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    ऑपरेशन सिंदूर: कहानी एक ऐसे युद्ध की जिसने दिया अनचाहा नतीजा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 13, 2026

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर दावे तो यह हैं कि इसने एक नए सैन्य सिद्धांत की शुरुआत की, लेकिन हकीकत है कि इसने भारत की पारंपरिक युद्ध-कौशल में श्रेष्ठता की धारणा की सीमाओं को उजागर कर दिया।

    अशोक स्वैन

    Published: 12 May 2026, 7:19 PM

    ‘ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भी, मोदी सरकार इसे इस तरह पेश करती है कि आतंकवाद का कोई भी सिरा पाकिस्तान से जुड़ा होगा, तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा।  वह हमें यह विश्वास दिलाना चाहती है कि यह भारत का नया सैन्य सिद्धांत है। इस दावे में राजनीतिक शक्ति दिखती है।

    फिर भी, युद्धों का आकलन केवल उनके इरादों पर नहीं, बल्कि उनके बाद पैदा होने वाले शक्ति-संतुलन के आधार पर किया जाता है। इस पैमाने पर देखें, तो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक रणनीतिक सफलता से कहीं ज़्यादा एक महंगा और जोखिम भरा कदम लगता है, जिसने भारत की सैन्य और कूटनीतिक शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया। क्योंकि, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने दुनिया के सामने पाकिस्तान की हैसियत को फिर से बढ़ा दिया, और चीन के हथियारों का एक अप्रत्याशित प्रचार कर दिया।

    यह ऑपरेशन अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें कश्मीर में छब्बीस आम लोग मारे गए थे। भारत ने बिना देरी किए इस हमले के लिए पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादियों को दोषी ठहराया और 6-7 मई की रात को पूरे पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कई ठिकानों पर हमले किए।

    नई दिल्ली का मकसद आतंकी ढांचे को निशाना बनाना, तनाव को परमाणु सीमा से नीचे रखना और यह दिखाना था कि बड़े आतंकी हमलों के बाद पहले जो संयम बरता जाता था, वह अब खत्म हो चुका है। इस सीमित अर्थ में, इस हमले को काफी सुर्खियां मिलीं। इसने यह साबित कर दिया कि भारत परमाणु जोखिमों के बावजूद पाकिस्तान के भीतरी इलाकों में सैन्य बल प्रयोग करने को तैयार है। लेकिन, युद्ध का मैदान जल्द ही ‘सोच-समझकर दी गई सज़ा’ की तयशुदा पटकथा से परे हो गया।

    पाकिस्तान ने जवाबी सैन्य कार्रवाई की। लेकिन इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि वह राजनीतिक, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से खुद बचाने में कामयाब रहा। इस ऑपरेशन से पहले तक, भारत के पास न केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था और एक बड़ी सेना का दम था, बल्कि पारंपरिक श्रेष्ठता की एक गहरी जड़ें जमा चुकी धारणा भी थी। उस धारणा का खास महत्व था। इसने कूटनीति, प्रतिरोध, मीडिया के नैरेटिव और पाकिस्तान की अपनी कमज़ोरी की भावना को आकार दिया। लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में जो कुछ हुआ, उसने इस धारणा को छिन्न-भिन्न कर दिया।

    दावा किया गया कि पाकिस्तान ने भारत के दो, पांच या उससे ज़्यादा विमान मार गिराए थे—हालांकि यह बात अब भी विवाद का विषय बनी हुई है। लेकिन भारत के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और कई बाहरी अधिकारियों से मिली सीमित पुष्टि भी—कि चीन में बने पाकिस्तानी विमानों ने भारतीय जेट विमानों को (जिनमें कम से कम एक राफेल भी शामिल था) मार गिराया था—उसने रणनीतिक चर्चा का रुख बदलने के लिए काफ़ी थी। एक ऐसा देश, जिसे कमज़ोर माना जाता था, उसने यह साबित कर दिया कि वह अपने विरोधी को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है।

    यह ऐसा मुख्य सैन्य सबक है जिससे भारत को नजरंदाज नहीं करना चाहिए। पारंपरिक श्रेष्ठता महज़ एक नारा नहीं है। इसे सेंसर, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कमांड नेटवर्क, लड़ाकू विमानों की गुणवत्ता, पायलट प्रशिक्षण और सूचना अनुशासन—इन सभी क्षेत्रों में साबित करना होगा। हो सकता है कि संघर्ष के बाद के चरणों में भारत ने पाकिस्तानी हवाई अड्डों और सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया हो। यह भी संभव है कि शुरुआती नुकसान के बाद उसने अपनी रणनीति में बदलाव किया हो और लंबी दूरी के सटीक हथियारों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया हो।

    लेकिन आज के दौर के संघर्षों में, पहली तस्वीरें और शुरुआती दावे ही वैश्विक कहानी को आकार देते हैं। इस मामले में भारत की चुप्पी ने एक शून्य पैदा कर दिया। पाकिस्तान ने उसका फायदा उठाया। चीन ने उसे और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। दुनिया ने भारत के घोषित ‘सजा देने के लिए किए गए सटीक हमले’ पर नहीं, बल्कि इस संभावना पर ध्यान दिया कि चीनी प्लेटफॉर्म और पाकिस्तानी रणनीतियों ने भारत की वायु शक्ति को सफलतापूर्वक चुनौती दी है।

    पाकिस्तान को तो यूं भी अपने हर दावे को पूरी तरह से साबित करने की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस भारत की मानी हुई हवाई ताक़त पर शक पैदा करना था। इसलिए, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने कोई ऐसी एकतरफ़ा बढ़त साबित नहीं की, जैसा कि बीजेपी के समर्थक दावा करते हैं। इसने एक ऐसी गैर-बराबरी को उजागर कर दिया, जिस पर विवाद था। कुल मिलाकर, भारत अभी भी फ़ौजी तौर पर ज़्यादा ताक़तवर है, लेकिन पाकिस्तान ने यह दिखा दिया कि कागज़ों पर दिखने वाली ताक़त को नए हथियारों, बेहतर नेटवर्क, चीन के समर्थन, लंबी दूरी की मिसाइलों और सोच-समझकर बनाई गई तनाव बढ़ाने की रणनीति से कमज़ोर किया जा सकता है।

    कूटनीतिक नतीजे भी भारत के लिए कम असहज नहीं रहे हैं। अमेरिका यूं तो भारत के ज़्यादा करीब था, खाड़ी देश इस मामले में ज़्यादा व्यावहारिक थे, और इस्लामाबाद कर्ज़, राजनीतिक अस्थिरता और विद्रोह के बोझ तले दबा हुआ था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद, पाकिस्तान शक्तिशाली तो नहीं बना, लेकिन वह एक बार फिर उपयोगी ज़रूर बन गया।

    डोनाल्ड ट्रम्प ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने भारत-पाक के बीच सीज़फ़ायर कराया। सार्वजनिक रूप से इस संकट में खुद को शामिल किया, और पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को एक अहम मध्यस्थ के तौर पर तवज्जो दी। भारत के लिए, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि कश्मीर और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव द्विपक्षीय मामले हैं, यह एक कूटनीतिक झटका था। इस संकट का मतलब यह दिखाना था कि भारत की कार्रवाई ने बाहरी मध्यस्थता की बातचीत के लिए फिर से गुंजाइश बना दी है।

    आसिम मुनीर को इससे काफी फ़ायदा हुआ। संघर्ष से पहले घरेलू आलोचना से जूझ रही पाकिस्तान की सेना ने खुद को एक ऐसे रक्षक के तौर पर पेश किया, जिसने भारत का डटकर मुकाबला किया। जनरल का वैश्विक कद बढ़ा, खासकर ट्रंप के दौर की वॉशिंगटन की बेहद निजी कूटनीति में। पाकिस्तान ने खुद को मध्य-पूर्व और ईरान व खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा के मामले में एक अहम किरदार के तौर पर भी स्थापित किया। हो सकता है कि यह कोई टिकाऊ रणनीतिक वापसी न हो, लेकिन इसने भारत के इस दावे को कमज़ोर कर दिया कि पाकिस्तान अब कोई मायने नहीं रखता। मोदी पाकिस्तान को सज़ा देना चाहते थे। लेकिन उन्होंने रावलपिंडी को वह खोया हुआ ध्यान वापस पाने में मदद की।

    चीन का पहलू और भी ज़्यादा अहम है। पाकिस्तान लंबे समय से चीनी हथियारों पर निर्भर रहा है, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया तालमेल को और गहरा कर दिया है। चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम मदद दी और इस संकट का इस्तेमाल भारतीय सिस्टम के खिलाफ अपने हथियारों को परखने के लिए एक ‘लाइव लैबोरेटरी’ के तौर पर किया। बीजिंग के लिए, यह कम लागत वाला रणनीतिक अनुभव था। उसे भारत से सीधे तौर पर लड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वह भारत की प्रतिक्रियाओं को देख सका, चीनी प्लेटफॉर्म्स को टेस्ट कर सका, पश्चिमी विमानों का आकलन कर सका, और हिमालय या इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भविष्य में होने वाले किसी संभावित संघर्ष के लिए सबक सीख सका।

    चीन के रक्षा उद्योग को इसका तुरंत फायदा मिला। जे-10सी वैश्विक चर्चा में एक बिना परखे चीनी लड़ाकू विमान के तौर पर नहीं, बल्कि भारत और उसके फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों के ख़िलाफ़ युद्ध में मिली सफलता से जुड़े विमान के तौर पर सामने आया। एवीआईसी चेंगदू की कमाई और शेयरों की कीमतें में तेज उछाल आया, और पश्चिमी प्रणालियों के सस्ते और भरोसेमंद विकल्प तलाश रहे देशों के बीच चीनी विमानों में दिलचस्पी बढ़ गई।

    भले ही पाकिस्तान के दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हों, लेकिन धारणा ने अपना काम कर दिया। रक्षा बाज़ार सिर्फ़ प्रदर्शन से ही नहीं, बल्कि नैरेटिव से भी आकार लेते हैं। एक भी विवादित लड़ाई बिक्री का ज़रिया बन सकती है। भारत ने एक ऐसा ऑपरेशन शुरू करके, जिसने पाकिस्तान और चीन को अपने सिस्टम दिखाने का मौका दिया, अनजाने में ही उस सैन्य इकोसिस्टम की प्रतिष्ठा बढ़ा दी, जिसे उसे रोकने की कोशिश करनी चाहिए थी।

    इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को पहलगाम की घटना को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए था। ऐसे नृशंस नरसंहार के बाद कोई भी सरकार मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती। सवाल यह नहीं है कि क्या भारत को जवाबी कार्रवाई का अधिकार था। सवाल यह है कि क्या मोदी द्वारा चुनी गई, अत्यधिक राजनीतिक रंग में रंगी हुई जवाबी कार्रवाई ने भारत की सुरक्षा को बेहतर बनाया।

    सजा देने के लिए किया गया ऐसा हमला, जिसके कारण विमानों का नुकसान हो, पाकिस्तान के सैन्य नैरेटिव को ताकत मिले, ट्रंप मध्यस्थता के दावों में शामिल हो जाएं, चीन-पाकिस्तान सहयोग और गहरा हो, और चीन के लड़ाकू विमानों का भंडार बढ़ जाए—उसे ‘पूरी तरह सफल’ नहीं कहा जा सकता। यह, दरअसल, ‘रणनीतिक कार्रवाई’ और उसके ‘रणनीतिक परिणाम’ के बीच के अंतर को लेकर एक चेतावनी है।

    सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारत और पाकिस्तान दोनों को अब यह लगने लगा है कि तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। भारत ने एक नई सामान्य स्थिति की घोषणा की है जिसमें आतंकवाद को युद्ध की कार्रवाई के रूप में देखा जाएगा। पाकिस्तान का मानना ​​है कि त्वरित जवाबी कार्रवाई से संकट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल सकता है और हस्तक्षेप के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। दोनों पक्षों को यह पता चल चुका है कि परमाणु खतरे की आड़ में ड्रोन, मिसाइलें, दूर तक मार करने वाले हथियार और सूचना युद्ध का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे अगले टकराव की संभावना कम हो जाती है और घरेलू विभाजनकारी राष्ट्रवाद में फंसे नेताओं के लिए निर्णय लेने का समय और कम हो जाता है।

    इसलिए, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को एक विजयी सिद्धांत के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘स्ट्रेस टेस्ट’ के रूप में याद किया जाना चाहिए, जिसे भारत पूरी तरह से नियंत्रित नहीं कर पाया। इसने खुफिया जानकारी, हवाई युद्ध की तैयारी, रणनीतिक संचार और कूटनीतिक पूर्वानुमान में मौजूद गंभीर कमियों को उजागर किया। इसने यह दिखाया कि चीन कोई दूर की तीसरी पार्टी नहीं है, बल्कि एक सक्रिय ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ (शक्ति बढ़ाने वाला कारक) है। इसने यह भी दिखाया कि ट्रंप के नेतृत्व में वॉशिंगटन से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पाकिस्तान की उपयोगिता के मुकाबले भारत की संवेदनशीलता को ज़्यादा प्राथमिकता देगा। सबसे बढ़कर, इसने यह साबित किया कि केवल दिखावटी सख्ती अपनाने से रणनीतिक तौर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है।

    एक साल बाद भी युद्धविराम कायम है, लेकिन बाकी सब कुछ स्थिर नहीं है। सिंधु जल संधि निलंबित है, कूटनीति ठप है, और दोनों पक्षों की जनमानस में सैन्यवाद का भाव और भी प्रबल हो गया है। मोदी ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत को एक बेलगाम क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। लेकिन इसके बजाय, इसने एक कड़वी सच्चाई उजागर कर दी। शक्ति का माप पहले हमला करने के साहस से नहीं होता, बल्कि हमले के बाद होने वाली घटनाओं को आकार देने की क्षमता से होता है। इस मामले में, मोदी के इस दुस्साहस ने पाकिस्तान को एक नैरेटिव, चीन को एक बाज़ार, ट्रंप को एक मंच और दक्षिण एशिया को एक अधिक खतरनाक भविष्य दे दिया।

    (अशोक स्वैन स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष अनुसंधान के प्रोफेसर हैं।)

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