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    संघ ममता बनर्जी को नुकसान पहुंचाने जा रहा या फायदा?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldApril 4, 2026

    वोटर लिस्ट में हेर-फेर, प्रशासनिक बदलाव और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बाद भी बीजेपी की पहुंच से बंगाल दूर रह सकता है।

    ब जुलाई 2023 में बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने राज्यसभा के लिए नागेंद्र राय उर्फ ​​अनंत महाराज को चुना, तो आरएसएस ने कड़ी नाराजगी जताई। आरएसएस के स्थानीय नेताओं का मानना ​​था कि बीजेपी को किसी ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए था जो उनकी वैचारिक जड़ों से ज्यादा जुड़ा हुआ हो। अनंत महाराज वह व्यक्ति था जिसने पश्चिम बंगाल से अलग राज्य (ग्रेटर कूच बिहार) बनाने के आंदोलन की अगुवाई की थी। लेकिन लोगों की भौहें तन गईं जब महाराज निर्विरोध चुन लिए गए। उन्होंने चुने जाते ही ग्रेटर कूच बिहार की मांग छोड़ दी। यह बात तृणमूल कांग्रेस और आरएसएस, दोनों को ही भाने वाली थी।

    फरवरी 2026 में जब राज्य सरकार ने अनंत महाराज को राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बंग विभूषण’ से सम्मानित किया, तो एक बार फिर लोगों की भौंहें तन गईं। राजनीतिक जानकारों ने इसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक ऐसी चाल के तौर पर देखा, जिसका मकसद विधानसभा चुनावों से पहले आरएसएस और भाजपा में फूट डालना था।

    आरएसएस के साथ बनर्जी के रिश्ते सहूलियत वाले और अस्थिर रहे हैं। 2011 से पहले, जब ममता को वामपंथियों से मुकाबला करना था, तब वह आरएसएस स्वयंसेवकों को ‘देशभक्त’ बताती थीं। 2011 के बाद, जब वह राज्य सचिवालय में पूरी तरह स्थापित हो चुकी थीं, तो उन्होंने आरएसएस के ‘अच्छे लोगों’ की तारीफ की। अब, जब पश्चिम बंगाल एक और अहम चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, तो ये रिश्ते पूरी तरह विरोधी हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस, आरएसएस को बीजेपी के ‘बंगाल-विरोधी एजेंडे’, सांप्रदायिक राजनीति को भड़काने और एसआईआर के जरिये बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने के पीछे की ‘मुख्य ताकत’ मान रही है।

    आरएसएस ने भी अपनी भूमिका बदल ली है। अब वह पर्दे के पीछे से वैचारिक प्रभाव डालने वाली संस्था से हटकर, स्थानीय स्तर पर और खास चुनाव क्षेत्रों में जोरदार तरीके से काम करने वाली संस्था बन गई है। आरएसएस के वरिष्ठ नेता जिष्णु बसु ने ‘नेशनल हेरल्ड’ को बताया, ‘यह चुनाव बंगाल के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। बंगाली हिन्दुओं के अस्तित्व को बचाने के लिए आरएसएस राजनीतिक और सामाजिक, हर तरह का प्रयास करेगा।’

    बीजेपी के लगभग 40 फीसद उम्मीदवारों ने राजनीतिक सफर आरएसएस के स्वयंसेवक या प्रचारक के तौर पर शुरू किया जिसके बाद उन्हें ‘कुछ समय के लिए’ बीजेपी में भेजा गया। पार्टी ने खड़गपुर सदर जैसी सीटों से दिलीप घोष जैसे बड़े चेहरों को मैदान में उतारा है, जिनकी जड़ें आरएसएस में गहरी हैं। चुनाव के दिन स्वयंसेवक बूथों का प्रबंधन भी सक्रिय रूप से संभालेंगे, ताकि उन इलाकों में ज्यादा से ज्यादा लोग वोट डालने आएं जहां बीजेपी मजबूत स्थिति में है।

    एक माकपा कार्यकर्ता ने कहा, ‘शहरी इलाकों के अमीर बीजेपी समर्थकों को चुनाव के दिनों में पोलिंग बूथ पर ड्यूटी करने की मेहनत करना पसंद नहीं आता।’ ग्रामीण बंगाल में, आरएसएस कार्यकर्ता इस तरह की किसी भी कमी को पूरा करेंगे। आरएसएस स्वयंसेवक चार भौगोलिक क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, जहां उनका मानना ​​है कि चुनाव का नतीजा तय होगा। उनकी प्राथमिकता मतुआ बहुल इलाका है, जिसमें उत्तरी 24 परगना और नदिया जिले की गाइघाटा, बनगांव उत्तर (एससी) और बागदा (एससी) जैसी सीटों को मिलाकर कुल 17–21 सीटें हैं।

    एसआईआर के तहत 9.5 फीसद मतुआ लोगों को ‘नॉन-मैप्ड’ (अचिह्नित) श्रेणी में डाल दिया गया, क्योंकि वे अपने पुराने दस्तावेज पेश नहीं कर पाए थे। आरएसएस ने मतुआ लोगों के धार्मिक केन्द्र ठाकुर नगर के आस-पास दस्तावेजों से जुड़ी मदद के लिए कई हेल्प डेस्क खोले हैं।

    मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर- ये ऐसे जिले हैं जो बांग्लादेश सीमा पर पड़ते हैं और जहां मुसलमानों की आबादी काफी ज्यादा है। यहां आरएसएस आबादी में हो रहे बदलावों के बारे में वोटरों में जागरूकता पैदा करने पर जोर दे रहा है। चोपड़ा, गोलपोखर और इस्लामपुर ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां भाजपा अपनी रैलियों में घुसपैठियों के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है, वहीं आरएसएस स्थानीय क्लबों और लाइब्रेरीज के साथ मिलकर सांस्कृतिक विरासत को बचाने के तरीकों पर चर्चा करने में जुटा है। आरएसएस उन सीटों पर खास तौर पर सक्रिय है, जहां बड़ी संख्या में वोटरों का मामला अभी ‘अदालत में विचाराधीन’ है।

    आरएसएस के एक कार्यकर्ता ने ‘नेशनल हेरल्ड’ को बताया, ‘सीमा पार बांग्लादेश के इलाकों में जमात-ए-इस्लामी को चुनाव में मिली सफलता हमारे लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।’ पश्चिम बंगाल के शहरी और औद्योगिक इलाकों- जैसे कोलकाता, हावड़ा और आसनसोल- में, जहां वोटर लिस्ट से सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं, आरएसएस ‘लापता वोटरों’ की समस्या से निपटने के लिए ‘सद्भाव बैठकें’ आयोजित कर रहा है। जोड़ासांको, चौरंगी और कोलकाता पोर्ट- ये ऐसे मिले-जुले इलाके हैं जहां हिन्दी बोलने वालों की आबादी काफी ज्यादा है- यहां आरएसएस, स्थानीय मुद्दों से जुड़ी भावनाओं को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहा है।

    झारग्राम, पुरुलिया और बांकुरा तक फैले जंगलमहल आदिवासी क्षेत्र में, ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ अपनी ‘पंच परिवर्तन पहल’ के जरिये इस अभियान को आगे बढ़ा रहा है। इस पहल में सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक मूल्यों, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता और नागरिक कर्तव्यों पर जोर दिया गया है। उम्मीद है कि आदिवासी गांवों में ‘स्वबोध’ की भावना जगाने से, ‘युवाश्री’ और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं पर उनकी निर्भरता कम होगी।

    आरएसएस की गतिविधियां बीजेपी या तृणमूल कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होंगी या नुकसानदेह, यह ऐसा सवाल है जिस पर जोरदार बहस चल रही है।

    माकपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय समिति के पूर्व सदस्य रॉबिन देब कहते हैं, ‘ममता बनर्जी आरएसएस की ही बनाई हुई हैं और आरएसएस उन्हें बंगाल से हटाना नहीं चाहेगा।’ देब के मुताबिक, 1990 के दशक के आखिर में दो क्षेत्रीय पार्टियों के गठन के पीछे आरएसएस का ही हाथ था- 1996 में तमिलनाडु में जी.के. मूपनार के नेतृत्व में ‘तमिल मनीला कांग्रेस’ और 1998 में पश्चिम बंगाल में ‘तृणमूल कांग्रेस’। इसका मकसद दोनों राज्यों से कांग्रेस को खत्म करना था। देब कहते हैं, ‘ममता बनर्जी न्यू टाउन में जो ‘दुर्गा आंगन’ बनवा रही हैं, उसे मोहन भागवत का आशीर्वाद प्राप्त है। भागवत ने ही ममता बनर्जी को ‘दुर्गा’ कहा था।

    इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि तृणमूल के शासनकाल में ही आरएसएस ने पश्चिम बंगाल में संगठन का विस्तार किया। जब 2011 में ममता सत्ता में आईं, तब आरएसएस की लगभग 830 शाखाएं थीं। तब से यह संख्या पांच गुना बढ़ गई है। मध्य बंगाल में, 2023 और 2025 के बीच इसने 500 नई शाखाएं जोड़ीं, जिससे इनकी संख्या 1,320 से बढ़कर 1,823 हो गई। पूरे ग्रामीण बंगाल में, विशेष रूप से सीमावर्ती जिलों में, दैनिक शाखाओं, साप्ताहिक मिलनों और मासिक मंडलियों की संख्या बढ़ाने का भी सुनियोजित प्रयास किया गया। रिपोर्ट बताती है कि ऐसी 4,540 इकाइयां कार्यरत हैं, और इस महीने के अंत तक 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले 8,000 इकाइयों का लक्ष्य रखा गया है।

    विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान और उसकी राज्य-स्तरीय शाखाओं (सरस्वती शिशु मंदिर और सरस्वती विद्या मंदिर) के तहत चल रहे संघ से जुड़े स्कूल बंगाल में आरएसएस और तृणमूल कांग्रेस के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का उदाहरण हैं। ये स्कूल, जो वामपंथी-धर्मनिरपेक्ष राज्य बोर्ड और कुलीन मिशनरी स्कूलों, दोनों को चुनौती देते हैं, 2011 के बाद तेजी से बढ़े। वर्तमान में, विद्या भारती से जुड़े 1,500 से ज्यादा स्कूल हैं, जिनमें 3.5 लाख छात्र पढ़ते हैं।

    इस बीच, बीजेपी को अपने अंदरूनी गुटों के बीच तालमेल बैठाने में मुश्किल हो रही है। जहां एक गुट-जिसका केन्द्र दिलीप घोष हैं- को आरएसएस का आशीर्वाद प्राप्त है, वहीं दूसरे गुट- जिसकी अगुवाई सुवेंदु अधिकारी कर रहे हैं, उसे अमित शाह से ताकत मिल रही है। टिकट बंटवारे को लेकर दोनों गुटों के बीच चल रही खींचतान खुलकर सामने आ चुकी है। यदि आरएसएस ममता बनर्जी के प्रति नरम रुख अपनाने का फैसला करता है- उदाहरण के लिए, ‘बूथों पर मोर्चा न संभालने’ का निर्णय लेकर- तो हो सकता है कि बंगाल भाजपा की पहुंच से बाहर ही रह जाए; भले वोटर लिस्ट में हेरफेर किया गया हो, अमित शाह ने राज्यपाल से लेकर जिलाधिकारी तक पूरे राज्य प्रशासन को बदल दिया हो, और 50,000 अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई हो।

    (सौरभ सेन कोलकाता में रह रहे स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार है)

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