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    वेनेजुएला पर अंतरराष्ट्रीय खामोशी जिनसे तबाह हो रहे हैं व्यवस्था के नियम

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJanuary 6, 2026

    अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक झटके में खत्म नहीं होती। इसका अंत तब होता है जब उल्लंघन होने पर बहाने बनाए जाते हैं, जब सिद्धांतों को चुनिंदा तरीके से लागू किया जाता है, और जब चुप्पी नीति बन जाती है। वेनेजुएला में जो हुआ, वह एक चेतावनी है।

    अशोक स्वैन

    Published: 06 Jan 2026, 8:49 AM

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेज़ुएला में रात के अंधेरे में मिलिट्री ऑपरेशन करने और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने का आदेश देना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के पतन में एक निर्णायक क्षण को सामने रखता है। यह ऑपरेशन किसी ऐसे स्वतंत्र आंतकवादी के खिलाफ खुफिया कार्रवाई नहीं थी जो किसी अराजक क्षेत्र में छिपा हो। यह एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को उसकी अपनी राजधानी से सशस्त्र बलों के माध्यम से अगवा करने की कार्रवाई थी, जिसे न सिर्फ कांग्रेस की मंज़ूरी प्राप्त नहीं थी, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सबसे बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन भी करती थी।

    इस क्षण को दरअसल और ख़तरनाक बनाने वाली बात सिर्फ यह कार्रवाई ही नहीं है, बल्कि उसके बाद आई प्रतिक्रियाएं भी हैं। यूरोप की धीमी और दबे स्वर वाली प्रतिक्रिया, सावधानी से गढ़े गए बयान और साफ़ दिखाई देने वाली नज़रें फेर लेने का रुख यह दिखाता है कि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गिरावट को अब चुप्पी और चुनिंदा आक्रोश के ज़रिये सक्रिय रूप से तेज़ किया जा रहा है।

    ट्रंप प्रशासन ने इस कदम को क़ानून-व्यवस्था से जुड़ी कार्रवाई के रूप में पेश करने की कोशिश करते हुए और मादुरो के खिलाफ़ नार्को-आतंकवाद के आरोपों के तहत जारी अभियोग बताकर जायज ठहराया है। लेकिन जरा सी भी गहराई से देखें तो यह तर्क टिक नहीं पाता। कोई भी राष्ट्र गिरफ़्तारी वारंट लागू करने के नाम पर विशेष बलों को सीमा पार नहीं भेजता, विदेशी राजधानियों में टारगेट पर हमला नहीं करता और राष्ट्राध्यक्षों को उनकी सत्ता से बेदखल नहीं करता। यदि इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए, तो कोई भी शक्तिशाली देश किसी भी विदेशी नेता को अपराधी घोषित कर उसका अपहरण करने के अधिकार का दावा कर सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय क़ानून इस बिंदु पर पूरी तरह स्पष्ट है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी राज्य (देश) की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। ऐसा कोई मान्य कानूनी सिद्धांत मौजूद नहीं है जो अपहरण के ज़रिये सत्ता परिवर्तन की अनुमति देता हो, और न ही कोई ऐसा सिद्धांत है जो किसी देश को यह अधिकार देता हो कि वह किसी दूसरे राज्य (देश) को “चलाए” क्योंकि उसका नेता उसे नापसंद है या उस पर विदेश में अभियोग दर्ज हैं।

    ट्रम्प प्रशासन के अपने अंदरूनी विरोधाभास भी इस कानूनी उल्लंघन को और भी साफ़ कर देते हैं। कुछ ही सप्ताह पहले, वरिष्ठ अधिकारियों ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया था कि वेनेजुएला में ज़मीनी हमलों के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी की ज़रूरत होगी। लेकिन इस बात को अचानक नजरंदाज कर दिया गया। और हमले से पहले कोई नई मंज़ूरी नहीं मांगी गई। कोई साफ़ कानूनी ढांचा पेश नहीं किया गया। इसके बजाय, बहाने के तौर पर पहले ड्रग्स की तस्करी से, फिर माइग्रेशन और फिर तेल में बदल गया। और ये सब कुछ ही वक्त में हो गया।

    यह कोई असमंजस नहीं था। यह पाबंदियों को धता बताना था। वेनेजुएला के तेल ढांचे को फिर से बनाने और देश को “ठीक से” चलाने के बारे में ट्रम्प के बाद के बयानों ने बाकी दिखावा भी खत्म कर दिया। यह सब शक्ति, संसाधन और दूसरों के लिए सबक के तौर पर स्थापित करने के लिए किया गया है।

    यूरोप में इसके बाद जो हुआ, वह बहुत ही निराशाजानक है। यूरोपीय नेताओं ने वेनेजुएला में अमेरिकी कदम पर चिंता जताई, संयम बरतने की अपील की, और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति अपने सैद्धांतिक वादों को दोहराया। लेकिन किसी ने भी इस कदम के असली मकसद का नाम तक लेने की हिम्मत नहीं की। यह मकसद था: एक संप्रभु देश के खिलाफ ताकत का गैरकानूनी इस्तेमाल। यूरोप की यह नाकामी उसके सबसे बड़े और सबसे प्रभावशाली देशों में सबसे ज़्यादा साफ़ दिखी है।

    फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी के पास एक मज़बूत यूरोपीय प्रतिक्रिया को आकार देने के लिए राजनयिक ताकत, सैन्य क्षमता और ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी सब है, फिर भी तीनों ने साफ तौर पर अपनी स्थिति रखने के बजाए एहतियात को ही चुना। पेरिस ने खुद को अंतरराष्ट्रीय कानून के बारे में प्रक्रियात्मक भाषा तक सीमित रखा, और किसी किस्म की जवाबदेही की मांग नहीं की।

    लंदन ने भी संयम बरतने सब्र रखने और सच्चाई का पता लगाने की बात कही। गोया किसी देश के राष्ट्रपति को हथियारों के बल पर अपहरण को साबित करने के लिए नैतिक फैसले से पहले और ज़्यादा जांच की ज़रूरत हो। बर्लिन, जो पारंपरिक रूप से संप्रभुता की पवित्रता पर यूरोप की सबसे मुखर आवाज़ रहा है, उसने भी आंखें मोड़ लीं, क्योंकि गहरी रणनीतिक निर्भरता के इस समय में वह वॉशिंगटन को नाराज़ करने से बचना चाहता था। उनमें से किसी ने भी कोई साफ़ सीमारेखा तय नहीं की, न ही उन्होंने इस काम की गंभीरता के मुताबिक कोई हल सुझाया। उनकी यह चुप्पी तटस्थता नहीं; यह सहमति है।

    वेनेजुएला के मामले में यह एहतियाती झिझक यूक्रेन पर यूरोप की बयानबाजी से बिल्कुल अलग है, जहां संप्रभुता को पवित्र माना गया है और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन वैश्विक व्यवस्था के लिए अस्तित्व का खतरा माना जाता है। यह विरोधाभास साफ दिखता है। जब रूस यूरोप में सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो यह सभ्यता पर हमला होता है। जब अमेरिका लैटिन अमेरिका में ऐसा करता है, तो यह एक दुखद उलझन बन जाती है।

    यह दोहरा मापदंड बाकी दुनिया से छिपा नहीं है। यह उस धारणा की पुष्टि करता है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू किया जाता है। जब सुविधा होती है तो इसका इस्तेमाल किया जाता है, और जब शक्तिशाली सहयोगी इसे तोड़ते हैं तो इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। नुकसान बढ़ता जा रहा है। गाज़ा एक अहम मोड़ था,  जहां अंतर्राष्ट्रीय अदालत के फैसलों को खुलेआम नज़रअंदाज़ किया गया और नागरिकों की तकलीफ को बिना किसी नतीजे के सामान्य मान लिया गया। अब वेनेज़ुएला भी उसी में जुड़ गया है। इन दोनों की हालत साफ़ संदेश देती है: नियम सिर्फ़ उन पर लागू होते हैं जिनके पास ताकत नहीं है।

    लेकिन जो कुछ हुआ है उसका असर वेनेजुएला से कहीं ज़्यादा दूर तक है। ट्रम्प पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यह ऑपरेशन आखिरी नहीं है। उनका प्रशासन क्यूबा के बारे में खुलकर बात करता है। उनकी बातों में कोलंबिया भी शामिल रहा है। ईरान पहले ही सीधे अमेरिकी हमलों का अनुभव कर चुका है। ग्रीनलैंड अभी भी एक आकर्षण बना हुआ है, जिस पर डेनमार्क की एक स्व-शासित इकाई और यूरोप से जुड़े होने के बजाय एक क्षेत्रीय पुरस्कार के तौर पर खुलकर चर्चा की जाती है।

    अगर अमेरिका सैन्य तरीकों का इस्तेमाल कर ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की कोशिश करता है, तो यूरोप को एक ऐसे मुश्किल पल का सामना करना पड़ेगा जिसके लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं है। इस बात की बहुत कम संभावना है कि यूरोपीय देश ऐसे किसी कदम को रोक पाएंगे। नेटो एक बड़े संकट का सामना करेगा, जो गठबंधन की वफादारी और इस बुनियादी सिद्धांत के बीच फंस जाएगा कि सीमाओं को ताकत के दम पर नहीं बदला जा सकता।

    यह यूरोप के मौजूदा रवैये का सबसे बड़ा खतरा है। जब अमेरिका सीमारेखा पार करता है, तो यूरोप उसे रोक सके या ऐसा करने से मना करके एक ऐसी दुनिया को सामान्य बनाने में मदद कर रहा है जिसमें सिर्फ़ ताकत ही तय करती है कि क्या कानूनी है और क्या नहीं। यह सोचना कि अगर सिर्फ़ “दुश्मन” देश ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लंघन करेंगे और वह बचे रहेंगे, एक कोरी कल्पना है। एक बार जब सबसे ताकतवर देश कानून को सिर्फ अपने हिसाब से इस्तेमाल करना और मानने लगता है, तो कानून का असल मकसद खत्म हो जाता है। क्योंकि फिर दूसरे भी इसी नियम का पालन कर कानून का उल्लंघन करेंगे।

    ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि मादुरो गैर-कानूनी, भ्रष्ट और तानाशाह हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तो ऐसे ही मामलों के लिए बनाई गई है। संप्रभुता सिर्फ ‘अच्छे’ नेताओं की रक्षा के लिए नहीं होती। यह अराजकता को रोकने के लिए होती है। कानून का विकल्प न्याय नहीं, बल्कि मनमानी बन गया है। अगर वैधता कुछ ऐसी बन जाती है जिसे ताकतवर लोग एकतरफा तय करते हैं, तो कोई भी देश सुरक्षित नहीं है। आज जिन चुनावों पर विवाद है, उनका इस्तेमाल कल कहीं और दखल देने को सही ठहराने के लिए किया जा सकता है।

    असली समस्या यह है कि ट्रंप हवा में ऐसे काम नहीं कर रहे हैं। उनके कदम एक बड़े बदलाव का हिस्सा हैं, जो दुनिया को प्रभाव के क्षेत्रों, संसाधनों पर नियंत्रण और लेन-देन वाली ताकतों के इर्द-गिर्द व्यवस्थित कर रहे हैं। यह इक्कीसवीं सदी की तकनीक में लिपटी उन्नीसवीं सदी की सोच की वापसी है। जो नया है, वह महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि विरोध की कमी है। अमेरिका पर यूरोप की निर्भरता राजनीतिक लकवे में बदल गई है। अलग-थलग कर दिए जाने के डर ने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को खत्म कर दिया है। वक्ती सुरक्षा चुनने में, यूरोप उन्हीं नियमों की बलि दे रहा है जिनसे उन्होंने सामूहिक सुरक्षा को सार्थक बनाया था।

    इतिहास शायद इस पल को अलग तरह से याद रखेगा। सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर एक देश के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी को एक अहम मोड़ के तौर पर याद किया जाएगा, न कि सिर्फ मादुरो की वजह से कि ट्रंप ने क्या किया। ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को खत्म कर रहा है, जिसका नेतृत्व करने का दावा वह कभी करता था। यूरोप, जवाबदेही के बजाय समझौता चुनकर, उस तबाही को और तेज़ करने में मदद कर रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक झटके में खत्म नहीं होती। इसका अंत तब होता है जब उल्लंघन होने पर बहाने बनाए जाते हैं, जब सिद्धांतों को चुनिंदा तरीके से लागू किया जाता है, और जब चुप्पी नीति बन जाती है। वेनेजुएला में जो हुआ, वह एक चेतावनी है। और इससे भी सबसे खतरनाक वह प्रतिक्रिया है जिसमें दिखावा किया गया है कि यह तो किसी और की समस्या है।

    (अशोक स्वैन उपसला विश्वविद्यालय, स्वीडन में पीस एंड कन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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