राजनीतिक बदलाव अक्सर खामोशी से आता है- जब अटूट विश्वास की जगह संशय की चादर पसर जाए, जब रटे-रटाए जवाबों पर सवाल उठने लगें और जब परिवारों को यह अहसास हो कि जिस राजनीतिक सहमति को वे कभी अंतिम मानते थे, वह दरक चुकी है।
जेन-ज़ी के जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन में तमाम तस्वीरें ध्यान खींचने वाली थीं। ऐसी ही थी मास्क लगाए प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें। इनकी तादाद अच्छी-खासी थी। लेकिन उन्होंने मास्क क्यों पहन रखा था? क्या वे पुलिस से बचने के लिए ऐसा कर रहे थे? नहीं, वे अपने ही परिवारों से छिप रहे थे। यह बात 20 जुलाई के मार्च के बाद खास तौर पर खुलकर सामने आई, जब उन पर पुलिस और सरकार द्वारा उतारे गए मिलिशिया द्वारा कीलों वाली लाठियों, शॉक बैटन, आंसू गैस और पेलेट गन से हमला किया गया।
बिहार के एक 21 वर्षीय छात्र ने बताया कि उसने माता-पिता को प्रदर्शन में शामिल होने की जानकारी नहीं दी थी क्योंकि वे कट्टर बीजेपी समर्थक हैं, लेकिन उसे आना पड़ा क्योंकि उसके साथी उसी के हक की लड़ाई लड़ रहे थे। एक अन्य छात्र ने मास्क इसलिए पहना था क्योंकि उसे ‘टेलीविजन या सोशल मीडिया पर पहचान लिए जाने का डर था।’ तीसरे छात्र ने तो साफ कहा कि उसके माता-पिता के राजनीतिक झुकाव की वजह से ही उसे सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ा। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। जाहिर है, बड़ी तादाद ऐसे प्रदर्शनकारियों की थी जिनका पहला टकराव शासन-सत्ता से नहीं, अपने मां-बाप से था।
बगावत के ऐसे ही स्वर देश के अन्य हिस्सों में भी सुने गए। इस तरह की गूंज उन कोनों से भी आईं, जिसके बारे में सोचना भी मुश्किल था। इसी आंदोलन की वजह से इस्तीफा देने वाले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की बेटी ने जेन-ज़ी आंदोलन का खुलकर समर्थन करके अपने माता-पिता को असमंजस में डाल दिया। उन्होंने मीडिया साक्षात्कारों में सार्वजनिक रूप से अपने माता-पिता की राजनीति से अलग राह पर चलने की घोषणा की।
बीजेपी की पूर्व छात्र नेता उमंग गुप्ता ने कहा कि उनका परिवार भी मोदी समर्थकों का रहा है और उन्होंने अपने माता-पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि उनकी तरह कई युवाओं ने प्रदर्शन का हिस्सा बनने के लिए अपने परिवारों से विद्रोह किया है। उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, ‘उन्हें पीटा जा रहा है, उन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है।’
बीजेपी के सामाजिक गठबंधन-परिवारों, मोहल्लों, आरएसएस शाखाओं, व्हाट्सएप ग्रुपों, मंदिरों, व्यावसायिक नेटवर्क और पूर्व छात्र मंडलों- के भीतर दो पीढ़ियों के बीच दरार के शुरुआती संकेत अब साफ दिखाई दे रहे हैं। वर्षों तक राजनीतिक विचारधारा का प्रवाह माता-पिता से बच्चों की ओर होता था, लेकिन जेन-ज़ी के इस विरोध प्रदर्शन ने उस पुरानी धारणा की मियाद खत्म कर दी है।
बगावत की इन निजी घटनाओं को या इस उभरते रुझान को बीजेपी के अंत की शुरुआत या इसके संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीतिक पार्टियां संकटों और अंदरूनी मतभेदों के दौर से उबरने के लिए जानी जाती हैं। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि सामाजिक एकजुटता के उस मजबूत कवच में दरार जरूर आ गई है- क्योंकि अब समझदार युवा अपने घर के बुजुर्गों से सीख लेने के बजाय उस डिजिटल दुनिया से निर्देशित हो रहे हैं जो उन्हें अपने इंटरनेट परिवार जैसी महसूस होती है।
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पीढ़ियों के बीच की यह कहानी केवल अलगाव की नहीं। उदाहरण के लिए, मुंबई में कई माता-पिता अपने बच्चों के साथ कदम से कदम मिलाकर इस आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर उतरे। विभिन्न परिवारों ने एक ही राजनीतिक घटनाक्रम पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दी है; इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। कुछ युवाओं के अपने माता-पिता से बहस करने या कुछ समर्थकों द्वारा असहजता जताने मात्र से राजनीतिक दल बिखरा नहीं करते। न ही ये बिखरे हुए उदाहरण किसी व्यापक वैचारिक बदलाव का अंतिम सबूत हैं।
फिर भी, ये झलकियां विशेष ध्यान देने योग्य हैं क्योंकि ये उन जगहों से उभरकर आ रही हैं जिन्हें राजनीतिक रिपोर्टिंग अक्सर नजरअंदाज कर देती है और हमारी मुख्यधारा की मीडिया निश्चित रूप से दबा देती है। चुनाव हमें यह बताते हैं कि लोग कैसे वोट देते हैं और प्रदर्शन हमें यह बताते हैं कि कौन लोगों को एकजुट कर रहा है। लेकिन परिवार हमें यह बताते हैं कि राजनीतिक विश्वास पीढ़ियों के बीच कैसे आगे बढ़ते हैं, कैसे बचाए जाते हैं, कैसे उन्हें चुनौती दी जाती है और कैसे उन पर पुनर्विचार होता है।
पिछले एक दशक के दौरान बीजेपी ने उस असाधारण सामाजिक समर्थन का आनंद उठाया जो केवल पार्टी की सदस्यता तक सीमित नहीं था। समाज पर उसकी पकड़, विशेष रूप से ‘हिन्दी पट्टी’ में, रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस, मोहल्ला समूहों, हिन्दू धार्मिक नेटवर्कों, पेशेवर संगठनों और पारिवारिक इकाइयों के माध्यम से बनी रही।
सरकार पर आश्रित और समर्पित मीडिया द्वारा गढ़े गए नैरेटिव ने पार्टी की अजेय छवि को पेश करने में खास भूमिका निभाई। प्रदर्शन स्थलों से भगाए जाने और आलोचना झेलने के बाद भी बड़ा मीडिया लगातार सरकार के आलोचकों को ही घेरने में व्यस्त है। टीवी एंकर्स यह पूछने के बजाय कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया, अभिजीत दिपके और सौरभ दास जैसे प्रदर्शनकारियों को ही नीचा दिखाने में लगे हैं।
हालांकि राहत की बात यह है कि स्मार्टफोन के दौर से आगे की इस युवा पीढ़ी की राजनीतिक आवाज अब जाति, वर्ग, धर्म और पुरानी राजनीतिक सीमाओं से परे उठ रही है। यह तकनीकी रूप से सहबद्ध युवाओं की ऐसी जमात है जिसे समाजशास्त्री अब ‘डिजिटल पब्लिक’ कहने लगे हैं। विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर पली-बढ़ी यह पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और अपनी पहचान से जुड़ी वास्तविक चिंताओं में साझा जमीन तलाश रही है। यह उनके माता-पिता या दादा-दादी से अलग है, जिन्होंने मौजूदा सरकार को शायद इसलिए खुली छूट दे रखी थी क्योंकि उसने उन्हें नफरत करने के लिए एक काल्पनिक दुश्मन दे दिया था।
इस समय यह भविष्यवाणी करना मुश्किल है कि भाजपा के अपने मजबूत गढ़ों में मिले इस पहले वास्तविक सामाजिक प्रतिरोध का भविष्य क्या होगा। क्या ये युवा प्रदर्शनकारी और विपक्ष में उनके समर्थक अन्य पीड़ित वर्गों-जैसे असंतुष्ट किसानों, औद्योगिक मजदूरों और विस्थापित आदिवासियों- के साथ मिलकर कोई बड़ा सामाजिक ताना-बाना बुन पाएंगे? क्या सड़क का विपक्ष संसद के भीतर के विपक्ष के साथ तालमेल बिठा पाएगा? हम नहीं जानते। लेकिन याद रखें, राजनीतिक बदलाव जब आता है, तो वह ढोल-नगाड़ों के साथ नहीं आता। वह अक्सर खामोशी से शुरू होता है-जब अटूट विश्वास की जगह संशय की चादर पसर जाए, जब रटे-रटाए जवाबों पर सवाल उठने लगें और जब परिवारों को यह अहसास हो कि जिस राजनीतिक सहमति को वे कभी अंतिम मानते थे, वह अब दरक चुकी है।
- जयदीप हार्दीकर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं

