायत्तता सीमित होती है, टेक्नोलॉजी के मामले में निर्भरता बढ़ती है, और पाकिस्तान विदेशी राजनीति से प्रभावित हो सकता है. यह सब वह बार-बार अनुभव कर चुका है. उसका जो बुरे हाल औद्योगिक और वित्तीय आधार है उसके साथ वह जल्दी से आधुनिकीकरण करना चाहे तो उसके पास वास्तविक विकल्प कम ही हैं.

    भारत की स्थितियां भिन्न हैं. एक बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ अच्छी-ख़ासी वैज्ञानिक तथा औद्योगिक क्षमता के बावजूद आत्मनिर्भरता उसका दीर्घकालिक लक्ष्य बना हुआ है, क्योंकि कोई भी बड़ी ताकत अहम सैन्य क्षमता के लिए विदेशी सप्लायरों पर अनंत काल तक निर्भर नहीं रह सकती. सवाल क्रम निर्धारण का है. देसी क्षमता विकास लंबी प्रक्रिया है, इसलिए ऑपरेशन संबंधी जो माहौल है वह दोआयामी तरीका अपनाने की जरूरत बताता है. घरेलू रक्षा उत्पादन का आधार बनाइए और जिन अल्पकालिक कमजोरियों के कारण युद्धक्षेत्र में प्रभाव घटता हो उन्हें दूर करने के लिए बाहर से टेक्नोलॉजी हासिल करने, उन्हें संयुक्त रूप से विकसित करने या शामिल करने के मामले में लचीला रुख रखें. औद्योगिक संप्रभुता और ऑपरेशन के लिए तैयारी, दोनों एक-दूसरे को मजबूती दें, ऐसी स्थिति बनाएं.

    पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब की गुटबंदी को केवल कूटनीतिक घटना न मानें, उसका आकलन ऑपरेशन के नजरिए से भी करें. यह युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान को मजबूत बनाने के अलावा ऐसे राजनीतिक हालात पैदा कर सकती है कि भारत को ताकत के इस्तेमाल के लिए कम समय रहे. दोनों बातें एक साथ लागू होती हैं.

    एक परिणाम जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह है पाकिस्तान की पुरानी अकड़. क्षमता से आचरण तय होता है, आश्वासन पहल को स्वरूप देता है. जो पाकिस्तानी नेतृत्व सऊदी अरब के साथ संधि, तुर्क सप्लाई, और चीनी मजबूती को अपने लिए रणनीतिक सर्वाधिकार मानता हो, वह दुस्साहस कर सकता है. वह टकराव बढ़ाना पहले से सस्ता मान सकता है और यह हिसाब लगा सकता है कि लागत बढ़ने से पहले बाहरी दखल लड़ाई को रोक देगा. यह एक अकेले अभियान की मुश्किल झेलने की जगह एक संकट खड़ा करने का खतरा पैदा करता है.

    भारत के सैन्य योजनाकारों के लिए केंद्रीय चुनौती एक ताकतवर दुश्मन के लिए तैयारी करने से ज्यादा बड़ी है. यह संकरी होती राजनीतिक गुंजाइश के अंदर निर्णायक ऑपरेशन को अंजाम देने की चुनौती है. इसके लिए ऑपरेशन से संबंधित अवधारणा, सेना के ढांचे, कमांड तंत्र, और महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी को लड़ाई के मैदान में पहुंचाने की गति आदि का नए सिरे से आकलन करने की जरूरत है.

    ब्रिगेडियर अनिल रमन (रिटायर्ड) तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में रिसर्च फेलो हैं. विचार निजी हैं.

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