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    ऐसी समस्या का समाधान कर रहे हैं भारत के धर्मांतरण कानून, जिसका अस्तित्व है ही नहीं

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 24, 2026

    आज हम जो कानून पास कर रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा और न्याय जैसी सभी समस्याओं को पूरी तरह से हल कर चुके हैं और इसीलिए ऐसे कानून बना रहे हैं जो निजी आस्था और इस बात से जुड़े हैं कि किन देवताओं को मानना ​​चाहिए और किन्हें नहीं।

    आकार पटेल

    Published: 23 Aug 2026, 9:00 PM

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    इस हफ़्ते की सुर्खी थी: “पुणे पुलिस ने धर्म-परिवर्तन कानून के प्रावधानों को 2 मामलों में वापस लिया, क्योंकि अधिकारियों को पता चला कि यह कानून अभी लागू ही नहीं हुआ है।”

    हमारे हमेशा सतर्क रहने वाले कानून लागू करने वालों ने न सिर्फ़ पुराने कानूनों की समस्याओं को सुलझाया है, बल्कि भविष्य की समस्याओं का भी समाधान कर लिया है। जिस नए कानून की बात हो रही है, वह अब लागू हो चुका है और यह उन तोहफ़ों में से एक है जो बीजेपी ने 2018 में उत्तराखंड में ऐसे पहले कानून के आने के बाद से भारत को दिए हैं। भारत में धर्म का प्रचार करने की आज़ादी एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25) भी है और एक आपराधिक अपराध भी। इससे कुछ लोगों को उलझन हो सकती है कि हम असल में क्या करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र की जननी भारत समझदार है और जानता है कि अपने बच्चों को कैसे सही रास्ते पर रखना है।

    मैंने इस बाबत पहले भी इन कानूनों की खास समस्याओं के बारे में यहां लिखा है और मैं उन्हें दोहराऊंगा नहीं। लेकिन हमें यह देखना चाहिए कि असल में वे कौन सी समस्याएं हैं जिन्हें ये कानून हल करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में धर्म परिवर्तन का मुद्दा आखिर है कितना बड़ा?

    भारत में धर्म परिवर्तन ऐतिहासिक रूप से समुदायों के माध्यम से हुए हैं। किसी व्यक्ति के लिए भारत में अपना धर्म बदलना मुश्किल होता है क्योंकि समुदाय और परिवार से संबंध बहुत मजबूत होते हैं। इस सामाजिक कारण और साथ ही धर्म की स्वतंत्रता पर लगी पाबंदियों के कारण, भारत में धर्म परिवर्तन की संख्या काफी कम है।

    15 सितंबर, 1981 के अंक में ‘इंडिया टुडे’ ने रिपोर्ट दी थी कि ‘गृह मंत्रालय द्वारा बहुत मेहनत से तैयार किए गए आंकड़ों से पता चला है कि पिछले चौदह महीनों में धर्म परिवर्तन के जो मामले दर्ज किए गए—उनमें ज़्यादातर हरिजन लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन शामिल था, और उनकी संख्या 5,000 से ज़्यादा नहीं थी।’ इसमें यह भी कहा गया था कि हालांकि उत्तर भारत से भी धर्म परिवर्तन की कुछ खबरें आई थीं, लेकिन ये मुख्य रूप से तमिलनाडु में हो रहे थे; वहां पिछले आठ महीनों में लगभग 2,000 लोगों ने धर्म बदला था, जबकि 1944 से 1980 के बीच यह संख्या 1,500 से भी कम थी।

    7 मार्च 2017 को, मलयालम मनोरमा ने एक गैर-लाभकारी संस्था – एनजीओ (मीडिया डेवलपमेंट एंड रिसर्च फाउंडेशन, कोझिकोड) की रिसर्च के बारे में बताया। इस रिसर्च से पता चला कि जनवरी 2011 और दिसंबर 2017 के बीच केरल में धर्म बदलने वाले 60 प्रतिशत

    नाम बदलने के सरकारी रिकॉर्ड से पता चला कि सात साल की इस अवधि में 8,334 लोगों ने धर्म बदला था। इनमें से 4,968 लोगों ने हिंदू धर्म अपनाया; इनमें से ज़्यादातर लोग (4,756) ईसाई और 212 मुस्लिम थे। कुल मिलाकर, धर्म बदलने वालों में 2,244 महिलाएं और 2,724 पुरुष थे।

    मुस्लिम बनने वाले 1,864 लोगों में से 78 प्रतिशत पहले हिंदू थे, और इनमें पुरुष और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर थी। वहीं, ईसाई बनने वाले 1,496 लोगों में से 95 प्रतिशत हिंदू थे, जिनमें 720 महिलाएं और 776 पुरुष शामिल थे। छह लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया; इनमें से पांच हिंदू थे और एक ईसाई था, और कुल मिलाकर दो महिलाएं और चार पुरुष थे। इस बारे में राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।

    हालांकि, उससे कुछ साल पहले ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की एक रिपोर्ट (‘केरल में 5 साल में लगभग 6,000 लोगों ने इस्लाम अपनाया: रिपोर्ट’, 15 जुलाई 2016) में पुलिस की एक ‘इंटेलिजेंस रिपोर्ट’ का ज़िक्र किया गया था, जिसमें बताया गया था कि 2011 और 2015 के बीच 5,793 लोगों ने धर्म परिवर्तन किया था। इनमें से लगभग आधे पुरुष और आधी महिलाएं थीं। धर्म परिवर्तन करने वालों में 4,719 हिंदू और 1,074 ईसाई थे। तमिलनाडु, गुजरात या केरल—कहीं के भी हों, इन सालों के ये आंकड़े विश्व हिंदू परिषद द्वारा कराए गए धर्म परिवर्तनों के सामने बहुत कम लगते हैं।

    26 अक्टूबर 2019 को पीटीआई ने विश्व हिंदू परिषद के हवाले से बताया कि उसने 2018 में 25,000 मुसलमानों और ईसाइयों—जिनमें ज़्यादातर आदिवासी थे—का हिंदू धर्म में धर्मांतरण किया। 8 जनवरी 2016 को पीटीआई ने खबर दी कि वीएचपी नेता प्रवीण तोगड़िया ने एक रैली में दावा किया कि उनके संगठन ने पिछले दस सालों में पांच लाख से ज़्यादा ईसाइयों और 2.5 लाख मुसलमानों का हिंदू धर्म में धर्मांतरण किया है।

    तोगाड़िया ने कहा, “हमारी ‘घर वापसी’ की दर हर साल लगभग 15,000 थी। लेकिन पिछले साल हमने 40,000 का आंकड़ा पार कर लिया, जिसमें आरएसएस के आंकड़े शामिल नहीं हैं। अगर भारत में हिंदुओं को बहुमत में रहना है और अपने धर्म को बचाना है, तो हमें करोड़ों लोगों को अपने धर्म में लाने के लिए और भी कई ‘घर वापसी’ अभियान चलाने होंगे।” इसके लिए उन्होंने कहा कि वीएचपी “एक ऐसा बिल चाहती है जिससे लोगों का दूसरे धर्मों में धर्मांतरण करना मुश्किल हो जाए।”

    13 दिसंबर 2015 को रेडिफ़ ने उस व्यक्ति का इंटरव्यू लिया जो आगे चलकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने (‘योगी आदित्यनाथ ने धर्म-परिवर्तन-रोधी कानून का प्रस्ताव रखा, लेकिन “वापस धर्म बदलने” पर कोई रोक नहीं’)। अपने संगठन ‘हिंदू युवा वाहिनी’ की गतिविधियों के बारे में बात करते हुए उन्होंने दावा किया, ‘हम पिछले दस सालों में कई लाख मुसलमानों और ईसाइयों का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें हिंदू धर्म में वापस लाए हैं। मैं बस ऐसे लोगों को उनके पुराने घर वापस ला रहा हूं जहां से उन्हें लालच या ज़बरदस्ती से दूर कर दिया गया था।’

    उन्होंने बताया कि वे कानून से अपने धर्म-परिवर्तन के लिए छूट क्यों चाहते थे: ‘अगर किसी के पूर्वजों ने सैकड़ों साल पहले इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया था, तो क्या हुआ? समय से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इसलिए, मुगल बादशाह औरंगज़ेब के शासनकाल में—जब सबसे ज़्यादा बड़े पैमाने पर धर्म-परिवर्तन हुए थे—जिन हिंदुओं को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया था, उन्हें उस नए कानून के तहत छूट मिलनी चाहिए जिसे बीजेपी बनाना चाहती है।’

    और सचमुच, 2018 के बाद बने बीजेपी के कानूनों में खास तौर पर उन लोगों को छूट दी गई है जो ‘अपने पुरखों के धर्म’ को अपनाते हैं। आज हम जो कानून पास कर रहे हैं, उनके पीछे यही पृष्ठभूमि है। बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा और न्याय जैसी सभी समस्याओं को पूरी तरह से हल करने के बाद, अब लोकतंत्र की जननी ऐसे कानूनों को पास कर रही है और उसकी पुलिस उन्हें लागू कर रही है, जो निजी आस्था और इस बात से जुड़े हैं कि किन देवताओं को मानना ​​चाहिए और किन्हें नहीं।

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