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    प्रधानमंत्री जी, आप जिस त्याग की मांग कर रहे हैं, उसका सबसे ज्यादा बोझ आखिर पड़ेगा किस पर?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 16, 2026

    मोदी की अपील में एक बुनियादी विरोधाभास है। इसके अलावा, सरकार के रवैये में एक असंतुलन भी है: वह एक तरफ तो कीमतें घटाने की कोशिश कर रही है, वहीं लोगों से उम्मीद कर रही है कि वे ऐसा बर्ताव करें, मानो कीमतें बहुत ज्यादा हों।

    अजीत रानाडे

    Published: 16 May 2026, 5:00 PM

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ईंधन, सोना, उर्वरक (खाद), खाना पकाने का तेल, सोलर पंप और विदेश यात्रा वगैरह 11 मदों में लोगों से हाथ रोकने की अपील की। तमाम लोग इसे दाम बढ़ाने के पूर्व संकेत की तरह ले रहे हैं। लेकिन इसके पीछे बड़ा मकसद है: विदेशी मुद्रा बचाने को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना। यह ऐसा जनअभियान है जो तरीके में बेशक महात्मा गांधी के 1930 के ‘नमक मार्च’ जैसा न हो, लेकिन जज्बे में वैसा ही है।

    गांधी की खासियत थी कि उन्होंने नमक को चुना- जो रोजमर्रा की चीज है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से बेहद ताकतवर- और इसके जरिये उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात की और इसे जन-आंदोलन बनाया। मोदी का नजरिया है कि हर भारतीय देश की आर्थिक मजबूती में निजी तौर पर जुड़ा महसूस करे और विदेशी मुद्रा बचाना एक देशभक्ति वाला काम बन जाए।

    इस सोच की तारीफ होनी चाहिए। भारत की कच्चे तेल, उर्वरक, सोने और खाने के तेल के आयात पर निर्भरता ऐसी कमजोरी है, जिसे मानते तो सभी हैं, लेकिन अब तक ठोस उपाय नहीं हुए। 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने भी खाने के मामले में कुछ ऐसा ही किया था; जब देश युद्ध और खाने के संकट से जूझ रहा था। तब शास्त्री जी ने सोमवार की शाम को उपवास की अपील की थी। समाजवादी मधु लिमये ने संसद में तर्क दिया था कि जब देश किसी संकट से गुजर रहा हो, तो स्वेच्छा से सादगी अपनाना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है; और यह कि राजनेताओं को उपदेश देने के बजाय खुद उदाहरण बनकर सामने आना चाहिए।

    आर्थिक संकट के समय नागरिक एकजुटता की अपील सम्मानजनक है, और पहले भी कारगर रही है। लेकिन जनता के बीच गहरी पैठ के अलावा, गांधीजी के नमक सत्याग्रह आंदोलन को नैतिक शक्ति इससे मिली थी कि नमक कर बेहद अन्यायपूर्ण और गरीबों के लिए नुकसानदेह था। गांधीजी ने इसी वजह से नमक को चुना। दूसरी ओर, विदेशी मुद्रा बचाने का आंदोलन किसी अन्याय के खिलाफ नहीं, बल्कि यह खुद ही गरीबों के लिए नुकसानदेह है। क्योंकि यह न्यूनतम संसाधन वालों से तकलीफ का सबसे ज्यादा बोझ उठाने की अपेक्षा करता है।

    इन ग्यारह अनुरोधों को इस नजरिये से देखें। विदेश में छुट्टियां मनाने या डेस्टिनेशन वेडिंग को टालने की बात अमीर ही सोच सकते हैं। इलेक्ट्रिक गाड़ी लेने का मतलब है कि आपके पास उसे खरीदने के पैसे थे। ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ का विकल्प सिर्फ ऑफिस में काम करने वाले प्रोफेशनल के लिए है, न कि दिहाड़ी पर काम करने वालों के लिए। खाने के तेल का इस्तेमाल कम करने का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास पहले से ही बहुत कम है, क्योंकि यह कोई विलासिता की चीज नहीं। इनमें से कुछ अनुरोध तो अमीरों को ध्यान में रखकर किए गए हैं; लेकिन कुछ अनुरोध अनजाने में ही उनसे उम्मीद करते हैं जिनके पास गुजारे के बहुत कम साधन हैं, वे त्याग का बड़ा हिस्सा उठाएं।

    तीन सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को रोजाना करीब 1000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है, और पिछले दस हफ्तों में उनका नुकसान 1 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया है। पेट्रोल पर मार्जिन 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 18 रुपये प्रति लीटर नेगेटिव है। इसकी भरपाई के लिए एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती से सरकारी खजाने को हर महीने 14,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। खाद सब्सिडी में 35,000-50,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्चे का अनुमान है। यह संकट तब आया है जब राजकोषीय स्थिति पहले ही दबाव में है: वित्त वर्ष 26 में, प्रत्यक्ष कर से कमाई संशोधित अनुमानों से 80,594 करोड़ रुपये कम रही। वित्त वर्ष 27 के लिए प्रत्यक्ष कर का लक्ष्य 26.97 लाख करोड़ रुपये है, जो 26 की वास्तविक कमाई से 15 फीसद ज्यादा है। लेकिन कमाई की रफ्तार पहले ही धीमी पड़ रही है।

    मोदी की अपील में एक बुनियादी विरोधाभास है। उनकी कुछ मांगें-जैसे सोने का आयात और विदेश यात्रा कम करना-सचमुच घरेलू उत्पादन को नुकसान पहुंचाए बिना चालू खाते को बेहतर बनाने में मदद करेंगी। लेकिन ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का मामला बिल्कुल अलग है: इससे महंगाई बढ़ती है, सभी परिवारों की वास्तविक आय घटती है, और यह भारतीय रिजर्व बैंक को दुविधा में डाल देगा-उसे रुपये को बचाने और आर्थिक विकास को बनाए रखने के बीच किसी एक को चुनना पड़ेगा। इसके अलावा, सरकार के रवैये में एक असंतुलन भी है: वह एक तरफ तो कीमतें घटाने की कोशिश कर रही है, वहीं लोगों से उम्मीद कर रही है कि वे ऐसा बर्ताव करें, मानो कीमतें बहुत ज्यादा हों।

    आयकर विभाग की 2026–27 के लिए केन्द्रीय कार्ययोजना में फील्ड अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपील में सही ठहराई गई 2.57 लाख करोड़ रुपये की टैक्स मांगों की वसूली को प्राथमिकता दें, पैन के हिसाब से टॉप 10,000 डिफॉल्टरों पर नजर रखें, और जुलाई तक 7.88 लाख करोड़ रुपये के बड़े, बिना क्लासिफाइड बकाये को क्लासिफाई करें। नहीं वसूली गई रकम का पैमाना चौंकाने वाला है: 9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिना विवाद वाली टैक्स मांगें बकाया हैं, जिनमें से ज्यादातर मुंबई (1.65 लाख करोड़ रुपये) और दिल्ली (1.21 लाख करोड़ रुपये) में हैं। वित्त वर्ष 26 में, 5.04 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले, असल वसूली सिर्फ 85,000 करोड़ रुपये थी।

    सरकार परिवारों से यह भरोसे के साथ नहीं कह सकती कि वे अपने खाना पकाने के तेल की खपत कम करें, जबकि बड़े कॉरपोरेट और व्यक्तिगत डिफॉल्टरों से 9 लाख करोड़ रुपये का टैक्स बकाया साल-दर-साल बिना वसूले पड़ा रहता है। यह सुनिश्चित करना कि टैक्स वसूल किए जाएं- चाहे इसके लिए किसी भी तरह की डिजिटल निगरानी का इस्तेमाल करना पड़े- एक जबरदस्त संकेत होगा और प्रधानमंत्री की देश से ‘बलिदान’ की अपील को कुछ विश्वसनीयता प्रदान करेगा।

    यह टैक्स व्यवस्था पर पुनःविचार का भी मौका है। क्या यह संरचना के हिसाब से प्रगतिशील है? भारत ने 2015 में वेल्थ टैक्स खत्म किया और 1985 के बाद से कोई एस्टेट या विरासत शुल्क नहीं लगाया गया। भारत के सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की अनुमानित 40% दौलत है। बहुत ज्यादा आय पर एक अस्थायी क्राइसिस सरचार्ज, या इस उथल-पुथल से फायदा उठाने वाली संस्थाओं- जैसे कमोडिटी ट्रेडर, घरेलू रिफाइनर – पर एक विंडफॉल लेवी, या फिर वेल्थ टैक्स कई मकसद पूरे करेगा: राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए रेवेन्यू जुटाना, बोझ को बराबरी से बांटना, और जन-आंदोलन को वह नैतिक आधार देना जिसकी उसे जरूरत है। मधु लिमये का तर्क ठीक यही था: बिना बराबरी के सादगी देशभक्ति नहीं, बल्कि यह तो तकलीफ को ऊपर से नीचे की ओर धकेलना है।

    हमें अपनी सहन-शक्ति और जोखिम-सुरक्षा उपायों की भी समीक्षा करनी होगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सदस्य देश एक संधि-दायित्व के तौर पर नब्बे दिनों का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार रखते हैं। यूरोप ने आपातकालीन गति से एलएनजी आयात टर्मिनल बनाए और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाई। जापान और दक्षिण कोरिया कीमतों में होने वाले बदलावों के संकेतों को तेजी से अपनाते हैं और वित्तीय बाजारों के जरिये अपने जोखिम को सुरक्षित करते हैं।

    भारत का रणनीतिक भंडार लगभग नौ से दस दिनों का है। भारत के पास कोई संस्थागत सुरक्षा-भंडार नहीं। यही कारण है कि इस स्थिति से निपटने के लिए, न के बराबर मौजूदा भंडार को इस्तेमाल करने के बजाय, लोगों से स्वेच्छा से संयम बरतने की अपील करना ही विकल्प बचता है।

    मोदी की विदेशी मुद्रा बचाने की अपील तब बेअसर साबित होगी, जब एक तरफ चुपके से ईंधन के दाम बढ़ाए जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ अमीर बकायेदारों से वसूली नहीं हो सकेगी, और गरीबों के लिए खाना पकाने का तेल और भी महंगा हो जाएगा। गांधी के आंदोलन इसलिए सफल हुए, क्योंकि वे नैतिक रूप से बेदाग थे। अगर भारत को विदेशी मुद्रा बचाने के लिए ‘सत्याग्रह’ करना है, तो इसकी रूपरेखा भी इसके लक्ष्य के अनुरूप ही होनी चाहिए। इसमें बोझ बांटने की सोच होनी चाहिए, नियमों को लागू करने में सख्ती होनी चाहिए, समस्याओं के समाधान में ढांचागत सुधार होना चाहिए, और उन ‘कीमतों के संकेतों’ को लेकर पूरी ईमानदारी होनी चाहिए, जिनकी जगह अंततः कोई भी स्वैच्छिक संयम नहीं ले सकता।

    अजित रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्य: द बिलियन प्रेस

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