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    ‘स्पीकर सर, आप अपने पद का मान रखिए’

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldFebruary 16, 2026

    लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अपने फैसलों और कार्यशैली से जो उदाहरण बना रहे हैं, वे लोकतंत्र के लिए गंभीर अंदेशे पैदा कर रहे हैं।

    कृष्ण प्रताप सिंह

    Published: 15 Feb 2026, 1:01 PM

    देश की पहली लोकसभा 1952 में गठित हुई तो गणेश वासुदेव मावलंकर उसके अध्यक्ष चुने गये। अनेक लोग जहां जी वी मावलंकर का आदर करते हुए उन्हें ‘दादा साहब’ कहते थे, वहीं प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ‘लोकसभा का जनक’। निस्संदेह, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से थे और उनका उससे स्वाभाविक लगाव था। लेकिन मजाल क्या कि उन्होंने कभी इस लगाव को लोकसभा अध्यक्ष के आसन से किये जाने वाले अपने फैसलों, दी जाने वाली व्यवस्थाओं या कार्यवाही के संचालन के नियमों के आड़े आने दिया हो। इसलिए जब 27 फरवरी 1956 को हमने उन्हें खोया तो वे भारतीय संसदीय प्रणाली में ईमानदारी और उच्च नैतिक मानकों की नींव रखने वाले नायक के तौर पर  जाने जाने लगे थे।

    उनका मानना था कि अध्यक्ष के रूप में लोकसभा के सभी सदस्यों के लिए, वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के, समान न्याय का पैमाना अपनाना उनका सबसे पवित्र कर्तव्य है। हां, एक बार उनको लगा कि नेहरू सरकार की बार-बार अध्यादेश जारी करने की प्रवृत्ति देश की संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है तो उन्होंने उसका कतई कोई लिहाज न करते हुए नेहरू को पत्र लिखकर यह तक लिखने से गुरेज नहीं किया था कि केवल समय की कमी के कारण अध्यादेश लाना एक गलत परंपरा है और संसद को केवल ‘रबर स्टैम्प’ नहीं बनाया जाना चाहिए।

    इतना ही नहीं, संसदीय संप्रभुता बनाए रखने की अपनी नैतिक प्रतिबद्धता के तहत उन्होंने लोकसभा के लिए एक स्वतंत्र सचिवालय की स्थापना पर जोर दिया था। यह और बात है कि 18 दिसंबर 1954 को तत्कालीन विपक्ष उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव ले आया था, जिसे ‘तुच्छ’ और ‘विद्वेषपूर्ण’ बताने के बावजूद पं. नेहरू ने उस पर बहस में विपक्ष के नेताओं को ज्यादा समय देने की वकालत की थी।

    थोड़ा पीछे मुड़कर आजादी से पहले के दौर में देखें तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन 31 जुलाई 1937 को निर्विरोध संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) विधानसभा के पहले अध्यक्ष चुने गए तो 1946 – 1950 के दौरान भी इस पद पर रहे थे। उनकी निष्पक्षता और तटस्थता कैसी थी, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जब विपक्ष ने अध्यक्ष होने के बावजूद उनके भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठकों में भाग लेने को लेकर सवाल उठाए तो उन्होंने सदन के पटल पर घोषणा भी कर दी कि जिस दिन सदन का एक भी सदस्य उनके निर्णय या उनकी निष्पक्षता में अविश्वास व्यक्त करेगा, वे अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देंगे। इसके बाद किसी विधायक ने इस मुद्दे को नहीं उठाया।अडिग कार्यशैली और सिद्धांतों के प्रति समर्पण के कारण उनको ‘राजर्षि’ की उपाधि दी गई, सो अलग।

    इस प्रसंग में 1967-69  के बीच बिहार विधानसभा के अध्यक्ष रहे धनिकलाल मंडल का जिक्र न करना अनैतिक होगा। वे विधानसभा के अध्यक्ष थे तो बिहार में राजनीतिक अस्थिरता अपने चरम पर थी। महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में बनी और बेहद नाजुक संतुलन पर टिकी राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल सरकार जनवरी 1968 में उठा-पटक और पाला बदल के खेल के बीच तब गहरे राजनीतिक संकट में पड़ गई, जब उसका विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव से सामना हुआ। 

    सिन्हा बहुमत का जुगाड़ नहीं कर पाए तो गुपचुप ढंग से मंडल से गुहार लगाने उनके आवास पर जा पहुंचे। उन्होंने उनसे निवेदन किया कि वे विधानसभा अध्यक्ष के रूप में अपनी शक्तियों का प्रयोग करके अविश्वास प्रस्ताव पर विचार की तारीख थोड़ी आगे बढ़ा दें। इस बीच वे अपनी सरकार के लिए वह बहुमत जो अभी उनके  पास नहीं है, जुटा लेंगे।

    लेकिन मंडल का दो टूक जवाब था कि अब तो उन्होंने उनके, यानी विधानसभा अध्यक्ष के सामने स्वीकार भी कर लिया है कि उनके पास बहुमत नहीं है, ऐसे में बेहतर होगा कि अब वे राज्यपाल के पास जाएं और उनको अपना इस्तीफा दे दें। लेकिन सिन्हा ने ऐसा नहीं किया और उनकी सरकार 28 जनवरी 1968 को अविश्वास प्रस्ताव की मार्फत बाहर हुई।

    यहां लोकसभा और विधानसभाओं के इन अध्यक्षों द्वारा सदनों में अपनी कार्यशैली को पाक-साफ रखकर जतन से बनाए गए लोकतांत्रिक शुचिता, ईमानदारी और नैतिकता के इन उदाहरणों का जिक्र इसलिए जरूरी लगा कि वर्तमान लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला अपने फैसलों और कार्यशैली से जो उदाहरण बना रहे  हैं, वे इनके साफ विलोम नजर आ रहे और लोकतंत्र के लिए गंभीर अंदेशे पैदा कर रहे हैं।

    याद कीजिए, लोकसभा के एक पूर्व सत्र में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा था कि वे (लोकसभाध्यक्ष) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाते हैं तो बिछ-बिछ जाते हैं और मुझ (विपक्ष के नेता) से मिलाते हैं तो तने रहते हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष में इस भेदभाव की इंतिहा यह कि कई बार वे परस्परविरोधी व्यवस्थाएं तक दे डालते हैं। लोकसभा के बजट सत्र में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया।

    राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद के प्रस्ताव पर बोलने खड़े हुए तो उनको देश की सुरक्षा के सिलसिले में भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक ‘फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी’  का जिक्र करने और उसका वह उद्धरण (जिससे पता चलता है कि 2020 में सीमा पर चीन की आक्रामकता के समय किस तरह रक्षा मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने नरवणे को यथासमय उपयुक्त आदेश नहीं दिया) पढ़ने से यह कहकर रोक दिया कि वे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलें। उन्होंने राहुल के इस सीधे सादे तर्क को भी नकार दिया कि देश की सुरक्षा का इतना महत्त्वपूर्ण मुद्दा अभिभाषण से अलग नहीं हो सकता और ऐसा करते हुए वे लोकसभा के एक पूर्ववर्ती सत्र में अपने ही द्वारा दी गई उस व्यवस्था को भूल गए कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए धन्यवाद के प्रस्ताव पर चर्चा में सदस्य उन विषयों पर भी बोल सकते हैं, जिनका अभिभाषण में जिक्र नहीं हो और जिसे वे उसमें जुड़वाना चाहते हों।

    उनके दोहरे मापदंड की एक और बड़ी मिसाल तब भी सामने आई जब राहुल को तो नरवणे की पुस्तक से उद्धरण देने से रोका गया, लेकिन बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को पं. नेहरू और गांधी परिवार को अकारण लांछित करने के लिए पुस्तकों के उल्लेख की खुली छूट दे दी गई। यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी के अभिभाषण के लिए धन्यवाद के प्रस्ताव पर चर्चा का उत्तर देने के लिए लोकसभा न आने के अगले दिन उनका कवच बनते हुए उन्होंने कह डाला कि मैंने ही प्रधानमंत्री से सदन में न आने का आग्रह किया था, क्योंकि उनके साथ कोई ‘अप्रत्याशित घटना’ हो सकती थी।

    उनके इस कथन से जुड़े कई सवालों के जवाब अभी तक नदारद हैं। मिसाल के तौर पर यह कि उनको किस एजेंसी से और कैसे इसकी जानकारी मिली और मिलने के बाद उन्होंने क्या कदम उठाए? क्या उसकी जांच के लिए उन्होंने कोई एफआईआर दर्ज कराई और नहीं कराई तो क्यों? क्यों सदन में प्रधानमंत्री के साथ किसी अनहोनी के अंदेशे से अवगत होने और उनको आने से रोकने के बाद भी वे उसे ऐसे चलाते रहे जैसे कुछ हुआ हुआ ही न हो! फिर उनका काम सदन को इतना व्यवस्थित रखना था, जिससे प्रधानमंत्री चर्चा का जवाब दे सकें या उन्हें उसमें आने से ही रोक देना? ऐसे में, जैसा कि विपक्ष ने कहा है, अगर यह उनके द्वारा प्रधानमंत्री को विपक्ष के तीखे सवालों से बचाने का हथकंडा था, तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि उनकी सारी की सारी शुभकामनाएं सत्तापक्ष के साथ हैं।

    विपक्ष के नेताओं को अलानाहक रोकने-टोकने की कई मिसालें हैं। 24 जुलाई 2024 को बजट पर चर्चा के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने नोटबंदी का जिक्र कर दिया। इस पर बिरला ने कहा कि नोटबंदी तो पुरानी बात हो गई, बजट पर बोलिए। बनर्जी ने पलट कर पूछ लिया कि जब सत्ता पक्ष पचास साल पहले लगी इमर्जेंसी का जिक्र करता है और उससे  भी पहले जाकर नेहरू की आलोचना करता है तो आप कुछ नहीं बोलते और मैं नोटबंदी का जिक्र करता हूं तो इस तर्क पर कि उसके बाद तो दो लोकसभा चुनाव हो चुके, आप कहते हैं कि बजट पर बोलिए। इसी सिलसिले में उन्होंने आगे कहा कि यह पक्षपात नहीं चलेगा सर, आप अपने पद का मान रखिए।

    लेकिन बिरला ने यह मान इस तरह रखा है कि उनके अब तक के कार्यकाल को खासतौर पर इस बात के लिए जाना जाता है कि उसमें रिकॉर्ड संख्या में विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया है।

    ऐसे में अभिषेक बनर्जी द्वारा 24 जुलाई 2024 को उनसे कहे गए वे शब्द फिर से दोहराने की जरूरत महसूस होती है: स्पीकर सर, आप अपने पद का मान रखिए।

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