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    सैको की शानदार मुजफ्फरनगर दंगा कॉमिक पर प्रकाशक की रोक भारत की आजादी पर एक कड़वा मजाक है

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 27, 2026

    सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से बारीक है लेकिन कुछ मामलों में वे चूक गए हैं. लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें जिस पर सैको ने ज़ोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं.

    माल्टा में जन्मे अमेरिकी कार्टूनिस्ट जो सैको ने अपनी अनूठी ‘कॉमिक्स जर्नलिज्म’ के बूते दुनिया भर में तो लोकप्रियता हासिल की ही है, अपने भारी-भरकम बायो-डाटा में उन्होंने अपनी सबसे ताजा किताब ‘द वंस ऐंड फ्यूचर रायट’ के रूप में एक और उपलब्धि जोड़ ली है. लेकिन पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने इस किताब को वितरण से रोक लिया है.

    ढुलमुल रवैया अपनाने वाले प्रकाशक की आलोचना हुई. लेकिन, आखिरकार ज्यादा दोष बदनाम हिंदुत्ववादी सत्ता के माथे मढ़ा गया, जिसकी नजर के सामने कोई भी प्रकाशक इस तरह की किताब प्रकाशित करने से डरेगा. आखिर, यह किताब 2002 के गुजरात दंगे के बाद हुए सबसे बड़े मुजफ्फरनगर दंगे के बारे में है. यह किताब भयानक पूर्वानुमान भी लगाती है कि हिंदुत्ववाद भारत को कहां पहुंचा सकता है.

    आइए, पहले तथ्यों पर नजर डाल लें. भारत में किताबों पर कभी-कभार प्रतिबंध लगाने का दुखद इतिहास रहा है. लेकिन सैको की किताब पर सरकार ने प्रतिबंध नहीं लगाया है. प्रकाशक ने कमजोर जिगर का प्रदर्शन करते हुए शायद इस उम्मीद में एहतियातन कदम उठाया कि विवाद हुआ तो लोकप्रिय, खासकर ‘लिटफ़ेस्ट’ वाले उदारवादी समूह की राय में दोष अंततः हिंदुत्ववादी सत्ता तंत्र के माथे मढ़ा जाएगा. पेंगुइन रैंडम हाउस ने किताब को रोककर कुछ संशोधन करने के सुझाव देते हुए पांच पेज का एक नोट भेजा था, जिसे सैको ने खारिज कर दिया. अब कई दूसरे भारतीय प्रकाशक सैको से संपर्क करने की कोशिश में जुटे हैं. जैसा कि सैको ने ‘दिप्रिंट’ की हिमांशी अग्रवाल को बताया, वे चाहते हैं कि यह किताब भारत में ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचे.

    ‘सरकारी सेंसरशिप’ वाला झूठ जबकि उजागर हो चुका है, हम उनकी 144 पेज की इस किताब पर नजर डाल सकते हैं. कॉमिक्स पत्रकारिता के उस्ताद सैको ने अपने शानदार स्केच से एक जटिल कहानी कह दी है. पाठ केवल ‘ब्लर्ब्स’ में दर्ज है, जिसे पढ़ने में दो घंटे से ज्यादा नहीं लगेंगे, बशर्ते आप उनके रेखाचित्रों से सम्मोहित न हो जाएं और चित्रों तथा चेहरों, यहां तक कि पलटे हुए ट्रैक्टर के जरिए कही गई कहानी में खो न जाएं. उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती.

    किताब पर रोक नहीं लगाई गई है, और कोई भी कानून किसी भी किताब को पढ़ने से नहीं रोकता. हमारी पीढ़ी ने ‘लोलिता’ और ‘लेडी चैटरलीज़ लवर’ जैसे उपन्यास अपने साइंस प्रैक्टिकल के बड़े आकार के फोल्डरों में छिपाकर पढ़े थे, और सलमान रश्दी की किताब ‘सटैनिक वर्सेज़’ मैं पूरा इसलिए नहीं पढ़ पाया क्योंकि उनके जादुई यथार्थवाद को समझने की क्षमता मुझमें नहीं है. यह मैंने उनके सामने कबूल भी किया, जब मैं 2013 में अपने ‘वॉक दि टॉक’ कार्यक्रम में उनका इंटरव्यू ले रहा था. उनका जवाब था: “आप ही अकेले नहीं हैं, लेकिन आपने कम-से-कम ईमानदारी तो बरती.” और हम दोनों हंस पड़े थे.

    मैं सैको का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे ‘द वंस ऐंड फ्यूचर रायट’ की डिजिटल कॉपी उपलब्ध करवाई. इसे सम्मोहित होकर पढ़ते हुए मैं कथा कहने की उनकी अद्वितीय शैली पर मुग्ध हूं. मुझे प्रकाशक की बहानेबाजी का कोई मतलब नहीं समझ में आया.

    सैको ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे की जो कहानी कही है वह सीधी, मुख्यतः एक रेखा में चलती है, तथ्यपूर्ण है और भारतीय पत्रकारिता में सैकड़ों नहीं तो कई बार कही जा चुकी है, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में भी, जब मैं वहां था. किताब में कोई भी आश्चर्यजनक बात नहीं कही गई है, कोई नया खुलासा नहीं किया गया है और न बढ़ाचढ़ाकर कुछ कहा गया है. सैको ने तंज़ कसते हुए, भारतीय संदर्भ के मद्देनजर दंगे को ‘तुच्छ’ या ‘छोटा’ ही बताया है.

    आखिर सैको ने इस पर एक पूरी किताब क्यों लिखी है, जबकि बोस्निया और गाज़ा में जनसंहार और कत्ल-ए-आम पर लिखी कृतियां उन्हें खूब प्रसिद्धि और पुरस्कार दिला चुकी हैं? जिस दंगे को ‘तुच्छ’ बता रहे हैं, जिसमें 42 मुसलमान और 20 हिंदू समेत कुल 62 लोग मारे गए उसमें उनकी इतनी दिलचस्पी क्यों जगी? नयी दिल्ली से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर दंगे में 62 लोगों का मारा जाना बेशक कोई छोटी बात नहीं है. लेकिन आप चाहें या न चाहें, सांप्रदायिक दंगों के आकार का भी एक पैमाना बन गया है.

    सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से बारीक है लेकिन कहा जा सकता है कि कुछ मामलों में वे चूक गए हैं. उदाहरण के लिए, उनकी यह समझ कि बंटवारे के दौरान हुई भारी मार-काट के बाद भारत में सांप्रदायिक दंगे दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस बाद ही हुए.

    गुजरात में ही दंगों का 1992 से पहले का भी इतिहास रहा है, खासकर 1969 में अहमदाबाद दंगे में 512 लोग मारे गए थे. बड़े आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं. सांप्रदायिक हिंसा पर शोध वार्ष्णेय-विलकिंसन डाटासेट पर आधारित रहे हैं. यह डाटासेट ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और ‘दिप्रिंट’ के स्तंभकार आशुतोष वार्ष्णेय और येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीवेन विलकिंसन के नाम पर स्थापित है. इसमें भारत में 1950 से 1995 के बीच हुए 1,194 उल्लेखनीय सांप्रदायिक दंगों के आंकड़े दर्ज हैं.

    इनमें से 72 फीसदी यानी 871 दंगे नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी की सरकारों के कार्यकाल में हुए. भारत में सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला कोई बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद नहीं शुरू हुआ, विडंबना यह है कि सैको ने इस तर्क को मान लिया. सांप्रदायिक दंगों के रूप में हमारी राष्ट्रीय शर्म के बारे में और ज्यादा जानना है तो ‘पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर’ की वेबसाइट पर ‘अ फ़ैक्टशीट ऑन कम्यूनल रायट्स’ को भी देखें.

    लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें जिस पर सैको ने ज़ोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं, लगभग नेतृत्व विहीन और शुरू में राजनीति से मुक्त भीड़ हावी हो जाती है. मौके का फायदा उठाकर सियासतदां और सिद्धांतकार भी कूद पड़ते हैं. सैको बताते हैं कि मुजफ्फरनगर में यही हुआ. वे यह भी याद दिलाते हैं कि उस समय कमान किसके हाथ में थी. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में उनके पिता मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार थी और देश की कमान यूपीए की सरकार के हाथ में थी, दोनों ‘सेकुलर’ ताक़तें! बेशक इसके बाद ध्रुवीकरण ने भाजपा को आगे बढ़ने में मदद दी.

    बाबरी विध्वंस (1992) और गुजरात दंगों (2002) के बाद सार्वजनिक बहसें, खासकर पत्रकारिता जिस कदर ध्रुवीकृत हो गई है उसके मद्देनजर कभी-कभी तीखी विदेशी नजर आपको ज्यादा साफ तस्वीर दिखा देती है. सैको दिखाते हैं कि छिटपुट घटनाओं को किस तरह हल्के से लिया गया, जैसे : एक मुस्लिम लड़की का बलात्कार और हत्या की कोशिश, जिसे पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया; एक हिंदू लड़की को परेशान करने के शक में एक मुस्लिम लड़के की हत्या और बदला लेने के लिए हिंदू समूह के दो चचेरे भाइयों की हत्या; हिंदुओं (जाटों) के एक जुलूस पर मुस्लिम भीड़ का हमला; ऐसी सभी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया. इसके पीछे या तो स्थानीय पुलिस की मिलीभगत थी या राजनीतिक दखलअंदाजी की गई. वे इन मुठभेड़ों को एकतरफा नहीं बताते. लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि जाटों (हिंदू नहीं, जाट का नाम लेते हैं और फुटनोट में बताते हैं कि जाट हिंदू हैं) ने मुस्लिम बहुल गांवों को घेर रखा है और भूमिहीन मुस्लिम मजदूरों से बदला सधाते हैं.

    सैको बताते हैं कि दो जाट लड़कों की हत्या के मामले में एसएसपी मंजिल सैनी ने खुद छापे मारे. सैको ने यूपी पुलिस के ‘सिंहम’ के रूप में मशहूर सैनी को अपने रेखाचित्र में दमदार कदम बढ़ाते हुए चित्रित किया है. सैको ने लिखा है कि पुलिस ने “जाट लड़कों की हत्या के मामले में कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया, जिनकी कमीजों पर खून के दाग थे”. हिरासत में बंद उन सभी को अगली सुबह रिहा कर दिया गया, और एसएसपी तथा जिला मजिस्ट्रेट (सुरेंद्र सिंह) का तबादला भी कर दिया गया”. सैको ने लिखा है कि यूपी के जाटों को यह “मुसलमानों को संतुष्ट करने की एसएसपी की कुटिल कोशिश ही लगी होगी”.

    भाजपा इससे नाराज नहीं, खुश ही होगी क्योंकि वह ऐसे दावे करती रही है और इसे छद्म धर्मनिरपेक्षता कहती रही है. लेकिन सैको ने ‘दि फ्यूचर रायट’ (भविष्य का दंगा) शीर्षक से 17 पेज में जो निष्कर्ष दिया है उसे वह नहीं पसंद करेगी. उन्होंने लिखा है कि “फिरकावाराना हिंसा ने मोदी के राजनीतिक केरियर के पहियों में ग्रीज़ डाला”, कि दंगों ने बीजेपी को उस राज्य में 2017 और 2022 के चुनावों को जीतने में मदद की जिसमें “मोदी ने एक हिंदू मठाधीश योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया, जो गाजियाबाद के स्वामी यति नरसिंहानंद जितने ही कट्टरपंथी हैं.”

    अब अपने दिल पर हाथ रखकर गंभीरता से सोचिए, या गूगल पर ही खोजिए. भारत में होने वाली बहसों में इतनी बेबाकी से इस तरह की बातें क्या आपने कभी सुनी हैं? कोई भी सरकार ऐसी बातें कहने वाली किताब पर प्रतिबंध नहीं लगाएगी. ऐसी बातें पिछले एक दशक में प्रकाशित दो दर्जन किताबों में पाई जा सकती हैं, जिनमें पेंगुइन रेंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशित किताबें भी होंगी. अब उस गलत और गैरकानूनी नक्शे की बात करें.

    जिस क्षेत्र में सीमारेखाओं का पूरी तरह निर्धारण नहीं हुआ हो, ऐतिहासिक और भौगोलिक कारणों से दावे किए जाते रहे हों और नक्शों को लेकर काफी संवेदनशीलता बरती जाती हो वहां इस तरह की चुनौतियां उभरती ही रहेंगी. प्रकाशक का यह कहना सही है कि सैको की किताब में जो नक्शा दिया गया है उसे प्रकाशित करना भारतीय कानून का गंभीर तथा आपराधिक उल्लंघन होगा. लेकिन हर कोई ऐसे मामलों से निपटना जानता है. विदेशी प्रकाशनों में ऐसे नक्शों पर मुहर लगाई जाती है कि यह गलत है, या उन्हें हटा ही दिया जाता है. कोई भी भारतीय संपादक ऐसे मामले में लापरवाही नहीं बरत सकता. लेकिन, जैसा कि मैंने कहा, इस मसले को आसानी से निपटाया जा सकता है. इसे बहाना बनाकर किसी किताब को न वितरित करना प्रकाशन उद्योग और भारत में स्वाधीनताओं (चाहे उन पर कितना दबाव क्यों न हो) के साथ एक क्रूर मज़ाक ही होगा.

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