सतीसन के पक्ष में जनता का समर्थन, UDF सहयोगियों का साथ और उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि अहम रही. वहीं वेणुगोपाल को चुनने पर कांग्रेस को 2 नए उपचुनाव भी लड़ने पड़ते.
नई दिल्ली: केरल का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, इसे लेकर 10 दिन से चल रहा सस्पेंस आखिरकार गुरुवार को खत्म हो गया. कांग्रेस ने विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष वी.डी. सतीसन को उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी और एआईसीसी महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल पर तरजीह दी. इसके पीछे मुख्य रूप से पांच बड़ी वजहें रहीं.
पहली वजह यह थी कि छह बार के विधायक सतीसन ने कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था और उन्हें जनता का अच्छा समर्थन हासिल था. उन्होंने चुनाव से पहले कहा था कि अगर यूडीएफ को केरल की 140 सीटों में 100 से कम सीटें मिलती हैं तो वह “राजनीति छोड़ देंगे और वनवास चले जाएंगे.” आखिरकार गठबंधन ने 102 सीटें जीत लीं और कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए सतीसन पिछली पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ सबसे प्रमुख विपक्षी चेहरा थे. जबकि वेणुगोपाल राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं, लेकिन केरल में 10 साल बाद यूडीएफ की वापसी की ज़मीन सतीसन ने तैयार की थी.
वेणुगोपाल के मुख्यमंत्री बनने की संभावना को लेकर कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता केरल में सड़कों पर उतर आए थे. जनता का रुख समझते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने सतीसन को चुनना बेहतर समझा.
दूसरी वजह यह थी कि सतीसन को यूडीएफ के प्रमुख सहयोगी दलों का समर्थन हासिल था. इनमें 22 विधायकों वाली इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), 7 विधायकों वाली केरल कांग्रेस (जोसेफ) और 3 विधायकों वाली रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी शामिल थीं. इन दलों ने खुलकर सतीसन को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया था. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के लिए गठबंधन को एकजुट रखना ज़रूरी था क्योंकि सहयोगी दलों की पसंद को नज़रअंदाज़ करने से सरकार बनने की शुरुआत में ही तनाव पैदा हो सकता था.
तीसरी वजह यह रही कि के.सी. वेणुगोपाल ने भले ही केरल से तीन विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव जीते हों, लेकिन पिछले एक दशक में उन्हें काफी हद तक “दिल्ली मैन” माना जाने लगा है. इसकी वजह राहुल गांधी से उनकी करीबी और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका रही. वह 2017 से एआईसीसी के महासचिव हैं और ज्यादातर राष्ट्रीय राजनीति में ही सक्रिय रहे हैं. उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ा था और अगले साल राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बने थे.
चौथी वजह यह थी कि अगर वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाया जाता, तो कांग्रेस को तुरंत दो नए चुनाव लड़ने पड़ते. वेणुगोपाल फिलहाल अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद हैं और विधायक नहीं हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उन्हें संसद से इस्तीफा देकर छह महीने के भीतर विधानसभा उपचुनाव लड़ना पड़ता. इसमें हार का राजनीतिक खतरा भी था. केरल में विधान परिषद नहीं है. वेणुगोपाल ने 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपनी राज्यसभा सीट छोड़ी थी.
अगर वे मुख्यमंत्री बनते, तो कांग्रेस को अलाप्पुझा लोकसभा सीट पर भी उपचुनाव लड़ना पड़ता.
ऐसे समय में जब कांग्रेस कई राज्यों में चुनावी संघर्ष कर रही है, पार्टी के कई नेताओं का मानना था कि एक और चुनावी जोखिम लेना सही नहीं होगा. सतीसन पहले से विधायक और नेता प्रतिपक्ष थे, इसलिए उन्हें चुनना ज्यादा आसान और सुरक्षित विकल्प माना गया.
पांचवीं वजह यह रही कि सतीसन की छवि लगातार एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में बनी रही. ऐसे समय में जब केरल की राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ता दिख रहा है, सतीसन लगातार बीजेपी और सीपीआई(एम) दोनों पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं.
उनकी वैचारिक सोच कांग्रेस नेतृत्व की राष्ट्रीय लाइन से भी मेल खाती थी, खासकर राहुल गांधी के धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ लगातार दिए जाने वाले संदेश से.
सतीसन उन कुछ कांग्रेस नेताओं में शामिल रहे जिन्होंने विचारधारा के मामले में “जो कहा, वही किया” वाली छवि बनाई. राज्य में दूसरे नेताओं के मुकाबले वह कांग्रेस की वैचारिक लाइन को ज्यादा साफ तरीके से सामने रखते रहे.
जहां कई दूसरे नेता संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर नरम या सतर्क रुख अपनाते थे, वहीं सतीसन कांग्रेस के राष्ट्रीय संदेश को केरल में आक्रामक राजनीतिक अभियान के रूप में लगातार आगे बढ़ाते रहे.
पार्टी नेतृत्व के लिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाना इस बात का भी संकेत था कि कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीतिक लाइन और हाल के वर्षों में उसकी सबसे बड़ी चुनावी जीत के बीच एक निरंतरता बनी रहे.

