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    जाति उन्मूलन की दिशा में कहां तक पहुंचे हैं हम?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldApril 9, 2026

    जहां आरएसएस का मुस्लिम विरोधी एजेंडा साफ नजर आता है, वहीं उसका दलित-विरोधी एजेंडा पर्दे के पीछे से चलाया जाता है। जाति उन्मूलन का स्वप्न साकार करने के लिए इसका मुकाबला किया जाना जरूरी है।

    राम पुनियानी

    Published: 09 Apr 2026, 7:59 AM

    इस साल 14 अप्रैल को बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती मनाने के साथ-साथ हमें इस मुद्दे पर भी विचार करना चाहिए कि बाबासाहेब की प्रमुख शिक्षाओं में से एक- जाति के उन्मूलन के संदर्भ में आज हमारी क्या स्थिति है। जाति-वर्ण व्यवस्था हिन्दू समाज में उस समय से है जब हिन्दू शब्द का इस्तेमाल तक प्रारंभ नहीं हुआ था। हमारे पवित्र ग्रंथों में वर्ण-जाति के नियमों के सख्ती से पालन की आज्ञा दी गई है। इनमें वेदों से लेकर मनृस्मृति तक, और अनेक अन्य शास्त्र, जो पवित्र माने जाते हैं, शामिल हैं।

    भगवान गौतम बुद्ध इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले पहले प्रमुख व्यक्ति थे। बाबासाहेब ने बुद्ध के प्रतिरोध को क्रांति की संज्ञा दी है। इसके बाद पुष्यमित्र शुंग से शुरू कर बौद्ध धर्म और उसके मूल्यों का विरोध चलता रहा। इस दौर को अंबेडकर प्रतिक्रांति कहते हैं, जिसके बाद जाति-वर्ण व्यवस्था की अत्यंत आक्रामक ढंग से वापसी हुई। उसके जन्मस्थान भारत से बौद्ध धर्म का सफाया हो गया जबकि वह कई दक्षिण और पूर्व एशियाई देशों में पनपा और फला-फूला।

    बुद्ध के बाद जाति प्रथा के विरोध का दूसरा बड़ा दौर कबीर, रैदास, दादू एवं कई अन्य संतों के नेतृत्व में आया। इन संतों ने खोखले रस्मों-रिवाजों, कर्मकांडों और पंडे-पुरोहित वर्ग को महत्व दिए जाने की बजाए मानवतावाद पर जोर दिया और समाज में समानता की वकालत की। ये अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपने विचार पेश करते थे, किंतु इन्हें जाति प्रथा से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले पुरोहित वर्ग और सामंती तत्वों के गठबंधन के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

    ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में, उसकी तमाम कमियों के बावजूद, आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ इस अमानवीय प्रथा का विरोध प्रारंभ हुआ। आधुनिक काल में समानता के पक्ष में जोतिराव फुले ने आवाज उठाई। उन्होंने नीची जातियों को शिक्षा दिए जाने के विरोधियों को आड़े हाथों लिया। इसके साथ ही दलित-ओबीसी वर्ग को शिक्षा तक पहुँच एवं समानता का दर्जा दिलवाने की शुरूआत हुई। आधुनिक औद्योगिकरण से भी इस पहल को बढ़ावा मिला और समतापूर्ण समाज की स्थापना के लिए संघर्ष की जड़ें मजबूत हुईं।

    जोतिराव और सावित्रीबाई फुले ने स्त्री शिक्षा की शुरूआत की। महिलाओं को पुरूषों के अधीन और उनसे निम्न मानने के नजरिये के विरोध का यह सबसे अच्छा हथियार था। फातिमा शेख ने इस संघर्ष में सावित्रीबाई का पूरी ताकत से साथ दिया। सामाजिक न्याय की स्थापना के इस आंदोलन को बाबासाहेब अंबेडकर के कारण जबरदस्त बढ़ावा मिला। उन्होंने सार्वजनिक जल स्त्रोतों तक पहुंच (चावदार तालाब) और मंदिरों में प्रवेश (कालाराम मंदिर) के लिए आंदोलनों का नेतृत्व किया। जातिप्रथा को धार्मिक मान्यता के विरोधस्वरूप उन्होंने मनुस्मृति को जलाया।

    पेरियार रामास्वामी नायकर का आत्मसम्मान आंदोलन इतना प्रभावी था कि उसने समाज के अन्तःकरण को झकझोर दिया। ये सारे प्रयास महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे आजादी के आंदोलन के समानांतर जारी रहे जिसकी अंतिम परिणति संविधान सभा के माध्यम से संविधान के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ होने के रूप में हुई। अंबेडकर का संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष बनना केवल प्रतीकात्मक न होकर इस महान नेता की समानता के मूल्यों को स्थापित करने में केन्द्रीय भूमिका को प्रतिबिंबित करता था।

    समानता की ओर सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के विरोध के बीज समाज में पहले से ही मौजूद थे। ये पहले हिन्दू महासभा में और फिर आरएसएस में प्रतिबिंबित हुए। दलित-ओबीसी आंदोलन एक महत्वपूर्ण कदम था जिसने जातिगत और लैंगिक भेदभाव, जो आरएसएस की विचारधारा का केन्द्रीय तत्व है, की जड़ों को हिला दिया। आरएसएस ने समाज में दलितों की समानता के लिए किए जा रहे प्रयासों का विरोध किया। उसने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए मुसलमानों के रूप में एक बाहरी शत्रु खोज लिया। मनुस्मृति उसका आदर्श है। मगर उसने अपनी विचारधारा का विस्तार करने के लिए इस्लाम और मुसलमानों के विरोध की रणनीति अपनाई। उसने कम उम्र के लड़कों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल बनाया। यही लड़के आगे चलकर प्रचारक (पूर्णकालिक कार्यकर्ता जो जीवन भर अविवाहित रहते हैं) और स्वयंसेवक बनते हैं।

    संविधान में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान था लेकिन दबे स्वर में इसके खिलाफ मुहंजुबानी प्रोपेगेंडा जारी रहा। इसकी अंतिम परिणति 1980 में दलित-विरोधी हिंसा और 1985 में ओबीसी विरोधी हिंसा के रूप में सामने आई। दोनों मामलों में हिंसा मुख्यतः अहमदाबाद और उसके आसपास के इलाके में हुई। मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल होने से सामाजिक न्याय की मंजिल और नजदीक आई। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने इसकी प्रतिक्रिया में  कमंडल, राममंदिर, पवित्र गाय और लव जिहाद जैसे मुद्दों को हवा दी ताकि उनके मंडल आयोग का विरोधी होने पर से ध्यान हटाया जा सके। यूथ फॉर इक्वालिटी जैसी संस्थाओं ने भी मंडल आयोग के विरोध में भूमिका निभाई।

    इन सकारात्मक कदमों को समाज के सशक्त तबकों ने स्वीकार नहीं किया। भू-सुधार की प्रक्रिया अधूरी रही और पुरोहित और जमींदार वर्ग अपना रूप-रंग बदलते रहे, किंतु समाप्त नहीं हुए। जाति-आधारित आरक्षण को कमजोर करने के लिए उन्होंने इसे आर्थिक आधार पर भी दिए जाने का प्रावधान करवा लिया। शिक्षण संस्थाओं में पक्षपाती चयन प्रक्रिया और ‘कोई उपयुक्त उम्मीदवार नहीं’ (नो सूटेबल कैंडिडेट फाउंड) के बहाने आरक्षित पद खाली रखे गए। हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के उदय के साथ सामाजिक न्याय की यात्रा में बाधा डालने की नई-नई तरकीबें सोची जाने लगीं और उन्हें अमली जामा पहनाया जाने लगा।

    जाति-आधारित जनगणना की लंबे समय से चली आ रही मांग का लगातार विरोध किया जाता रहा। अब इसे स्वीकार कर लिया गया है और इससे यह स्पष्ट होगा कि विभिन्न जातियों के हालात कैसे हैं। इस बीच अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों को शिक्षण संस्थाओं और व्यापक समाज में भी अपमानित करने का सिलसिला जारी रहा। साफ-साफ नजर नहीं आने वाले वंचित वर्गों के इस अपमान का नतीजा अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के छात्रों की लगातार बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है।

    रोहित वेमूला की संस्थागत हत्या ने मानवीय दृष्टिकोण रखने वाले बहुत सारे लोगों को झकझोर कर रख दिया। एक दलित लड़का, जो विज्ञान लेखक बनना चाहता था, के साथ हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में इतना दुर्व्यवहार किया गया कि वह आत्महत्या करने को बाध्य हो गया। रोहित अधिनियम तैयार तो हुआ, मगर उसे लागू नहीं किया गया। मुंबई के नायर अस्पताल में पायल तड़वी के मामले ने हम सबको अंदर तक हिलाकर रख दिया। उसके उच्चाधिकारियों द्वारा उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था, जिसके चलते वह आत्महत्या करने को बाध्य हुई। मुंबई आईआईटी के दर्शन सोलंकी का अनेक अवसरों पर मजाक उड़ाया जाता था, जिसके नतीजे में उसने आत्महत्या कर ली। ये मात्र कुछ उदाहरण हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं आम हैं।

    इन घटनाओं के मद्देनजर यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026, 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए। इसमें सभी भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए सख्त भेदभाव-विरोधी नियमों का प्रावधान था। इसका उद्धेश्य था जाति, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव को समाप्त करना। इसके प्रमुख प्रावधानों में समान अवसर केन्द्रों (ईओसी) की स्थापना, 24×7 हेल्पलाइन और इक्विटी एम्बेसडर्स की नियुक्ति किया जाना शामिल थे। इसका जबरदस्त विरोध हुआ और इसके खिलाफ विशाल विरोध प्रदर्शन हुए। यह मामला उच्चतम न्यायालय में गया, जिसने इन विनियमनों को लागू करने पर रोक लगा दी।

    आज डॉ. अंबेडकर को याद करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय की यात्रा का मुख्यतः मगर दबे-छिपे ढंग से विरोध आरएसएस जैसी शक्तिशाली संस्था द्वारा किया जा रहा है, जो अपना प्रतिगामी एजेंडा तरह-तरह के तरीकों से आगे बढ़ा रहा है। जहां आरएसएस का मुस्लिम विरोधी एजेंडा साफ नजर आता है, वहीं उसका दलित-विरोधी एजेंडा पर्दे के पीछे से चलाया जाता है। जाति उन्मूलन का स्वप्न साकार करने के लिए इसका मुकाबला किया जाना जरूरी है।

    (लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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