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    IPS की आत्महत्या से लेकर CJI गवई पर जूता फेंकने तक—BJP के लिए फिर उभरी दलित असंतोष की दरारें

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldOctober 24, 2025

    इन घटनाओं और उनके निपटारे के तौर-तरीकों ने एक बार फिर ध्यान खींचा है बीजेपी की उस कमज़ोरी पर, जो दलित चिंताओं को समझने और उन्हें हिंदुत्व परिवार में पूरी तरह समाहित करने की दिशा में दिखती है.

    दलित युवक हरिओम वाल्मीकि की मौत के विरोध में लखनऊ में प्रदर्शन. दो अक्टूबर को ग्रामीणों ने उन्हें चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला था | एएनआई फाइल फोटो

    नई दिल्ली: पिछले एक महीने में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शासित राज्यों—हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से दलितों के खिलाफ कथित अत्याचारों के कई मामले सामने आए हैं. इनमें अपमान, भेदभाव और उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या तक की घटनाएं शामिल हैं.

    इन घटनाओं और सरकारों की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर इस बात पर रोशनी डाली है कि सत्ता पक्ष दलितों और पिछड़े समुदायों की चिंताओं को सही ढंग से संबोधित करने में नाकाम क्यों दिखता है, खासकर ऐसे समय में जब बिहार चुनाव नज़दीक हैं और हिंदुत्व परिवार में दलितों की भूमिका को लेकर सवाल फिर उठने लगे हैं.

    दिल्ली में दलित समुदाय से आने वाले भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई पर जूता फेंकना, हरियाणा में एक आईपीएस अधिकारी की जातीय भेदभाव से आत्महत्या, उत्तर प्रदेश में चोरी के शक में दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या और मध्य प्रदेश में एक दलित युवक पर पेशाब करने की घटना—ये चार घटनाएं चार बीजेपी शासित राज्यों से आई हैं. इन सभी में सरकारों की प्रतिक्रिया ढीली और असंवेदनशील मानी जा रही है.

    सीजेआई पर जूता फेंकने की घटना को कुछ हिंदुत्व समर्थकों ने जायज़ ठहराया; हरियाणा में सरकार पर आरोप लगे कि उसने आत्महत्या के मामले में आरोपी डीजीपी के खिलाफ तुरंत कार्रवाई नहीं की; यूपी में पुलिस के सामने ही एक दलित ‘चोर’ की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी; और एमपी में अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई, जबकि दलित युवक पर अवैध खनन का विरोध करने के कारण पेशाब किया गया और उसे मामला आगे न बढ़ाने के लिए दबाव डाला गया.

    जूता फेंकने की इस घटना से कुछ ही दिन पहले आरएसएस—जो बीजेपी की वैचारिक रीढ़ है ने नागपुर में विजयादशमी कार्यक्रम में सीजेआई गवई की मां को आमंत्रित किया था. हालांकि, उन्होंने आने से मना कर दिया, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कार्यक्रम में शामिल होकर आरएसएस के इस प्रयास को समर्थन दिया कि दलितों को हिंदुत्व की व्यापक पहचान में जोड़ा जाए.

    अपने वार्षिक भाषण में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने देश की विविधता को खंडित करने वाली ताकतों से सावधान रहने और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात कही थी.

    लेकिन भागवत के इस भाषण के एक हफ्ते के भीतर ही हिंदुत्व एकता की दरारें उजागर हो गईं, जब अधिवक्ता राकेश किशोर ने खुलेआम सीजेआई पर जूता फेंकने के अपने कदम का बचाव किया. कई बीजेपी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर किशोर के पक्ष में पोस्ट करते हुए सीजेआई पर आरोप लगाया कि उन्होंने 16 सितंबर को ‘सनातन धर्म का अपमान’ किया था.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही इस घटना की निंदा की, लेकिन सोशल मीडिया पर कई हिंदुत्व समर्थकों का रवैया यह दिखा रहा था कि दलित नेतृत्व को लेकर असहजता अब भी बनी हुई है.

    उन लोगों में से एक यूट्यूबर अजीत भारती भी थे, जिन पर आरोप लगा कि उन्होंने लोगों को सीजेआई के खिलाफ भड़काया. नोएडा पुलिस ने उनसे पूछताछ की और बाद में रिहा कर दिया. कई लोगों ने इसे न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर अपमानजनक बयान देने वालों पर सरकार की “नरमी” के तौर पर देखा.

    दिप्रिंट से बात करते हुए लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शशिकांत पांडेय ने कहा, “हाथरस कांड की यादें आज भी ताज़ा हैं, जब एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप हुआ और प्रशासन ने परिवार की अनुमति के बिना उसका अंतिम संस्कार कर दिया. यह दर्शाता है कि आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के सात दशक बाद भी समाज और सत्ता का नजरिया दलितों के प्रति खास नहीं बदला है.”

    उन्होंने यूपी में दलित युवक हरिओम वाल्मीकि की हत्या का ज़िक्र करते हुए कहा, “यह मामला बताता है कि आरएसएस का व्यापक हिंदुत्व एकीकरण अभियान अभी अधूरा है. समाज में ऊंची जातियों का वर्चस्व अब भी कायम है और वे दलितों के साथ बराबरी का रिश्ता नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं.”

    राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2023 में अनुसूचित जातियों (एससी) के खिलाफ अपराध के 57,789 मामले दर्ज हुए, जिनमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा सबसे ज्यादा 15,130 मामले रहा. इसके बाद राजस्थान में 8,449, मध्य प्रदेश में 8,232, और बिहार में 7,064 मामले दर्ज किए गए.

    ‘हम बाबा के लोग हैं’

    7 अक्टूबर को सीजेआई पर हुए हमले के एक दिन बाद, बीजेपी शासित हरियाणा में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. उन्होंने आठ पेज के नोट में अपनी जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव और अपमान के मामले दर्ज किए.

    आईपीएस अधिकारी की मौत के एक हफ्ते बाद, दलित संगठनों और विपक्षी दलों के दबाव और अधिकारी की पत्नी द्वारा नोट में नामित डीजीपी की गिरफ्तारी की मांग के बीच, डीजीपी शत्रुजीत सिंह कपूर को छुट्टी पर भेजा गया. इसे न्याय की वास्तविक इच्छा के बिना की गई प्रतिक्रिया माना गया.

    हरियाणा के एक बीजेपी नेता ने दिप्रिंट को बताया: “(हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह) सैनी केंद्रीय नेताओं की मंजूरी का इंतज़ार कर रहे थे और बड़े परिणामों की उम्मीद नहीं कर रहे थे; इसलिए फैसले धीरे-धीरे ले रहे थे, लेकिन जब केंद्र ने उन्हें बिहार चुनावों में संभावित गड़बड़ी के चलते तुरंत कार्रवाई करने को कहा, तो केंद्रीय मंत्री के करीबी डीजीपी को छुट्टी पर भेज दिया गया.”

    इस नेता ने आगे कहा: “बीजेपी ने लोकसभा में दो एससी आरक्षित सीटें—अंबाला और सिरसा—खो दी थीं, इसलिए यह ज़रूरी था कि दलित अधिकारियों के मामले में कार्रवाई दिखे, क्योंकि शुरुआती दिन तो पार्टी ने बयानबाजी में खो दिए थे.”

    उत्तर प्रदेश में, 38-वर्षीय दलित युवक हरिओम वाल्मीकि को 2 अक्टूबर को गांव वालों ने “ड्रोन चोर” होने के शक में पीट-पीटकर मार डाला, जबकि पुलिस कथित रूप से तमाशा देखती रही.

    पीड़ित के परिवार से मिलने के बाद यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा: “हरिओम वाल्मीकि अपनी पत्नी से मिलने जा रहे थे, तभी पुलिस के सामने उन्हें पीटा गया, जो हस्तक्षेप कर सकती थी. जब उन्होंने राहुल गांधी का नाम लिया, हमलावरों ने कहा, ‘हम भी बाबा के लोग हैं’, जो दर्शाता है कि बाबा के जंगल राज में ऐसे मामले बार-बार हो रहे हैं.”

    इसके बाद, यूपी के डीजीपी ने तीन पुलिसकर्मियों को लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया. घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने दो मंत्रियों राकेश सचान और असिम अरुण को परिवार से मिलने और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन देने भेजा.

    हरियाणा में दलित आईपीएस अधिकारी की कथित आत्महत्या के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “2013 से 2023 के बीच दलितों के खिलाफ अपराधों में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि आदिवासियों के खिलाफ अपराध 91 प्रतिशत बढ़े हैं.”

    उन्होंने कहा, “हरियाणा में आईपीएस अधिकारी का जाति भेदभाव का सामना करना, हरिओम वाल्मीकि का उत्पीड़न, भारत के मुख्य न्यायाधीश पर हमला, बीजेपी की मानसिकता जो ऐसे कार्यों को सही ठहराती है और राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में वृद्ध दलित महिला कमला देवी रैगर के साथ हुए अत्याचार…ये हाल की घटनाएं अकेली नहीं हैं; ये आरएसएस-बीजेपी की ज़मीनी और सामंती मानसिकता का खतरनाक परिचायक हैं.”

    चौथी घटना में मध्य प्रदेश के कटनी जिले के मटवारा गांव में एक दलित युवक के चेहरे पर पेशाब किया गया. गिरफ्तारी नहीं होने से लोगों में काफी गुस्सा फैल गया. पीड़ित ने यह भी आरोप लगाया कि एक पुलिस अधिकारी ने उसे मामले को बढ़ाने से रोकने का दबाव डाला.

    कांग्रेस मध्य प्रदेश के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मोहन यादव की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया कि वह दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को मान्यता नहीं दे रही है.

    पटवारी ने सोशल मीडिया पर लिखा: “मैं पिछले 24 घंटे से इंतज़ार कर रहा था कि मध्य प्रदेश में एक और #अंत-दलित अपराध पर आपकी चुप्पी टूटे! कि यह नीच/बेशर्म व्यवस्था का झपटा तोड़े! लेकिन सत्ता की मोटी चमड़ी फिर भी बेपरवाह दिखाई देती है! #सिद्धि के बाद, @ChouhanShivraj जी ने पैर धोने का नाटक किया! आपकी ‘अच्छी सरकार’ में अब #Katni में भी #पेशाब_कांड हुआ! यह पहले एक दलित था! और फिर एक बार फिर, एक दलित सार्वजनिक उत्पीड़न का शिकार बन गया!”

    दलित और चुनाव

    एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने दलितों को समाजिक ढांचे में शामिल करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए लगातार काम किया है. हालांकि, प्रशासनिक और सत्ता संरचनाओं में मानसिकता अब भी मुख्य रूप से सवर्णों की है. इसलिए, उच्च स्तर पर संवेदनशीलता होने के बावजूद, निचले स्तर पर प्रतिक्रिया धीमी रहती है, जिससे नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं.”

    नेता ने आगे कहा, “हमारी सरकार ने दलित समुदाय को सशक्त बनाने के लिए रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया. जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में नियमों को ढील दी, तो कई बीजेपी नेताओं ने सवर्णों में बढ़ती नाराज़गी पर चिंता जताई, लेकिन बीजेपी सरकार ने दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए अध्यादेश पास किया.”

    1990 में, अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी ने ओबीसी और दलितों का समर्थन हासिल करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किया. दलित और ओबीसी नेताओं के साथ संबंध बनाए गए. बीजेपी ने दलित नेता मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने का समर्थन किया, ताकि दलित हिंदुत्व को एकजुट किया जा सके. इसके अलावा, वाजपेयी के कार्यकाल में दलित बंगारू लक्ष्मण को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. हालांकि, बाद में लक्ष्मण पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.

    एससी/एसटी संगठनों के महासचिव अशोक भारती ने कहा, “दलितों के लिए आरक्षण, एससी/एसटी एक्ट और आंबेडकर संवेदनशील मुद्दे हैं. वे अपने घरों में अंबेडकर को देवता मानते हैं. जब भी इन मुद्दों पर चर्चा होती है, दलित समुदाय के भीतर दरारें सामने आती हैं. राजनीतिक दल दलितों के वोट पाने में विफल रहते हैं, फिर भी दलितों को छूआछूत जैसी मानसिकता से देखते हैं.”

    2015 के विधानसभा चुनावों के बीच, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा पर बात की. राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने भागवत के आरक्षण समाप्त करने वाले बयान को चुनाव अभियान में उजागर कर पूरे बिहार में रणनीति बदल दी. इसके परिणामस्वरूप, बीजेपी को बिहार चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

    चाहे हाथरस कांड हो या ऊना मामला, जहां 2016 में गाय रक्षक लोगों ने सात सदस्यीय दलित परिवार पर हमला किया और उन्हें नग्न कर दिया, जिसके बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को हटाया गया—ये घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध का कारण बनीं. इसी तरह, हरियाणा में दलित आईपीएस अधिकारी की कथित आत्महत्या ने बीजेपी को दलित मुद्दों पर सतर्क रखा.

    2024 के लोकसभा चुनाव में, जब बीजेपी 400 सीटों का लक्ष्य रख रही थी, तो INDIA एलायंस ने अभियान चलाया कि “बीजेपी को संविधान बदलने के लिए 400 सीटें चाहिए.” कुछ बीजेपी सांसदों ने संविधान संशोधन को जायज़ ठहराया, जिससे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे हिंदी हार्टलैंड में दलित समुदाय में भय पैदा हुआ.

    इसका असर हुआ कि दलितों ने बीजेपी के खिलाफ वोट किया, जिससे बीजेपी की बहुमत सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं. अनुसूचित जातियां कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत हैं और संविधान परिवर्तन के डर के कारण बीजेपी को फैजाबाद सीट भी हारनी पड़ी, जो अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी है.

    सपा के दलित उम्मीदवार अवदेश प्रसाद विजयी हुए, जबकि कांग्रेस, जिसने 2019 में केवल छह एससी सीटें जीती थीं, इस बार 20 एससी आरक्षित लोकसभा सीटें जीत गईं. इंडिया एलायंस ने 33 सीटें हासिल कीं. बीजेपी को भारी नुकसान हुआ और उसने केवल 29 एससी सीटें जीतीं, जबकि 2019 में 44 सीटें थीं, खासकर यूपी में एनडीए के लिए बड़ा झटका रहा.

    इसके अलावा, दिसंबर में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान, बीजेपी फिर दलित पहचान के मुद्दे में फंसी, जब गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में अंबेडकर पर टिप्पणी की.

    उन्होंने कहा था, “आजकल का फैशन है—आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर. अगर आप इतनी बार भगवान का नाम लेते, तो अगले सात जन्मों तक स्वर्ग प्राप्त कर लेते.” इस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध किया.

    पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राकेश रंजन ने कहा, “सशक्तिकरण राजनीति की समस्या यह है कि समुदाय पर अब भी सवर्णों का दबदबा है. पूरी सत्ता संरचना बदलने में समय लगता है और बीजेपी अब भी सवर्णों के दबदबे में है. राजनीतिक स्तर पर बदलाव के बावजूद प्रशासनिक मानसिकता अभी भी सवर्ण वर्चस्व वाली है और निचले स्तर पर कोई सामंजस्य नहीं है. हर दिन हम सुनते हैं कि दलित दूल्हे को उसकी शादी में घोड़े पर चढ़ने नहीं दिया गया.”

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