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    शरिया, मनुस्मृति या भारतीय संविधान

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJanuary 8, 2026

    भारत में मुसलमान हिन्दुत्व की राजनीति के निशाने पर होने के कारण अपने आपको घिरा हुआ-सा महसूस कर रहे हैं। मुसलमानों में रूढ़िवाद बढ़ रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आधुनिक संस्थाओं के माध्यम से नागरिक के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करने की है।

    राम पुनियानी

    Published: 08 Jan 2026, 7:59 AM

    भारतीय संविधान को आजादी के संघर्ष के मूल्यों के आधार पर गढ़ा गया है। संविधान सभा, जो मोटे तौर पर भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करती थी, ने भारतीय संविधान का निर्माण किया जो हमारे राष्ट्रीय जीवन का पथप्रदर्शक है। संविधान स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक समाज की स्थापना की अपेक्षा एवं आव्हान करता है।

    देश की राजनैतिक ताकतों का एक तबका, जिसमें मुख्यतः कट्टरंपथी हिंदू थे, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत करता था। उसने शुरू से ही संविधान का विरोध किया। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के नेता, जिन्हें समाज के कट्टरपंथी तत्वों का समर्थन प्राप्त था, के विचार आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर में प्रकाशित एक लेख में जाहिर हुए, जिसमें यह कहते हुए भारतीय संविधान का विरोध किया गया कि इसमें कुछ भी भारतीय नहीं है और इसे हिंदू स्वीकार नहीं करेंगे। सावरकर ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा कि मनुस्मृति ही हमारा संविधान है। इसी नजरिए को अभिव्यक्त करते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हाल में कहा कि मनुस्मृति का दर्जा भारतीय संविधान से ऊंचा है।

    केवल यही वर्ग ऐसा नहीं है जो संविधान के प्रति उपेक्षापूर्ण नजरिया रखता है और ‘ईश्वर की वाणी‘ अर्थात धर्मग्रंथों को प्रधानता देता है। मौलाना मुफ्ती शमाइल नदवी ने भी इसी तरह का वक्तव्य दिया है। ये मौलाना हाल में जावेद अख्तर के साथ ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है‘ विषय पर बहस के बाद चर्चित हुए हैं। उनकी एक टिप्पणी वायरल हुई है जिसमें वे कहते हैं, ‘‘मुसलमानों ने धर्मनिरपेक्षता को मान्यता देकर और शरिया पर राष्ट्रीय संस्थाओं को सर्वोच्चता देकर गलती की‘‘।

    उन्होंने लोकतंत्र और देश को धर्म से ऊपर रखने की भी आलोचना की। मौलाना ने सवाल उठाया कि क्या आस्थावानों को चुपचाप इस्लामिक कानूनों के विपरीत अदालतों के फैसलों को स्वीकार कर लेना चाहिए। इन वक्तव्यों को उलेमा की राय बताकर पेश किया जाता है लेकिन आलोचकों का मानना है कि इस तरह की बातें भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ हैं और धर्म की प्रधानता को पुष्ट करती हैं।

    जहां मनुस्मृति ब्राम्हणवाद का प्रतिनिधित्व करने वाले मूल्यों का संकलन है, जो हिन्दू धर्म की प्रमुख धारा है, वहीं शरिया कई चीजों का मिश्रण है। शरिया एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है मार्ग या रास्ता। इस्लामिक कानून और आचरण संबंधी ये नियम निम्न स्त्रोतों पर आधारित हैं-

    कुरान, हदीस (पैगम्बर मोहम्मद के कथन और कार्य), इज़मा (विद्वानों की सर्वसम्मत राय) और कियास (दो मसलों में समानताओं के आधार पर उन्हें एक बराबर मानना)। शरिया केवल गलत काम करने के लिए दंड की व्यवस्था नहीं है वह व्यक्तिगत आचरण एवं कानूनी मसलों के संबंध में मार्गदर्शन भी है। व्यवहार में शरिया की व्याख्या विधिशास्त्र के विभिन्न केन्द्रों द्वारा की जाती है (सुन्नी, हनफी, शाफई, मलिकी, हम्बली, शिया और जाफरी)। इस प्रकार शरिया की न्याय प्रणाली में विविधता है।

    मुस्लिम बहुमत वाले लगभग 55 देशों में से केवल सऊदी अरब, ईरान और अफगानिस्तान में कानून पूर्णतः शरिया पर आधारित हैं। कुछ अन्य मुस्लिम बहुमत वाले देशों में यह आंशिक रूप से लागू है। भारत में केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ शरिया के आधार पर बनाए गए हैं।

    बदलते समय और सामाजिक हालातों और इन कानूनों के बनाए जाने के बाद सैकड़ों सालों में आए बदलावों के मद्देनजर क्या किया जाना चाहिए? भारत में धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लगातार मनुस्मृति को लागू करने की बात करते हैं। क्या मुफ्ती के दावे के अनुसार शरिया को संविधान से ऊपर रखा जा सकता है? विधि विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा एक वीडियो में तर्क देते हैं कि हर देश में संविधान ही सर्वोपरि है। कई देशों में संविधान शरिया को मान्यता देता है और उसके कुछ प्रावधानों को संविधानों में स्थान दिया गया है।

    मुस्लिम बहुमत वाले देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति क्या है? इनमें से कुछ देश बहुत कम लोकतांत्रिक हैं तो कुछ में जनता की आवाज ज्यादा सुनी जाती है। सोशल मीडिया पर इन दिनों शमाइल की इस बात के लिए आलोचना की जा रही है कि वे मुसलमानों को संविधान का पालन न करने के लिए भड़का रहे हैं, जो एक राष्ट्र विरोधी कृत्य है। वहीं दूसरी ओर कई लोग शरिया का समर्थन करने के लिए मुफ्ती की प्रशंसा कर रहे हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि भारतीय इतिहास के मध्यकाल के दौरान मुस्लिम शासकों ने भी शरिया को लागू नहीं किया था।

    जहां मुफ्ती की अपनी राय है, वहीं असगर अली इंजीनियर, जो भारत में इस्लाम के सबसे बड़े अध्येता थे, की संविधान के संदर्भ में शरिया की भूमिका पर अलग राय थी। डॉ. इंजीनियर अक्सर शूरा (आपसी विचार विमर्श) का जिक्र करते हुए यह तर्क देते थे कि समकालीन विश्व में लोकतंत्र और उससे जुड़े सिद्धांतों का पालन संभव है। डॉ इंजीनियर का मानना था कि कुरान की अवधारणाओं और आधुनिक काल का प्रतिनिधित्व-आधारित लोकतंत्र – जो एक मानवीय अवधारणा है – एकदम समान भले ही न हों परंतु ‘‘आधुनिक लोकतंत्र के मूल तत्व और कुरान की लोगों से विचार विमर्श करने की हिदायत करीब-करीब एकसी हैं‘‘।

    उनके अनुसार ‘‘नई संस्थाएं विकसित होती रहती हैं और मनुष्य अपने दुनियावी अनुभवों के अनुसार बदलता रहता है और इन संस्थाओं में सुधार करता रहता है। समकालीन विश्व में शूरा की अवधारणा का अर्थ होना चाहिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना, जिनके लिए चुनाव एक अनिवार्य जरूरत होगी। कुरान न केवल शूरा (लोकतांत्रिक विचार-विमर्श) की अवधारणा के बारे में बताती है बल्कि तानाशाही की किसी भी अवधारणा का जरा सा भी समर्थन नहीं करती‘‘।

    भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित था और जिसका लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना था, में अन्य इस्लामिक विद्वानों के साथ-साथ इस्लाम के बहुत बड़े अध्येता मौलाना अबुल कलाम आजाद और समर्पित मुस्लिम नेता खान अब्दुल गफ्फार खान भी शामिल थे। ये सभी नेता लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध थे।

    कुछ साल पहले ही मुस्लिम महिलाओं ने शाहीन बाग आंदोलन के माध्यम से समुदाय को मताधिकार से वंचित करने की आशंका के खिलाफ अपनी लोकतांत्रिक ताकत का अहसास कराया था। वर्तमान समय की जरूरत क्या है? भारत में मुसलमान हिन्दुत्व की राजनीति के निशाने पर होने के कारण अपने आपको घिरा हुआ-सा महसूस कर रहे हैं। मुसलमानों में रूढ़िवाद बढ़ रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आधुनिक संस्थाओं के माध्यम से नागरिक के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करने की है।

    इस्लाम में भी कानूनों की कई धाराएं और न्यायशास्त्र की विभिन्न प्रणालियां हैं। चूंकि ये शरिया का हिस्सा हैं, इसलिए शरिया किसी मसले पर क्या कहती है, इस पर भी विवाद संभव है। चूंकि मुस्लिम इस देश में अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनके पर्सनल लॉ हैं, जिनका भी विरोध होता रहता है।

    वर्तमान में हिन्दू दक्षिणपंथ प्रमुख प्रतिगामी ताकत है जो मनुस्मृति के मूल्यों को प्रधानता दिलवाने के प्रयास में जुटी हुई है। धर्म का मुखौटा लगाकर गैर-बराबरी कायम करने के ये प्रयास स्वागतयोग्य नहीं हैं। हमें उन यूरोपीय राष्ट्रों की ओर भी देखना चाहिए जहां धर्म के पैर उखड़ रहे हैं।

    वर्तमान मेंं हम दो परस्पर विरोधी स्थितियों का सामना कर रहे हैं। एक ओर मानव समाज ने गरिमा और समानता के सिद्धांत स्थापित किए हैं, जो संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर धार्मिक दक्षिणपंथ की शक्ति पिछले कुछ दशकों में बढ़ी है। मुफ्ती को इस्लाम की अवधारणाओं की गहन जानकारी भले ही हो, उनके लिए समकालीन समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मूल्यों के बारे में जानना भी जरूरी है।

    (लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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