अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी साल जून महीने में कनाडा में हुए जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान कहा था कि 2014 में रूस को जी-8 से निकालना बहुत बड़ी ग़लती थी.
ट्रंप की इस टिप्पणी पर रूस ने सहमति जताई थी लेकिन कहा था कि मौजूदा दुनिया में जी-7 जैसे ग्रुप का कोई मतलब नहीं है. ट्रंप ने कहा था कि अगर इस समूह में रूस होता तो यूक्रेन में युद्ध नहीं होता.
कहाँ यूक्रेन को नेटो में शामिल करने की बात हो रही थी, अब रूस को जी-8 में लाने की बात होने लगी है. हालांकि जर्मन चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ ने कहा है कि फ़िलहाल यह संभव नहीं है.
ट्रंप ने कहा था, ”जी-7 अगर जी-8 रहता यानी इसमें रूस शामिल रहता तो युद्ध नहीं होता. आपका दुश्मन सामने मेज पर होता. और सच कहूँ तो उस वक़्त रूस हमारा दुश्मन भी नहीं था.”
ट्रंप की इस टिप्पणी के क़रीब छह महीने बाद एक बार फिर से रूस को वापस लाने पर सहमति बनती दिख रही है. ऐसा यूक्रेन के साथ शांति समझौते के लिए जो ड्राफ़्ट तैयार हुआ, उसमें यह बात कही गई है.
ड्राफ्ट में यह सुझाव दिया गया है कि रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध हटाकर उसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के समूह जी7 में दोबारा शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा और यह समूह जी-8 बन जाएगा.

इमेज स्रोत,Getty Images
जी-8 से रूस को बाहर क्यों किया गया?
2014 में रूस ने यूक्रेन के क्राइमिया को ख़ुद में मिला लिया था और इसी के जवाब में तब उसे जी-8 से बाहर कर दिया गया था. अब जब यूक्रेन की 20 प्रतिशत ज़मीन पर फिर से रूस का नियंत्रण है तो उससे समझौता करने के लिए जी-8 में वापसी की बात हो रही है.
जी7 आर्थिक रूप से संपन्न देशों का समूह है. इसमें ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, कनाडा, अमेरिका, फ्रांस और जापान शामिल हैं. इसका पहला शिखर सम्मेलन 1975 में फ्रांस में हुआ था.
तब इसके मूल सदस्य थे- ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली, अमेरिका, फ्रांस और जापान.
1976 से 1997 तक यह समूह जी-7 के रूप में काम करता रहा. 1997 में रूस के शामिल होने पर यह जी-8 बन गया. 2014 में रूस को इस समूह से बाहर कर दिया गया और फिर से यह ग्रुप अपने पुराने स्वरूप में आ गया. तब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा थे.
अगर रूस जी-8 में वापसी करता है तो इसके कई मायने होंगे. भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, ”अगर ट्रंप की यूक्रेन पर 28-सूत्रीय योजना अपनाई जाती है, तो क्राइमिया और डोनबास पर रूस के नियंत्रण को मान्यता मिल जाएगी. रूस उन अन्य क्षेत्रों पर भी नियंत्रण बनाए रखेगा, जिन पर उसने क़ब्ज़ा किया है.”
”रूस को जी-8 में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा और उस पर लगाए गए प्रतिबंध चरणबद्ध तरीक़े से हटाए जाएंगे. यूक्रेन को अपनी सैन्य क्षमता सीमित रखनी होगी और नेटो में शामिल होने की अपनी इच्छा छोड़नी होगी. अमेरिका और रूस आर्थिक, तकनीकी, ऊर्जा और खनिज साझेदारियों पर सहयोग करेंगे. यूक्रेन और यूरोप अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि वे कितनी गहरी खाई में गिर चुके हैं. वे बहुत पहले हार चुके एक युद्ध को लड़ रहे हैं.”
स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ”हर कोई कह रहा है कि ट्रंप आत्मसमर्पण करने वाली डील को स्वीकार करने के लिए यूक्रेन को मजबूर कर रहे हैं. लेकिन कोई भी यह स्वाभाविक सवाल नहीं पूछ रहा है कि ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं? एक यूक्रेन नैरेटिव में है और एक हक़ीक़त में. ज़ेंलेंस्की यूक्रेन की ज़मीन खो रहे हैं. यूक्रेन की सेना भारी मुश्किल में है.”
”ज़ेलेंस्की का कार्यकाल ख़त्म हो चुका है लेकिन सत्ता में बने हुए हैं और भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए हैं. यूक्रेन की अर्थव्यवस्था यूरोप के सहारे चल रही है. यूक्रेन इस जंग को बदलने में सक्षम नहीं है. मेरा मानना है कि ट्रंप के कारण पुतिन नहीं जीत रहे हैं बल्कि वह वास्तविक स्थिति को स्वीकार कर रहे हैं. ज़ेलेंस्की कहते हैं कि अमेरिका से समर्थन मिलने के बदले सम्मान चुनेंगे. लेकिन वास्तविकता यह है कि अगर अमेरिका से समर्थन नहीं मिला तो वह शायद सम्मान भी खो देंगे.”
इमेज स्रोत,Getty Images
पुतिन का पश्चिम विरोधी बनना
सोवियत संघ के बिखरने के बाद कोई कारण नहीं था कि रूस पश्चिम के साथ रहे और अमेरिकी नेतृत्व वाली दुनिया को स्वीकार करे. इसके बावजूद पुतिन शुरुआत में पश्चिम विरोधी नहीं थे.
सोवियत संघ को बिखरे महज आठ साल हुए थे तभी व्लादिमीर पुतिन साल 2000 में 26 मार्च को रूस के राष्ट्रपति बन गए थे. तब पुतिन की उम्र 48 साल हो रही थी.
अब पुतिन 73 साल के हो गए हैं और अब भी वही रूस के राष्ट्रपति हैं. अमेरिका में इस दौरान पाँच राष्ट्रपति बदल चुके हैं.
राष्ट्रपति के रूप में पुतिन सात बार अमेरिका जा चुके हैं. पुतिन पहली बार अमेरिका साल 2000 में छह सितंबर को गए थे.
तब उनकी मुलाक़ात अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से हुई थी. पुतिन आख़िरी बार अमेरिका 2015 में गए थे लेकिन अभी अगस्त में वह ट्रंप के बुलावे पर अलास्का गए थे.
ट्रंप ने इसी साल जनवरी में कहा था कि रूस ने दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका का साथ दिया था और इसे भुलाया नहीं जा सकता है. लेकिन ट्रंप यह भूल गए कि दूसरे विश्व युद्ध के ख़त्म हुए 80 साल होने जा रहे हैं और इन 80 सालों में बहुत कुछ बदल चुका है.
जी-7 उत्तर अमेरिका, यूरोप, जापान और जैसे प्रमुख देशों का प्रतिनिधित्व करता है. जब यह जी-8 था तो रूस कई मामलों में अपवाद के रूप में दिखता था. जी-8 में रूस को छोड़कर सभी देश अमेरिकी नेतृत्व को स्वीकार करते हैं और सभी अमेरिका के सहयोगी हैं. लेकिन ट्रंप एक बार फिर से रूस को इस समूह में लाने की कोशिश कर रहे हैं.
इमेज स्रोत,Getty Images
रूस का होना अहम क्यों?
थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को सेंटर के निदेशक दमित्री त्रेनिन ने लिखा है कि रूस अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है.
दमित्री कहते हैं, ”इसके बावजूद रूस को जी-8 से बाहर करना और जी-7 के प्रारूप पर लौटना व्यवहारिक नहीं था. पश्चिम को दुनिया के बाक़ी देशों से उसके प्रभुत्व को मिल रही चुनौती के ख़िलाफ़ अपने सहयोग को और मज़बूत करना चाहिए. रूस की मौजूदगी अक्सर उपयोगी होता है. समूह के भीतर एक विरोधी दृष्टिकोण होना ज़रूरी है क्योंकि अन्य सदस्यों की बुनियादी मान्यताओं पर सवाल उठाता है और एक अलग दृष्टिकोण पेश करता है.”
दरअसल, पुतिन जब सत्ता में आए तो रूस का मिज़ाज अमेरिका विरोधी हो चुका था. ऐसा मिज़ाज केवल वहां की सरकार का ही नहीं था बल्कि लोगों का भी हो गया था. द लेवाडा सेंटर मॉस्को स्थित एक पोलिंग समूह है. यह 1990 के दशक से रूस में अमेरिका के प्रति लोगों का रुझान कैसा है, उस पर सर्वे करता रहा है.
ऐसा नहीं है कि रूस के लोगों का रुझान शुरू से ही अमेरिका विरोधी था. द लेवाडा सेंटर के मुताबिक़ 1990 के दशक की शुरुआत में ज़्यादातर रूसी अमेरिका को न केवल इकलौ़ती महाशक्ति के रूप में देखते थे बल्कि रोल मॉडल के रूप में भी देखते थे.
1990-1991 में किए गए सर्वे के मुताबिक़ 39 प्रतिशत रूसी अमेरिका में दिलचस्पी रखते थे. इसकी तुलना में 27 प्रतिशत जापान में और महज 17 प्रतिशत जर्मनी में.
उसी सर्वे के एक दूसरे सवाल में लोगों से पूछा गया था कि पश्चिम का कौन सा ऐसा देश है, जिसके साथ रूस को अच्छे संबंध रखना चाहिए तो 74 प्रतिशत लोगों का जवाब था- अमेरिका.
अमेरिका ने 1993 में इराक़ पर बमबारी की थी. कहा जाता है कि यह बमबारी अमेरिका के समर्थन वाली भावना के लिए पहली बड़ी चुनौती बनी. अमेरिका को लेकर लोगों का राय बँटने लगी.
1998 से 1999 के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ऐसी कई कार्रवाइयां कीं, जिनकी वजह से रूस में अमेरिका को लेकर लोगों की राय बदलती गई.
इमेज स्रोत,Getty Images
रूस का विरोध
1999 में नेटो ने युगोस्लाविया में बमबारी की और रूस की सरकार ने इसे लेकर सख़्त आपत्ति जताई. रूस के लोगों को लगने लगा कि अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम के देश उसके हितों के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं.
इसके अलावा दूसरा चेचेन वॉर शुरू हुआ और पश्चिम ने रूस की आलोचना शुरू कर दी. अमेरिका ने ख़ुद को एबीएम (एंटी बैलेस्टिक मिसाइल ट्रीटी) संधि से अलग कर लिया और सोवियत संघ के पतन के बाद नेटो का विस्तार पहली बार रूस के क़रीबी देशों तक आ पहुँचा.
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था.
इसे बनाने वाले अमेरिका, कनाडा और अन्य पश्चिमी देश थे. इसे इन्होंने सोवियत यूनियन से सुरक्षा के लिए बनाया था.
तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरा सोवियत यूनियन.
शुरुआत में नेटो के 12 सदस्य देश थे. नेटो ने बनने के बाद घोषणा की थी कि उत्तरी अमेरिका या यूरोप के इन देशों में से किसी एक पर हमला होता है तो इस संगठन में शामिल सभी देश अपने ऊपर हमला मानेंगे.
ऐसा नहीं है कि पुतिन राष्ट्रपति बनने के बाद से ही नेटो विरोधी हो गए थे. पुतिन से साल 2000 में पाँच मार्च को बीबीसी के डेविड फ़्रॉस्ट ने पूछा था, “नेटो को लेकर आप क्या सोचते हैं? नेटो को आप संभावित साझेदार के तौर पर देखते हैं या एक प्रतिद्वंद्वी या फिर दुश्मन के तौर पर?”
इसके जवाब में पुतिन ने कहा था, ”रूस यूरोप की संस्कृति का हिस्सा है. मैं ख़ुद अपने देश की कल्पना यूरोप से अलगाव में नहीं कर सकता. हम इसे ही अक्सर सभ्य दुनिया कहते हैं.ऐसे में नेटो को दुश्मन के तौर पर देखना मेरे लिए मुश्किल है. मुझे लगता है कि इस तरह का सवाल खड़ा करना भी रूस या दुनिया के लिए अच्छा नहीं होगा. इस तरह के सवाल ही नुक़सान पहुँचाने के लिए काफ़ी हैं.”

