भारत के लिए उन्होंने जो काम किए उसके सम्मोहन से खुद मोदी और उनके समर्थक अगर मुक्त हो सकें तो उन्हें भविष्य पर नजर डालनी चाहिए कि आगे उनके लिए चुनौतियां क्या-क्या हैं.
इस सप्ताह खबरों में यह चर्चा छाई रही कि नरेंद्र मोदी ने सबसे लंबे समय तक भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया. मोदी और नेहरू के बीच खूब तुलना की जा रही है कि देश के लिए किसने ज्यादा काम किया. लेकिन बेहतर यह होगा कि अब तक जो कुछ किया गया है, उसकी बजाय हम भविष्य की ओर देखें.
क्योंकि मोदी का काम अभी खत्म नहीं हुआ है. उनके इस कार्यकाल के अभी तीन साल बाकी हैं और वे 2029 में भी उम्मीदवार रहेंगे. यह पक्की बात है. और क्या पता, 2034 में भी रहें!
आखिर, डॉनल्ड ट्रंप कह चुके हैं कि वे तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनेंगे, बावजूद इसके कि अमेरिकी संविधान ने किसी के लिए दो बार राष्ट्रपति बनने की सीमा ही तय कर रखी है, और बावजूद इसके कि इस सप्ताह वे 80 साल के हो जाएंगे. यही नहीं, पिछले साल 3 सितंबर को द्वितीय विश्वयुद्ध के 80 साल पूरे होने पर बीजिंग में आयोजित मिलिटरी परेड के आयोजन के दौरान एक संवेदनशील माइक ने व्लादिमीर पुतिन को शी जिनपिंग से यह कहते हुए कैद कर लिया था कि आज मेडिकल साइंस इतनी तरक्की कर चुका है कि कोई चाहे तो 150 साल तक राज कर सकता है.
बहरहाल, हम विषय से न भटकें. यह मानना बिलकुल गलत नहीं होगा कि मोदी अभी इतने समय तक तो बने रहेंगे ही कि हम भविष्य की चुनौतियों पर विचार कर सकें. मैं सबसे बड़ी पांच चुनौतियों की बात करूंगा.
जाहिर है, पहली चुनौती यह है कि वे अतीत से पल्ला झाड़ें. नेहरू, इंदिरा, या किसी और से तुलनाएं बंद हों. नेहरू का जब निधन हुआ था, मोदी 14 साल के थे और मैं सात साल का भी नहीं हुआ था. इसलिए, मोदी को उनके अपने दौर के संदर्भ आंका जाना चाहिए, न कि उनके दौर से बहुत पहले के भारत के दौर के संदर्भ में.
जहां तक सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने की बात है, तुलना इस मामले में की जानी चाहिए कि उन्होंने अपने पहले 12 साल में क्या किया. यह कसौटी ही भारत के लिए और खुद उनके लिए भी काम की होगी. अगर वे कोई स्थायी विरासत बनाना चाहते हैं, तो वह यह नहीं हो सकता कि भारत के राजनीतिक इतिहास में वे सबसे बड़े ‘नेहरू विरोधी’ के रूप में दर्ज हो जाएं. उस विरासत के साथ खुद उनका नाम जुड़ा होना चाहिए.
इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले किसी प्रधानमंत्री की तरह मोदी को भी संकटों का सामना करना पड़ा है. तीन संकट वैश्विक थे: कोविड, यूक्रेन, और पश्चिम एशिया में जंग. उनके लिए दूसरी चुनौती तीसरी चुनौती से पैदा होती है, वह यह कि इतना शक्तिशाली नेता ट्रंप के बाकी बचे कार्यकाल से किस तरह निबटता है.
अब तक वे उनसे समभाव से निबटते रहे हैं. मोदी यूरोप, और अमेरिका के दूसरे मित्र देशों से संकेत लेते हुए शांत रहने और किसी उकसावे में न आने की नीति अपनाते रहे हैं.
आगे, लेन-देन वाला पहलू प्रमुख होता जाएगा. भारत इसे संभाल सकता है. पश्चिम एशिया में जंग ने साफ कर दिया है कि भारत ने एक पक्ष को चुन लिया है, वह है: इजरायल, अमेरिका, और यूएई. इसे वह खुलकर कभी नहीं कहेगा लेकिन उसके कदम यह जाहिर कर देते हैं. अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौता कभी भी हो सकता है, व्यापारिक रिश्ते और व्यापार भारत के कॉर्पोरेट नेताओं के सक्रिय समर्थन से जारी रहेंगे. आम तौर पर आप यह मान कर चल सकते हैं कि ट्रंप चाहे जितना उकसाएं, मोदी के आलोचक चाहे जितना तंज़ कसें, मोदी उकसावे में नहीं आने वाले. लेकिन ज्यादा संभावना यह है कि बड़ा संकट कभी-न-कभी उभर सकता है.
आखिर पाकिस्तानियों ने ट्रंप के लिए इतना कुछ किया है कि वे केवल अपने फील्ड मार्शल की तारीफों से संतुष्ट नहीं होने वाले हैं. वे इनाम के रूप में यह चाहते हैं कि अमेरिका कश्मीर मसले का जिक्र करे—अस्पष्ट रूप से ही सही, ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट के रूप में ही सही. फील्ड मार्शल की अर्थव्यवस्था भारी संकट में है और उनके पश्चिमी मोर्चे पर आग लगी हुई है. उन्हें इस सबसे छुटकारा पाने की जरूरत है. मुनीर को यह छुटकारा कश्मीर मसले के फिर से उभार में, और घड़ी की सुई को वापस 5 अगस्त 2019 पर ले जाने में नजर आती है. मोदी इस चुनौती से कैसे निबटेंगे? उससे निबटने का समय आ गया है. इसके लिए करीब ढाई वर्षों तक रणनीतिक धैर्य बनाए रखना होगा.
इस धैर्य को उचित ठहराने, और इसे बनाए रखने के लिए भी आपको सामरिक (सैन्य) ताकत चाहिए. मोदी अगर अपने पिछले 12 वर्षों पर नजर डालें, और थोड़े समय के लिए नेहरू और 1962 को भूल जाएं, तो उन्हें मानना पड़ेगा कि उन्होंने डिफेंस पर पर्याप्त खर्च नहीं किया है. जो पैसा उपलब्ध था उसे भी अधिग्रहण वाली पाइपलाइन में लगी जिद्दी जंग के कारण पूरा खर्च नहीं किया जा सका. कई जंग अभी भी मौजूद हैं.
कई सुधार लागू होने वाले हैं, खासकर निजी क्षेत्र के लिए दरवाजा खोलने वाले, लेकिन उनके नतीजे दिखने में समय लगेगा. तब तक तत्काल कार्रवाई करने की तैयारी दिखनी चाहिए क्योंकि मुनीर कभी भी अपने दैत्यों को हमलावर कर सकते हैं. इसके लिए छह महीने, दो साल, और पांच साल की योजनाएं चाहिए. कुछ सुधार सेनाओं के बीच प्रतिद्वंद्विता में उलझे हैं, जो अक्सर ट्वीटर पर लड़ी जाती दिखती है. हमने खुद को विश्लेषण से पैदा होने वाले लकवे में डाल लिया तो यह काफी दुखद होगा.
अर्थव्यवस्था ही सभी रणनीतिक और सामरिक ताकत का आधार स्तंभ है. भारत लंबे समय से इस सुकून में डूबा रहा है कि वह तो सबसे तेजी से वृद्धि कर रही बड़ी अर्थव्यवस्था है. इतनी बड़ी आबादी वाला जो देश प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 144वें से लेकर 149वें स्थान के बीच झूल रहा हो, उसके लिए यही काफी नहीं है. भारत को इससे बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए.
प्रधानमंत्री को ‘न्यूनतम सरकार’ का अपना वादा और महामारी के दौरान दिए गए अपने उस बयान को याद करना चाहिए कि ‘बिजनेस में रहना सरकार का बिजनेस नहीं है’, कि सरकार कुछ रणनीतिक मामलों को छोड़ सभी क्षेत्रों से बाहर हो जाएगी. लेकिन बीते वर्षों में इसका उलटा ही होता रहा है. कई नए पीएसयू (सरकारी उपक्रम) बनाए जा चुके हैं, और सबसे आसान ‘IDBI की बिक्री’ भी अटकी पड़ी है.
जब भी यह सरकार संकट में पड़ी है, उसने अपने गलत कदमों को वापस लेने की क्षमता दिखाई है. यह क्षमता कई ‘एफटीए’ (मुक्त व्यापार समझौतों), बोंडों में विदेशी निवेश पर टैक्स वापस लेने, और अब एक नयी, उदार ‘बीआइटी’ (द्विपक्षीय निवेश संधि) की (पिछले सभी संधियों के रद्द होने के बाद) चर्चाओं से उजागर होती है.
कोई सरकार संकट से सबक लेकर अपनी नीतियों को इतने नाटकीय रूप से बदलने की तैयारी दिखाती है तो यह अच्छा संकेत है. लेकिन भारत को ऐसे कई कदमों की जरूरत है. मसलन खनन, हाइड्रोकार्बन की खोज, शहरीकरण, छतों पर सोलर पैनल जैसे सरल मामलों में. इस मामले में तो पाकिस्तान भी हमसे आगे है, यह बात उस ‘पीएम सूर्य घर योजना’ को बढ़ावा देने के लिए काफी होनी चाहिए, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने फरवरी 2024 में की थी. हिंदुत्व के साथ मिलकर यह वृद्धिदर (जिसे हम आर्थिक वृद्धि की हिंदुत्व दर कह सकते हैं) फिर भी आपको चुनाव जिता सकती है. लेकिन यह भारत द्वारा क्षमता से कमतर प्रदर्शन होगा. इसलिए, चौथी चुनौती सरकार को बिजनेस के क्षेत्र से वास्तव में अलग करने की है.
इस सूची में पांचवीं और अंतिम चुनौती राजनीतिक ही होनी चाहिए. मोदी-शाह की जोड़ी ने लोकसभा में 240 सीटों के अल्पमत के साथ शुरू करके उल्लेखनीय तेजी दिखाई है और भारत को लगभग एक-दलीय व्यवस्था में तब्दील करने में सफलता हासिल की है. लेकिन राजनीति में स्थिरता नहीं रहती.
यह अधिकांश ताकत नये सहयोगियों के कंधों की सवारी करके या कई छोटी पार्टियों में टूट-फूट पैदा करके हासिल की गई है. ऐसा भी कभी हो सकता है कि किसी सहयोगी का धैर्य जवाब दे जाए, राज्यों की राजधानियों में जिन ‘प्रतिभाओं’ को गद्दी सौंपी गई है उनके कारण कोई मुख्यमंत्री कोई बड़ा संकट खड़ा कर दे. और, भाजपा में अभी ‘उत्तराधिकारी’ शब्द का उच्चारण कोई भले न करे लेकिन 2029 करीब आते ही पार्टी के अंदर एक तरह के ‘प्राइमरी’ (पूर्व चयन) की आवाज उठ सकती है. 2034 में पचास से साठ के बीच की उम्र के कम-से-कम चार ऐसे नेता होंगे जो उस समय दावेदार हो सकते हैं. विपक्ष की आज जो हालत है, उसके कारण मोदी के लिए राजनीतिक चुनौती भाजपा के अंदर से ही उभर सकती है. चुनौती उनकी सत्ता के लिए नहीं होगी. इसकी हिम्मत कोई नहीं करेगा. लेकिन कुछ नेता अपने भविष्य को लेकर अधीर हो सकते हैं.
मोदी के सामने भविष्य के लिए ये पांच सबसे बड़ी चुनौतियां हैं. याद रहे, इनकी शुरुआत अतीत को भूलने के साथ हुई है.

