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    SIR – कमल हासन ने कहा- बिहार कई ज़िंदा मुर्दों की भूमि बन गया है तो दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद दी तीखी दलील

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldFebruary 5, 2026

    अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने बुधवार को राज्य सभा में एक चेतावनी दी और कहा कि इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

    कमल हासन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के संयुक्त सत्र में दिए गए अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोल रहे थे.

    कमल हासन ने अपने भाषण में एसआईआर का मुद्दा उठाया और इस साल तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए बड़ी चिंता के तौर पर पेश किया.

    हासन ने कहा कि मतदान का अधिकार ही जांच के दायरे में लाया जा रहा है. उन्होंने सदन में कहा, “हम वोट डालना चाहते हैं सर और आयोग हमारे वोट देने के अधिकार की जांच कर रहा हैं. लोगों को वर्तनी और पते को लेकर जांच का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें अक्सर ग़लतियां होती हैं.”

    एसआईआर प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कमल हासन ने कहा, “बिहार कई ज़िंदा मुर्दों की भूमि बन गया है और हम नहीं चाहते कि यह बीमारी पूरे देश में फैले.”

    दरअसल कई ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई थी कि बिहार में एसआईआर के दौरान ज़िंदा मतदाताओं को मृत बता दिया गया और उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया.

    कमल हासन ने कहा कि चुनाव आयोग इस समस्या को बढ़ावा दे रहा है. उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग निश्चित रूप से इस बिहार वाली बीमारी के प्रसार को सुविधाजनक बना रहा है.”

    कमल हासन ने कहा कि एसआईआर “जीवित मृतकों की स्पेल चेक कहानी” है. उन्होंने तर्क दिया कि मामूली ग़लतियों को अयोग्यता के रूप में लिया जा रहा है.हासन ने कहा कि वर्तनी की ग़लतियां केवल भाषाओं के लिए अभिशाप हैं और आधुनिक साहित्य विषयवस्तु के पक्ष में उन्हें माफ़ कर देता है, जैसे इंटरनेट करता है लेकिन “चुनाव आयोग स्पष्ट रूप से ऐसा नहीं करता.”

    मक्कल निधि मय्यम पार्टी के संस्थापक कमल हासन ने चेतावनी दी कि अगर यह मुद्दा उनके गृह राज्य तमिलनाडु तक पहुंचा तो इसका पैमाना क्या हो सकता है.

    उन्होंने कहा, “हमें डर है कि तमिलनाडु में काग़ज़ों पर जल्द ही लगभग एक करोड़ जीवित मृतक हो सकते हैं. जिनके नाम काटे गए हैं, उन्हें फिर से मतदान का अधिकार मिले.”

    उन्होंने कहा, “अगर आप हमारी मदद करने से इनकार करते हैं, तो आप आधी-अधूरी, अधपकी और अवैध चुनावी विजय के अलावा कुछ हासिल नहीं करते.”

    कमल हासन की बात का विपक्षी सदस्यों ने ज़ोरदार तरीक़े से मेजें थपथपाकर स्वागत किया.

    कमल हासन के बगल में बैठे राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने भाषण के बाद उनसे हाथ मिलाकर शाबाशी दी.

    हासन ने कहा, ”लोकतंत्र का मतलब विजय नहीं होता है. लोकतंत्र में कोई विजय प्राप्त नहीं करता और लोकतांत्रिक भारत का यह विशाल रथ आगे बढ़ता रहेगा.”

    कमल हासन

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,कमल हासल अभियन की दुनिया से राजनीति में आए हैं

    ‘लोकतंत्र को केवल जीत में नहीं देखा जाता’

    उन्होंने कहा, “यह लोकतांत्रिक जगर्नॉट मतभेदों को रौंदते हुए आगे बढ़ेगा लेकिन लोगों को कभी नहीं रौंदना चाहिए. हम इसे होने नहीं देंगे. कोई भी अमर नहीं है. कोई भी सरकार स्थायित्व का लक्ष्य नहीं रख सकती और न ही रखना चाहिए. इस दुनिया के इतिहास में किसी भी सरकार ने इसे हासिल नहीं किया है और न ही कभी करेगी. यह सरकार भी उस सार्वभौमिक, अलिखित राजनीतिक क़ानून के अंतर्गत आती है. हमें प्रगतिशील लोकतंत्र के साथ परिपक्व होने की ज़रूरत है.”

    अपने भाषण में हासन ने व्यक्तिगत यात्रा का भी ज़िक्र किया. उन्होंने सिनेमा से राजनीति तक और तमिल इतिहास से अपने जुड़ाव के बारे में बताया.

    उन्होंने कहा, “परमकुडी से आया एक बच्चा, जो मेरा जन्म स्थान है, सिनेमा के ज़रिए प्रसिद्धि तक पहुंचा. उसी समय मेरा परिचय सिनेमा से और अपने तमिल इतिहास से हुआ. मैंने एक भ्रमित करने वाली वास्तविकता का सामना किया. ऐसी वास्तविकता जो हमारे संविधान में किए गए इस वादे को प्रतिबिंबित नहीं करती थी कि भारत राज्यों का एक संघ है”.

    उन्होंने अपने शिक्षकों और उनकी राजनीतिक सोच पर पड़े प्रभाव को याद किया और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरई का नाम लिया. हासन ने कहा, “उन्होंने हमें हमारी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारे अधिकारों पर किसी भी आक्रमण का सामना करना सिखाया.”

    ममता बनर्जी

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद ही संभाला मोर्चा

    एक तरफ़ कमल हासन संसद में एसआईआर का मुद्दा उठा रहे थे तो दूसरी तरफ़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को ख़ुद ही सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रख रही थीं.

    ममता बनर्जी, जिन्होंने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत व्यक्तिगत हैसियत में रिट याचिका दायर की थी. ममता ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग उनके राज्य को निशाना बना रहा है और वहाँ के लोगों को “बुलडोज” कर रहा है.

    अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष पेश होने से पहले, बनर्जी लगभग तीन घंटे तक कोर्टरूम-एक की भरी हुई दर्शक दीर्घा में चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करती रहीं. अदालत में ममता का दिन सुबह 10.05 बजे शुरू हुआ, जब उनकी गाड़ी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य द्वार से भीतर दाखिल हुई. उनकी मौजूदगी की पुष्टि करते हुए उनके नाम का गेट पास बनाए जाने के कारण सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई थी.”

    एक्सप्रेस ने लिखा है, ”हालांकि उनकी गाड़ी सीधे चीफ़ जस्टिस के कोर्टरूम नंबर एक की सीढ़ियों के पास खड़ी थी लेकिन बनर्जी ने बगल की सीढ़ियों से जाने का विकल्प चुना. इससे उन्हें अदालत के गलियारों से होकर लंबी पैदल दूरी तय करनी पड़ी.”

    सुप्रीम कोर्ट में ममता की दलील

    ”उन्होंने वकीलों का अभिवादन किया और तुरंत आगे की पंक्ति में बैठने के बजाय दर्शक दीर्घा में जाकर बैठ गईं. दोपहर 12.50 बजे, जब आम तौर पर अदालत लंच ब्रेक के लिए उठने ही वाली होती है, पश्चिम बंगाल की क़ानूनी टीम ने मामला सीजेआई के समक्ष मेंशन किया. “आइटम नंबर 37 मैडम ममता का है,” सीजेआई ने कहा और जोड़ा कि मामले की सुनवाई कुछ ही मिनटों में होगी.”

    राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलीलें शुरू कीं और कहा कि मसौदा मतदाता सूची में कई तार्किक विसंगतियां बंगाली से अंग्रेजी में नामों के अनुवाद के अंतर के कारण हैं. 2003 की मतदाता सूची बंगाली में है, जिसे मौजूदा पुनरीक्षण के लिए अंग्रेजी में अनुदित किया जा रहा है. वकीलों ने दत्ता जैसी वर्तनी के अंतर के उदाहरण भी दिए.

    ममता बनर्जी

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है

    असम में एसआईआर क्यों नहीं?

    लाइव लॉ ने लिखा है, ”जब जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जो जस्टिस विपुल एम पंचोली के साथ बेंच का हिस्सा थे, अपने सहयोगियों को बंगाली उच्चारण समझा रहे थे, तभी बनर्जी ने पहली बार हस्तक्षेप किया.

    उन्होंने कहा, “क्या मैं समझा सकती हूं, सर. मैं उसी क्षेत्र से आती हूं.”

    लाइव लॉ ने लिखा है, ”ममता ने नामों के मेल न खाने के कारण बाहर कर दिए गए आम मतदाताओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि “दरवाज़े के पीछे न्याय रो रहा है.” उन्होंने बेटियों के ससुराल चले जाने और घर बदलने के बाद पूरे परिवार के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के उदाहरण भी दिए.

    उन्होंने कहा, “जिस काम में दो साल लगते हैं, उसे केवल तीन महीने में करने की इतनी जल्दी क्या थी. ममता ने “लोकतंत्र को बचाने” की अपील की. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने बीजेपी शासित राज्यों से माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं “ताकि बंगाली लोगों को कुचला जा सके.”

    सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई नौ फ़रवरी के लिए तय की.

    आयोग और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर, अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को एक अन्य याचिका के साथ सुना जाए, जिसमें निर्वाचन आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में पश्चिम बंगाल में अपने अधिकारियों को झेलनी पड़ रही “शत्रुता” का उल्लेख किया है.

    याचिका दायर करने का कारण बताते हुए बनर्जी ने अदालत से कहा, “हमें न्याय नहीं मिल रहा है. हमने सभी विवरणों के साथ ईसीआई को छह पत्र लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हैं.

    सीजेआई ने निर्वाचन आयोग से कहा कि नामों की वर्तनी जैसी मामूली विसंगतियों के आधार पर नोटिस जारी करते समय अधिकारी अधिक संवेदनशीलता बरतें.

    लाइव लॉ के मुताबिक़ ममता ने निर्वाचन आयोग को “व्हाट्सऐप आयोग” कहा. उन्होंने चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने का आरोप लगाया और दावा किया कि “उनकी एसआईआर प्रक्रिया केवल नाम हटाने के लिए है, जोड़ने के लिए नहीं.

    सुप्रीम कोर्ट

    इमेज स्रोत,Getty Images

    इमेज कैप्शन,भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत (फ़ाइल फोटो)

    इतनी जल्दी क्यों?

    ममता ने कहा, “सौ से ज़्यादा लोग मारे गए. क्या आप कल्पना कर सकते हैं. बीएलओ मरे और उन्होंने पत्र लिखकर कहा कि सीईओ मेरी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार है. इतने बीएलओ मरे. और 150 से ज़्यादा लोग मरे. कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं. बंगाल को निशाना बनाया गया है. सर, आप मुझे बताइए, असम क्यों नहीं. असम क्यों नहीं. पूर्वोत्तर क्यों नहीं?”

    निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी. एस. नायडू ने कहा कि उन्हें याचिका की प्रति नहीं दी गई है और उन्हें शिकायत की जानकारी ही नहीं है.

    बनर्जी ने आयोग पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया.

    उन्होंने कहा, “हमें ख़ुशी है कि इस अदालत ने आदेश दिया कि आधार कार्ड को शामिल दस्तावेजों में रखा जाएगा. लेकिन उन्होंने मना कर दिया. अन्य राज्यों में डोमिसाइल सर्टिफिकेट, फैमिली रजिस्टर कार्ड, सरकारी आवास कार्ड, हेल्थ कार्ड, जाति प्रमाण पत्र की अनुमति है.”

    ”उन्होंने चुनाव से पहले केवल बंगाल को निशाना बनाया. 24 साल बाद इतनी जल्दी क्या थी, जो काम दो साल में होता है, उसे तीन महीने में करना पड़ा. त्योहारों का मौसम है, फसल का मौसम है, लोग शहर में नहीं होते, बाहर रहते हैं, यात्रा पर होते हैं, उसी समय ये सारे नोटिस जारी कर दिए गए.”

    इस पर सीजेआई ने कहा कि अदालत एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख चुकी है, इसलिए वह आधार पर की गई टिप्पणियों पर कुछ नहीं कह सकती.

    उन्होंने कहा, “एसआईआर का मामला पिछले दो महीनों से हमारे सामने बहस के लिए था और हमने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है. इसलिए हम आधार कार्ड की विश्वसनीयता, प्रामाणिकता या उसकी सीमा पर टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं.”

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