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    राष्ट्रपिता की कुर्बानी के 78 साल, लगातार हमलों के बावजूद आज भी जिंदा हैं उनके मूल्य

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJanuary 29, 2026

    हिन्दू-मुस्लिम एकता गांधीजी के जीवन का मूलमंत्र था। इस महामानव के इस मिशन को समकालीन राजनीति ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। हम यह नहीं भूल सकते कि गांधीजी के सीने को छलनी करने वाला व्यक्ति हिन्दू राष्ट्रवाद (हिन्दुत्व) की विचारधारा का कट्टर समर्थक था।

    राम पुनियानी

    Published: 29 Jan 2026, 7:59 AM

    इस साल शहीद दिवस (30 जनवरी 2026) पर महात्मा गांधी को याद करते हुए हमें यह एहसास भी है कि गांधीजी के मूल्यों और उनकी विरासत को कमजोर करने के लिए सतत प्रयास किए जा रहे हैं। साम्प्रदायिक शक्तियों का प्रोपेगेंडा हर बीतते दिन के साथ अधिकाधिक तीखा और हमारे समाज का विभाजन और गहरा होता जा रहा है।

    हिन्दू-मुस्लिम एकता गांधीजी के जीवन का मूलमंत्र था। इस महामानव के इस मिशन को समकालीन राजनीति ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। हम यह नहीं भूल सकते कि गांधीजी के सीने को तीन गोलियों से छलनी करने वाला व्यक्ति हिन्दू राष्ट्रवाद (हिन्दुत्व) की विचारधारा का कट्टर समर्थक था। यह विचारधारा राष्ट्रीय आंदोलन की विचारधारा के एकदम विपरीत थी।

    राष्ट्रीय आंदोलन स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों से ओतप्रोत था। मुस्लिम राष्ट्र की मांग करने वाली साम्प्रदायिक शक्तियां तो पाकिस्तान के निर्माण के बाद क्षीण हो गईं लेकिन हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों ने धीरे-धीरे स्वयं को मजबूत बनाना शुरू किया। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन से जुड़ने के पहले तक इन शक्तियों को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। इस आंदोलन का हिस्सा बनने के बाद सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य पर वे अधिक सशक्त होकर उभरीं।

    चूंकि गांधीजी की सारे विश्व में उजली और बेदाग छवि थी इसलिए बीजेपी-आरएसएस तक को उनके प्रति सम्मान भाव प्रदर्शित करना पड़ा। लेकिन यह मात्र दिखावा था। शाखाओं और उनके अन्य मंचों के जरिए वे हिंदू समुदाय को असहाय बनाने, हिंदुओं के हितों की बलि चढ़ाकर मुसलमानों को बढ़ावा देने, भगत सिंह की जान न बचाने, महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाषचन्द्र बोस को नजरअंदाज करने और अपेक्षाकृत अधिक सक्षम सरदार पटेल की बजाए नेहरू को अपना उत्तराधिकारी नामांकित कर प्रधानमंत्री बनाने आदि के लिए गांधीजी को दोषी ठहराते रहे।

    शुरूआत में मुहंजुबानी प्रोपेगेंडा और बाद में अन्य माध्यमों के जरिए वे समाज में गांधीजी के बारे में गलत धारणाएं कायम करने और साथ ही उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करने में कामयाब रहे हैं। यहां तक कि गांधीजी की हत्या के दृश्य के सार्वजनिक प्रदर्शन तक आयोजित हुए हैं। इससे यह साफ है कि उनके प्रति किस हद तक नफरत पैदा कर दी गई है। गांधीजी को नीचा दिखाने और गोडसे का यशोगान करने वाले नाटक और फिल्में बड़े पैमाने पर बनाई और प्रदर्शित की जा रही हैं।

    गांधीजी के खिलाफ किए जा रहे अधिकांश दुष्प्रचार के पीछे हिंदुत्व शक्तियां हैं। ऐसा वे अपने को मज़बूत करने और स्वाधीनता संग्राम के उन मूल्यों का विरोध करने के लिए कर रही हैं, जो भारतीय संविधान में भी प्रतिबिंबित होते हैं। तुर्की में खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिए सन् 1919 में शुरू हुआ मुसलमानों का विश्वव्यापी आंदोलन, भारतीय मुसलमानों को औपनिवेशिक सरकार के विरोध में चलाए जा रहे संघर्ष से जोड़ने का एक अच्छा अवसर था।

    गांधीजी ने इस मौके का फायदा उठाया जिससे स्वाधीनता संग्राम को व्यापक स्वरूप प्रदान करने का लक्ष्य काफी हद तक हासिल हुआ। इसके समानांतर चलाया गया असहयोग आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ पहला ऐसा संघर्ष था जिसमें सामान्य जनता की बड़े पैमाने पर भागीदारी थी। इसके पहले बंगभंग के खिलाफ व्यापक जनांदोलन हो चुका था। असहयोग आंदोलन ने जबरदस्त जोर पकड़ लिया था लेकिन दुर्भाग्यवश चौरी-चौरा कांड के कारण उसे स्थगित करना पड़ा।

    दांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह 12 मार्च 1930 को प्रारंभ हुआ और उसके साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत हुई। जहां दांडी यात्रा उसी वर्ष अप्रैल माह में समाप्त हो गई, वहीं सविनय अवज्ञा आंदोलन 1934 तक जारी रहा। इस बीच भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू मौत की सजा का सामना कर रहे थे। यह झूठ फैलाया जाता है कि गांधीजी चाहते तो इनकी फांसी रूकवा सकते थे। दिलचस्प बात यह है कि जो ये झूठ फैलाते हैं, उन्होंने उस समय इन क्रांतिकारियों के समर्थन में एक शब्द तक नहीं कहा था। गांधीजी ने उन्हें मृत्युदंड न देने का अनुरोध करते हुए वायसराय लार्ड इरविन को दो बार पत्र लिखा। उन्होंने इरविन से मुलाकात के दौरान भी इस मुद्दे पर चर्चा की।

    इरविन ने इस अपील पर विचार किया किंतु ब्रिटिश सरकार ने इसे खारिज कर दिया क्योंकि पंजाब में तैनात ब्रिटिश अधिकारियों ने क्रांतिकारियों की मौत की सजा रद्द या स्थगित किए जाने पर इस्तीफा देने की धमकी दी थी। प्रसिद्ध इतिहासकार व्ही. एन. दत्ता भी गांधी-इरविन के बीच हुए पत्र व्यवहार और समकालीन साक्ष्यों के आधार पर इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि “गांधी, भगत सिंह का जीवन बचाने के अत्यंत इच्छुक थे और इसलिए लार्ड इरविन से भगत सिंह को फांसी न दिए जाने की अपील कर रहे थे”। दत्ता के अनुसार गांधीजी की भूमिका समझने के लिए हमें ‘‘वायसराय से उनकी चर्चाओं को उस समय के राजनैतिक माहौल, जनमत के दबाव, वायसराय की भूमिका और ब्रिटिश नौकरशाही की कार्यप्रणाली और भारत व ब्रिटेन में साम्राज्यवादी तंत्र के संदर्भ में देखना होगा‘‘।

    दूसरा बड़ा झूठ जिसे बड़े पैमाने पर फैलाया जाता है वह यह है कि गांधीजी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और उनके योगदान  को नजरअंदाज किया। सच यह है कि नेताजी ने ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के तौर-तरीकों पर मतभेद के चलते पूरी गरिमा और सम्मान के साथ कांग्रेस को छोड़ा था। जहां कांग्रेस के अधिकांश नेता ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करने के पक्ष में थे वहीं नेताजी चाहते थे कि ब्रिटेन से लोहा लेने के लिए धुरी ताकतों (जापान और जर्मनी) से मदद ली जाए। उस समय हिंदुत्ववादी शक्तियां ज्यादा से ज्यादा भारतियों को ब्रिटिश फ़ौज में भरती करने के अभियान में जुटी हुई थीं। इसी ब्रिटिश फ़ौज ने  नेताजी की आजाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

    परस्पर मतभेद के बाद भी नेताजी और गांधीजी एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। जहां सुभाषचन्द्र बोस गांधीजी को राष्ट्रपिता कहते थे वहीं गांधीजी, बोस को ‘देशभक्तों का राजा’ बताते थे। एक बैठक में गांधीजी ने सुभाषचन्द्र बोस से कहा था कि वे उस रास्ते पर चलने के घोर विरोधी हैं जिसकी वकालत नेताजी कर रहे हैं। मगर अगर उस रास्ते पर चलकर भारत को आज़ादी हासिल होती है तो वे उन्हें बधाई देने वाले पहले व्यक्ति होंगे। नेताजी ने आजाद हिंदी फ़ौज की पहली बटालियन का नाम गांधीजी के नाम पर रखा था। कांग्रेस ने आजाद हिन्द फ़ौज के कैदियों की पैरवी के लिए एक समिति बनाई थी जिसके प्रमुख सदस्यों में भूलाभाई देसाई, कैलाशनाथ काटजू और जवाहरलाल नेहरु शामिल थे। इस समिति ने आजाद हिंदी फ़ौज के कैदियों की कानूनी लड़ाई लड़ी।

    जहां तक गांधीजी के उत्तराधिकारी और भारत के भावी प्रधामंत्री का सवाल है, महात्मा गांधी ने 1940 के दशक की शुरुआत में ही यह साफ़ कर दिया कि उनके उत्तराधिकारी न तो राजाजी होंगे और न पटेल। वे नेहरु होंगे। व्यावहारिक दृष्टि से 1937 और 1946 के चुनावों में कांग्रेस का नेतृत्व नेहरु ने ही किया था। सरदार पटेल ने कहा था कि इन दोनों चुनावों में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करते के लिए नेहरु ने अकल्पनीय मेहनत की है।

    सन 1946 में मौलाना आजाद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद जब कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुना जाना था तब महात्मा गांधी ने पटेल से दौड़ से हट जाने को कहा था। गांधीजी के अनुयायी और नेहरु के पुराने साथी बतौर, पटेल को इस सब से कोई शिकायत नहीं थी और वे जीवनभर नेहरु के साथ मिलकर काम करते रहे। दोनों के बीच मतभेद होते थे मगर उन्हें व्यक्तिगत मुलाकातों या कैबिनेट की बैठकों में सुलझा लिया जाता था। पटेल ने कहा था कि नेहरु उनके छोटे भाई और नेता हैं।

    गांधीजी का देश की नब्ज पर हाथ था। उन्हें पता था कि उनके बाद, देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता नेहरु ही हैं। गांधीजी यह भी जानते थे कि नेहरु को देश के युवा बहुत पसंद करते हैं।

    गांधीजी बीसवीं सदी के भारत के महानतम नेता थे। वे भारत को बहुत अच्छी तरह से समझते थे। आज सांप्रदायिक ताकतें हमारे देश की हर असफलता, हर कमी  के लिए नेहरु को दोषी ठहरा रही हैं। गांधीजी पर भी अप्रत्यक्ष ढंग से हमले किए जा रहे हैं।

    (लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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