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    आकार पटेल – जब किसी एक ही व्यक्ति को मिल जाएं सारे अधिकार और शक्तियां तो मनमानी तो होगी ही

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldDecember 22, 2025

    संसद में बिना विधायी और ठोस प्रक्रिया के बिलों को पास करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। इन बिलों में क्या है, इसकी सही समझ विपक्ष तो दूर सत्ता पक्ष के सांसदों तक को नहीं होती। लेकिन इस तरीके से बि

    आकार पटेल

    Published: 21 Dec 2025, 9:00 PM

    अभी 17 दिसंबर को वायनाड से कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने लोकसभा में मांग उठाई कि विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन बिल 2025 (जी राम जी बिल) को सुझावों और बदलावों के लिए स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा अन्य विपक्षी सांसदों ने भी कहा कि बिल सदस्यों के पोर्टल पर शाम 5 बजे मुहैया कराया गया, और शाम 5:45 बजे तक इसमें संशोधन मांगे गए थे। सांसदों ने कहा कि उन्हें पहले बिल को पढ़ने और समझने के लिए कम से कम एक दिन का समय दिया जाना चाहिए।

    जैसाकि अपेक्षित था इस आग्रह को ठुकरा दिया गया और बिल ध्वनिमत से 18 दिसंबर को पास हो गया। इस तरह देश का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून मनरेगा खत्म कर दिया और हमें पूरी बात पता भी नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया।

    संसद में बिना विधायी और किसी ठोस प्रक्रिया के बिलों को पास करने की प्रवृत्ति बहुत अधिक बढ़ गई है। इन बिलों में क्या है, इसकी कोई सही समझ विपक्ष तो दूर सत्ता पक्ष के सांसदों तक को नहीं होती। लेकिन इस तरीके से बिल पास करने का यह सिलसिला मोदी सरकार के समय में और तेज़ हो गया है।

    14वीं लोकसभा (2004-09) में, 60 प्रतिशत बिलों को जांच के लिए कमेटियों के पास भेजा गया था। इसके बाद वाली लोकसभा (2009-14) में, यह संख्या 71 प्रतिशत थी। पहली मोदी सरकार में यानी 2014 से 2019 के दौरान, यह घटकर 25 प्रतिशत रह गई। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल (2019-2024) में यह घटकर 16 प्रतिशत हो गया। इस तरह जानबूझकर बिलों को जांच और पड़ताल के लिए विभागों से जुड़ी संसदीय स्थायी समितियों को भेजने की संसदीय परंपरा को खत्म कर दिया गया।

    इसी तरह सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून को भी 2019 में बिना किसी कमेटी को भेजे, बदलाव करके कमजोर कर दिया गया। इसके सीधे नतीजे के तौर पर, आरटीआई इंडेक्स में भारत की ग्लोबल रैंकिंग दूसरे स्थान से गिरकर आठवें और फिर नौवें स्थान पर आ गई। 2019 में, तेलुगु देशम (टीडीपी) के सांसदों ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के सांसदों के साथ मिलकर बिना जांच-पड़ताल के बिलों को ‘जल्दबाजी में पास’ करने पर चिंता जताई थी।

    इन दलों ने लिखा था कि बिलों को लेकर वह सार्वजनिक विमर्श बंद हो गया है, जिसमें खास विषयों से जुड़े समूहों और व्यक्तियों को सांसदों द्वारा संभावित कानूनों पर अपने विचार रखने के लिए बुलाया जाता है। उन्होंने लिखा, ‘सार्वजनिक सलाह-मशविरा एक पुरानी प्रथा है जिसमें संसदीय समितियां बिलों की जांच करती हैं, उन पर चर्चा करती हैं, बातचीत करती हैं और कानून की सामग्री और गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में काम करती हैं।’ लेकिन इस सबका मोदी पर कोई असर नहीं हुआ, और 2020 में, एक भी बिल जांच के लिए किसी समिति को नहीं भेजा गया।

    ऐसे में अब यह सब लिखने का क्या औचित्य है? दरअसल औचित्य यह है कि सरकार को यह सीखना चाहिए कि वह अक्सर जल्दबाजी और अभिमान में ऐसे कदम उठाती है जिनकी कोई जरूरत नहीं होती।

    20 सितंबर 2020 को, जो अध्यादेश लोकसभा से पास हो गए थे, उन्हें राज्यसभा में ‘ध्वनिमत’ से पास करा दिया गया था, न कि डिवीजन ऑफ वोट से। डिवीजन ऑफ वोट का अर्थ है कि असल में वोटिंग कराई जाती है, जिसमें हां और ना कहने वालों की संख्या गिनी जाती है।

    तर्क यह दिया गया कि चूंकि सदन में बहुत शोर-शराबा था ऐसे में सदन को संचालित कर रहे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह सुन ही नहीं पाए कि विपक्षी सांसद डिवीजन ऑफ वोट की मांग कर रहे थे। और रोचक है कि जब ये सब हो रहा था तो राज्यसभा टीवी ने प्रसारण रोक दिया था और सांसदों के माइक बंद कर दिए गए थे। (बीजेपी ने इस तरीके को हाथोंहाथ लिया और इसका इस्तेमाल कर्नाटक विधान परिषद में आजमाया जहां उसके पास बहुमत नहीं है। बीजेपी ने वहां गौ हत्या विरोधी बिल ध्वनिमत से पास करा दिया जबकि वहां भी डिवीजन ऑफ वोट की मांग उठी थी।)

    इस तरीके को अपनाकर जो दो कानून लाए गए, वे थे फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) एक्ट, 2020 और फार्मर्स (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑफ प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट, 2020। यानी विवादास्पद कृषि बिल। पाठकों को याद दिला दें: पहले कानून ने सरकारी एग्रीकल्चर मार्केट, या मंडियों की मोनोपॉली खत्म कर दी और इनके बाहर उपज बेचने की इजाज़त दी। इसने इन नई जगहों पर टैक्स लगाने पर भी रोक लगा दी। इसका मतलब था कि, समय के साथ, जो मंडियां टैक्स देती हैं, वे बेकार हो जाएंगी।

    साथ ही इससे उन राज्यों के किसानों के हितों को नुकसान होगा जहां मंडियां अच्छे से चल रही थीं और किसानों की संतुष्टि के हिसाब से खरीद हो रही थी। दूसरे कानून ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को संभव बनाया। हालांकि, कानून में कहा गया था कि अगर खरीदार डिफ़ॉल्ट करता है तो परेशान किसान कोर्ट नहीं जा सकते – वे समाधान के लिए सिर्फ़ राज्य के सरकारी अधिकारियों के पास जा सकते हैं। तीसरे कानून ने ज़रूरी चीज़ों की जमाखोरी पर लगे बैन को हटा दिया, जिससे कंपनियों को जितना चाहें उतना अनाज स्टॉक करने की इजाज़त मिल गई।

    मोदी सरकार ने कहा कि इन कानूनों को बनाते समय उसने किसानों के हितों का ध्यान रखा था (कहा गया था कि इसका मकसद किसानों की आमदनी को दोगुना करना था, जो सालों से नहीं बढ़ी थी)। लेकिन अगर ऐसा था, तो यह समझ से बाहर था कि कानूनों में ऐसे प्रावधान क्यों थे जो जानबूझकर किसानों के हितों के खिलाफ जाते हुए लग रहे थे। इन कानूनों को पास करने का जो तरीका अपनाया गया था वह तो गलत था ही, उसके अलावा ये कानून संविधान की उस व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए भी दिखे, जिसके तहत खेती-बाड़ी राज्य का विषय है। इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों का है, केंद्र सरकार का नहीं। यहां बहाना यह दिया गया कि ये कानून असल में व्यापार को रेगुलेट करते हैं, न कि खेती-बाड़ी को। एक हफ़्ते बाद राष्ट्रपति ने इन बिलों पर हस्ताक्षर कर दिए और ये कानून बन गए, जिससे एक विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ जो एक जन आंदोलन बन गया।

    मनरेगा की तरह, ये ऐसे कानून थे जो करोड़ों भारतीयों की ज़िंदगी पर गहरा असर डालने वाले थे। सरकार ने यह नहीं सोचा कि इन भारतीयों की प्रतिक्रिया क्या होगी। शुरुआत में सरकार हैरान और अचंभित थी कि कोई विरोध भी हो सकता है। जब यह साफ़ हो गया कि सरकार असल में कानूनों को लागू नहीं करवा सकती, तो प्रधानमंत्री ने पूरे एक साल तक इसके नतीजों को नज़रअंदाज़ किया। आखिरकार उन्होंने माफ़ी मांगी और पीछे हट गए।

    लेकिन सवाल है कि शुरू से ही ऐसी बनाई ही क्यों गई? करोड़ों लोगों की ज़िंदगी के साथ इतनी लापरवाही और घमंड से खिलवाड़ क्यों किया? लेखक और सच कहूं तो पाठक के लिए भी यह कहना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि किसी को असीमित शक्ति और अधिकार मिले हुए हैं, तभी ऐसे कदम उठाने के बारे में सोचा जा सकता है और इस देश में सिर्फ़ एक ही व्यक्ति इस तरह से सोचता है।

    ल पास करने का सिलसिला मोदी सरकार के समय में और तेज़ हो गया है।

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