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    लेबनान में गाजा जैसा जातीय सफाया

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldApril 15, 2026

    इजराइल ने लेबनान से लोगों को विस्थापित करने का अभियान चला रखा है। हैरानी है कि इसकी ओर से दुनिया ने जैसे आंखें मूंद रखी हैं।

    अशोक स्वैन

    Published: 13 Apr 2026, 7:28 AM

    जब दुनिया की नजरें डर और अविश्वास के साथ डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के खतरनाक टकराव पर टिकी थीं, लेबनान में हो रही तबाही दुनिया के ध्यान से दूर रही। इजराइल अपने उत्तरी पड़ोसी के साथ सीमा को फिर से तय करने की धमकी दे रहा है, और पिछले एक महीने में उसने अपने सैन्य अभियान को एक पूर्ण युद्ध का रूप दे दिया है। इसमें अब जमीनी हमला, रिहाइशी इलाकों पर बमबारी और दक्षिणी लेबनान के बड़े हिस्सों पर कब्जे की साफ-साफ योजना शामिल है।

    मार्च के मध्य से इजराइली सेना लेबनान के इलाके में और आगे बढ़ गई है। यह सब हफ्तों तक चली हवाई बमबारी के बाद हुआ, जिसमें न सिर्फ हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया गया, बल्कि घनी आबादी वाले इलाकों में घरों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, पुलों और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचों को भी।

    लिटानी नदी के दक्षिण में मुस्लिम-बहुल पूरे के पूरे शहर खाली कराए जा रहे हैं। देश का बड़ा हिस्सा अब खाली करने के अभियान की जद में आ गया है और लगातार हो रही बमबारी के बीच बड़ी तादाद में लोग विस्थापित हो रहे हैं। यहां भयानक मानवीय संकट है। 15 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं, और लाखों लोगों को उत्तर की ओर भागने पर मजबूर होना पड़ा है। आम नागरिकों की मौतें लगातार बढ़ रही हैं, मार्च के शुरू से अब तक पंद्रह सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 200 से ज्यादा महिलाएं और बच्चे, और कई मेडिकल कर्मचारी और पत्रकार शामिल हैं। दक्षिणी लेबनान और बेरूत के बाहरी इलाकों में हवाई हमलों से घर तबाह हो गए हैं और तमाम परिवार मलबे के नीचे दब गए हैं।

    तबाही का यह सिलसिला जाना-पहचाना है। स्वास्थ्य केन्द्रों पर हमले हुए हैं, एम्बुलेंस सेंटरों को निशाना बनाया गया है और मेडिकल स्टाफ को मारा जा रहा है। मौके पर मौजूद डॉक्टर आगाह कर रहे हैं कि लेबनान की पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को जिस तरह निशाना बनाया जा रहा है, वह ठीक वैसा ही है जैसा पहले गाजा में देखा गया। अस्पताल न सिर्फ सीधे निशाना बनाए जाने की वजह से बल्कि बिजली, ईंधन, मेडिकल सामान और स्टाफ की कमी की वजह से भी बंद हो रहे हैं। आर्थिक संकट से पहले से ही पस्त देश की जिंदगी बचाने की क्षमता चुकती जा रही है।

    इजराइल अपने इरादों को छिपा भी नहीं रहा। उसका मकसद अब सिर्फ हिज्बुल्लाह को कमजोर करना या उसके हथियार छीनना नहीं रह गया है, बल्कि लिटानी नदी तक बफर जोन बनाना और विस्थापित लेबनानी नागरिकों को दक्षिण में उनके घरों में लौटने से रोकना है। इस रणनीति के तहत सीमा पर बसे पूरे-के-पूरे गांवों को तबाह करने की योजना है। असल में, लेबनान में एक और जातीय सफाये का अभियान चल रहा है।

    जो लोग इस क्षेत्र के इतिहास से वाकिफ हैं, उनके लिए ये गूंजें साफ-साफ सुनाई देती हैं। इसराइल ने 1982 से 2000 के बीच, लगभग दो दशकों तक दक्षिणी लेबनान में एक सुरक्षा जोन बना रखा था। जैसी उम्मीद थी, इस कब्जे ने नाराजगी को हवा दी, हिजबुल्लाह को मजबूत किया और हिंसा के चक्र को और भी गहरा किया। इसराइल की मौजूदा रणनीति शायद इसी पैटर्न को और भी बड़े, और भी ज्यादा विनाशकारी पैमाने पर दोहराने की है।

    मौजूदा समय को और भी खतरनाक बनाने वाली बात यह है कि आम लोगों को नुकसान पहुंचाने के चरम तरीकों को सामान्य मान लिया गया है। हवाई हमलों में बार-बार रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया है, जिनमें वे इलाके भी शामिल हैं जिन्हें पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था। विस्थापित नागरिकों को शरण देने वाले स्थलों को भी नहीं बख्शा गया है। ऐसे ही एक चर्चित हमले में बेरूत के समुद्रतटीय क्षेत्र को निशाना बनाया गया, जहां बमबारी से भागकर आए विस्थापित परिवारों ने टेंट लगा रखे थे।

    बुनियादी ढांचे को तबाह करने में भी एक सुनियोजित प्रवृत्ति दिख रही है। प्रमुख सड़कों और पुलों पर हमले किए गए हैं, जिससे दक्षिणी लेबनान के बड़े क्षेत्र दुर्गम हो गए हैं। इससे न केवल हिज्बुल्लाह की सैन्य रसद बाधित होती है, बल्कि आम नागरिक भी फंस जाते हैं।

    यह संघर्ष जिस तरह फैलता जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (यूनिफिल) के सदस्य, जिनमें तीन इंडोनेशियाई शांति सैनिक भी शामिल थे, इसराइली गोलाबारी में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात है कि यूएन के कर्मचारी एक ऐसे संघर्ष क्षेत्र में मारे जा रहे हैं और घायल हो रहे हैं, जिसकी कथित तौर पर निगरानी की जा रही है और इससे पता चलता है कि नियम-कायदे किस तेजी से निरर्थक होते जा रहे हैं। इसराइली सैनिकों ने यूनिफिल के निगरानी कैमरे भी नष्ट कर दिए हैं और यहां तक कि शांति सैनिकों को हिरासत में भी ले लिया है।

    इस बीच, क्षेत्रीय जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। हिज्बुल्लाह के ईरान से गहरे ताल्लुकात हैं और इस कारण लेबनान में चल रहे युद्ध को पश्चिम एशिया के टकराव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहां का माहौल कभी भी अप्रत्याशित रूप से बिगड़ सकता है।

    इस पैमाने पर हो रही तबाही, जातीय सफाये के पैटर्न वाले इसराइली अभियान और वहां की मनमानी सरकार द्वारा सीमाओं को फिर से खींचने की साफ कोशिशों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया बहुत धीमी रही है। कुछ यूरोपीय सरकारों ने चिंता जताई और युद्धविराम की अपील की है, लेकिन उनकी आधी-अधूरी कोशिशों से घटनाओं का रुख नहीं बदलने जा रहा। लेबनान में चल रहा युद्ध एक बड़े भू-राजनीतिक नाटक में एक गौण घटना बनकर रह गया है और उसपर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है; लेकिन इस चुप्पी के गंभीर परिणाम होंगे।

    जब बड़े पैमाने पर लोगों का जातीय विस्थापन होता है, नागरिक बुनियादी ढांचा तबाह किया जाता है और बेशर्मी से किसी इलाके पर कब्जा किया जाता है, और फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आती, तो इससे गलत काम करने वालों को मनमानी करने की छूट मिल जाती है और वे और भी बड़े अपराध करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। गाजा में जो कुछ हुआ, वह इसी बात का सबूत है। अंतरराष्ट्रीय नियमों का क्षरण-यहां तक कि युद्ध ऑपरेशन में भी-अचानक नहीं होता; यह धीरे-धीरे होता है, उन चीजों के सामान्यीकरण के जरिये जिन्हें कभी अस्वीकार्य माना जाता था।

    इजराइल एक अन्य संप्रभु देश को नया रूप देने और उस पर कब्जा करने के लिए जबरदस्त सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर रहा है। वह लेबनान के नागरिकों पर भारी कीमत थोप रहा है, जिनका इस संघर्ष को संचालित करने वाली परिस्थितियों पर कोई नियंत्रण नहीं। लेबनान के लिए, इसके परिणाम उसके अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गए हैं। यह देश पहले से ही आधुनिक इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकटों में से एक की चपेट में था। सरकारी संस्थाएं कमजोर हैं, सार्वजनिक सेवाएं चरमरा रही हैं और राजनीतिक विभाजन बहुत गहरे हैं। यह युद्ध, पहले से ही नाजुक स्थिति वाले इस देश के विघटन की प्रक्रिया को और तेज कर रहा है।

    इसके नतीजे पूरे इलाके के लिए भी उतने ही गहरे हैं। दक्षिणी लेबनान में इसराइल की लंबे समय तक मौजूदगी से प्रतिरोध गहराएगा, उग्रवादी नेटवर्क मजबूत होंगे और बार-बार झड़प होने की आशंका बढ़ेगी। एक तरह से, यह अस्थिरता को संस्थागत रूप दे देगा। अगर दक्षिणी लेबनान को सचमुच एक और गाजा में बदला जा रहा है, तो सवाल केवल यह नहीं है कि क्या हो रहा है, बल्कि यह भी है कि ऐसा होने क्यों दिया जा रहा है और वह भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से इतनी ठंडे प्रतिरोध के साथ।

    (अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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