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    शायद कम होने लगी थी राष्ट्रवाद की सप्लाई, इसीलिए वंदे मातरम् गाने की कराई गई है मुनादी!

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldFebruary 17, 2026

    इसे लागू करने के लिए बेरोज़गार लोग अपना समय छह श्लोक याद करने में लगाएंगे। वे भीड़ पर नज़र रखेंगे कि कौन ध्यान से गा रहा है या नहीं। इस सबमें उनके हिंसक तरीकों की खबरें अब किसी भी समय हम तक पहुंचनी शुरू हो जाएंगी। और इस सबसे ‘विकसित भारत’ बनेगा।

    आकार पटेल

    Published: 15 Feb 2026, 9:00 PM

    हमारे देश में राष्ट्रवाद की हमेशा कमी ही महसूस होती रहती है, क्योंकि इसकी मांग ही इतनी ज्यादा है। अपने जीवन के तमाम दशकों में मैंने कभी नहीं सुना कि किसी ने मांग की हो कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगान से जोड़ा जाए। लेकिन अब हमें बताया जा रहा है कि ऐसा ही होने वाला है।

    गाने में छह छंद या दोहे हैं, जिन्हें हम जैसे उन लोगों को कंठस्थ करना होगा जिन्हें ये याद नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आदेश जारी किया है कि इसे 3 मिनट और 10 सेकंड तक गाना होगा। आदेशों में यह साफ़ नहीं है कि यह गाना स्वैच्छा से (आधार की तरह) गाना है या अनिवार्य रूप से (आधार की तरह)।

    यह असमंजस हुआ है इस गीत के शब्दों की वजह से। गृह मंत्रालय ने हमें बताया है कि ‘ऐसे मौकों की पूरी लिस्ट देना मुमकिन नहीं है, जिन पर राष्ट्र गीत को बजाने के विपरीत अधिकारिक रूप को गाने की इजाज़त दी जा सकती है। इतना ही नहीं आदेश में यह भी जोड़ा गया है कि ‘अगर इसे पूरे सम्मान के साथ गाया जाए तो इसके गाने पर कोई एतराज़ नहीं है…।’ इस बारे में कोई गाइडलाइन नहीं हैं कि पूरा सम्मान क्या होता है, लेकिन उल्लंघन क्या होता है यह हमें जल्द ही पता चल जाएगा। हममें से जो ज़्यादा राष्ट्रवादी हैं, वे ऐसे लोगों को इस बाबत सिखाएंगे जो कम राष्ट्रवादी हैं।

    मैं यह क्यों कह रहा हूं कि यह स्वैच्छिक है या नहीं, क्योंकि आदेश में यह भी कहा गया है कि ‘राष्ट्रीय गीत उन मौकों पर गाया जा सकता है, जो भले ही पूरी तरह से समारोह वाले न हों, फिर भी मंत्रियों आदि की मौजूदगी की वजह से उनका महत्व हो।’ और आगे यह भी कहा गया है कि ‘इसका सामूहिक गान इच्छित है।’ अब इस ‘आदि’ में क्या शामिल है या क्या नहीं? ‘इच्छित’ का सही मतलब क्या है?

    हमें यह भी पता लगाना होगा कि क्या होता है जब कोई ‘कर सकते हैं’ और ‘इच्छित’ शब्दों को अपनी मर्ज़ी से किए गए काम का इशारा मानता है। लेकिन यह सब आखिर में मुद्दे से हटकर है। मुख्य मुद्दा यह है कि हमारे देश में हमेशा राष्ट्रवाद की कमी रहती है और यह एक तरीका है जिससे इस कमी को पूरा किया जा सकता है। और यह भी सच है कि इस तरह की चीज़ें वैसा ही काम करती हैं जैसा हमारा इतिहास हमें बताता है।

    ठीक 50 साल पहले, 1976 में, उस समय की सरकार ने संविधान में ‘आधारभूत कर्तव्य’ यानी बुनियादी जिम्मेदारियां जोड़ी थीं। ये कर्तव्य हैं ‘भारत के सभी लोगों के बीच मेलजोल और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, जो धर्म, भाषा और इलाके या तबके की अलग-अलग सोच से ऊपर हो; महिलाओं की इज्ज़त के खिलाफ कामों को छोड़ना’। ऐसा हुआ था इस बात से कौन इनकार कर सकता है? अगर ये निर्देश हमें नहीं मिले होते, तो भारत भाईचारे और महिला सुरक्षा के लिए दुनिया भर में मिसाल नहीं बन पाता।

    जिम्मेदारियों की सूची में यह भी है कि ‘जंगलों, झीलों, नदियों और जंगली जानवरों समेत प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करें और उसे बेहतर बनाएं, और जानवरों के लिए दया रखें’ और, मेरा पसंदीदा है, ‘वैज्ञानिक सोच, इंसानियत और जानने-समझने और सुधार की भावना को बढ़ाएं’।

    ये सारी जिम्मेदारियां या कर्तव्य इसलिए जोड़े गए क्योंकि 1976 में राष्ट्रवाद की बहुत ज़्यादा मांग थी और सप्लाई कम थी और आज भी यही स्थिति है।

    मौजूदा सिस्टम के आलोचक और नफ़रत करने वाले लोग कहेंगे कि देश के लिए प्यार दिखाने के और भी तरीके हैं। कि राष्ट्रगान और नारे देश की तरक्की के लिए ज़रूरी नहीं हैं। कि हम एक देश के तौर पर बेहतर होंगे अगर हम ट्रैफिक में भी अच्छा बर्ताव करें, जैसे, और हम गंदगी न करें। राष्ट्रगीत नदियों के बारे में बात करता है और ऐसे किसी देश का नाम बताना मुश्किल होगा जहां का पानी हमारे यहां से ज़्यादा गंदा हो।

    हम रिश्वत लेने या देने से मना करके अपनी देशभक्ति दिखा सकते हैं। या टैक्स में धोखाधड़ी करने की कोशिश न करके, यह बात हममें से सबसे ज़्यादा देशभक्त लोगों के लिए इतनी स्वाभाविक है कि यह हैरानी की बात है कि टैक्स चोरी को बुनियादी जिम्मेदारियों में शामिल नहीं किया गया है।

    ऐसी चीज़ों की सूची काफी लंबी है जिन्हें जोड़ा जा सकता है, लेकिन, जैसा कि हमारी सरकार और उसके समर्थक शायद कहेंगे: ये ऐसी चीज़ें हैं जो कई देशों के नागरिक कर सकते हैं। वे खास नहीं हैं।

    हमें अपना देश प्रेम दिखाने के लिए कुछ अनूठा और अलग चाहिए। इस नए आदेश ने हमें ठीक यही दिया है। गृह मंत्रालय ने हमें आदेश में चेतावनी दी है कि ‘जब भी राष्ट्र गीत का अधिकारिक रूप गाया या बजाया जाए तो वहां मौजूद लोगों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना चाहिए’। शायद इसका मतलब यह है कि एक बार जब यह तय कर ले कि गीत कहां बजाया जाएगा, तो लोगों को मानना ​​होगा और फिर इसमें शामिल होने में आपकी अपनी इच्छी नहीं रह जाएगी। अगर ऐसा है, तो गीत और राष्ट्रगान में क्या फर्क है? कोई नहीं जानता, लेकिन हमारी सरकार अपनी समझदारी से ज़रूर जानती है।

    अभी तो और भी बातें हैं: ‘सभी स्कूलों में, दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत के सामूहिक गानसे हो सकती है।’ मेरी राय में, अगली पीढ़ी में भी वैसी ही देशभक्ति जगाने के लिए यह ज़रूरी है जैसी हमारी पीढ़ी और हमसे पहले वाली पीढ़ी में है। इसके और भी फ़ायदे हैं।

    बेरोज़गार लोग अपना खाली समय छह श्लोक या छंद याद करने में लगाएंगे। वे भीड़ पर नज़र रखकर और भी प्रोडक्टिव बनेंगे, यह देखने के लिए कि कौन ध्यान नहीं दे रहा है और ‘सही तौर-तरीकों’ से भटक रहा है। उनके ऐसा हिंसक तरीके से करने की खबरें अब किसी भी समय हम तक पहुंचनी शुरू हो जानी चाहिए। आलसी लोग एक्स्ट्रा 3 मिनट और 10 सेकंड खड़े रहेंगे और अपनी फिटनेस सुधारेंगे।

    और इस सबसे ‘विकसित भारत’ बनेगा।

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