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    भाषा भी इंसाफ के आड़े आने लगे तो पीड़ित कहां जाए?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJanuary 10, 2026

    क्या इंसाफ मिलने में भाषा की बाधा सिर्फ एक पीड़िता की समस्या है? बड़ी तादाद में अन्य पीड़ित भी अपनी समझ में आने वाली भाषा में न्याय की लड़ाई लड़ने के अवसरों से वंचित हैं। उन्नाव पीड़िता का कहती हैं कार्यवाही हिंदी में हो तो मैं अपना केस खुद लड़ सकती हूं।

    कृष्ण प्रताप सिंह

    Published: 10 Jan 2026, 7:00 PM

    उत्तर प्रदेश में उन्नाव के आठ साल पुराने बहुचर्चित रेप कांड में 20 दिसंबर 2019 को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पश्चिम) द्वारा दोषी करार दिए गए रसूखदार कुलदीप सिंह सेंगर की उम्र कैद की सजा निलंबित करके उसे जमानत देने का दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला (जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने स्थगित कर दिया है) आया, तो जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, कई प्रकार के सामाजिक उद्वेलन पैदा हुए। इसलिए कि दुस्सह और दुर्निवार स्थितियों में फंसा दी गई इस कांड की पीड़िता को लंबी जद्दोजहद में बहुत कुछ गंवाने के बाद तब न्याय मिल पाया था, जब उसकी सुनवाई उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में सुनिश्चित की गई।

    लेकिन सेंगर को जमानत दिए जाने के विरुद्ध तमाम तनी हुई भृकुटियों के बीच भी एक जरूरी सवाल पूरी तरह अचर्चित रह गया, जोकि न्याय की भाषा से जुड़ा हुआ है। यह सवाल इस कारण व्यापक चर्चा और जवाब की मांग करता था (अभी भी करता ही है) कि पीड़िता ने विभिन्न समाचार माध्यमों से बातचीत में बार-बार और साफ-साफ कहा कि अपने साथ हुई हैवानियत के खिलाफ लड़ाई में उसका दूसरी कई बाधाओं से तो सामना हुआ ही, अदालती कार्रवाई की समझ में न आने वाली भाषा भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई।

    पीड़िता के ही शब्दों में कहें तो : ‘अदालत की कार्यवाही हिन्दी में हो तो मैं अपना केस खुद लड़कर दुनिया के सामने सारी सच्चाई स्पष्टता के साथ रख दूं। … दिल्ली हाईकोर्ट में बलात्कारी की याचिका पर बहस हिन्दी में होती तो भी मैं अपना केस ख़ुद लड़ लेती। लेकिन क्या करूं, थोड़ी इंग्लिश कमजोर है मेरी। कुछ-कुछ चीजें ही समझ में आती हैं।’

    इस परिप्रेक्ष्य को व्यापक करें तो सोचने की सबसे बड़ी बात यह है कि क्या न्याय मिलने में भाषा की यह बाधा सिर्फ इसी एक पीड़िता की समस्या है? और इसका सीधा-सा जवाब है: नहीं, बड़ी संख्या में अन्य पीड़ित-पीड़िताएं भी देश की आजादी के 75 साल से ज्यादा पुरानी हो जाने के बावजूद अपनी समझ में आने वाली भाषा में न्याय की लड़ाई लड़ने के अवसरों से वंचित हैं। क्योंकि कानून आज भी पटियाला वाले राजा जैसी दबंग राजशाही भाषा में ही बात करता है।

    यह स्थिति पीड़ितों को साधारण से साधारण मामलों में भी न सिर्फ ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का मोहताज बनाती है, बल्कि जब उनके वकील और जज उनके मामले में फैसले तक पहुंचने की अदालती कार्रवाई में मुब्तिला होते हैं, बिना कुछ समझे उसे टुकुर-टुकुर निहारने को अभिशप्त करती है।

    यहां यह भी गौरतलब है कि उनका यह अभिशप्त होना किसी भाषा के देशी-विदेशी या मातृभाषा-राजभाषा होने के मुद्दे तक संकुचित नहीं है। बात को यों समझ सकते हैं कि जिन अदालतों में उनकी मातृभाषा में सुनवाई होती है, वहां भी उनको इससे छुटकारा नहीं मिलता, क्योंकि तब भी कानून की भाषा को संभवतः जानबूझ कर इतना दुरूह बनाए रखा जाता है कि वह सामान्य व्यक्ति के सिर के ऊपर से निकल जाए।

    इस भाषा में जहां अभी भी एक से बढ़कर एक जटिल लैटिन और फ्रेंच शब्दों का प्रयोग होता है, वहीं सुनवाई के लिए जरूरी होने पर अखबारों में छपाई जाने वाली ‘हेतु संदर्शित करने की सूचनाएं’ तक ऐसी भाषा में होती हैं, जिनको समझना किसी द्रविड़ प्राणाक्षयाम से कम नहीं होता। कारण यह कि कानूनी भाषा को सरल और सहज बनाने का काम प्रायः सारी भारतीय भाषाओं में इतना पिछड़ा हुआ है कि इन सूचनाओं को कारण बताने की सूचनाओं में बदलना तक संभव नहीं हो पाया है, जबकि उनका उद्देश्य कारण बताने से ही संदर्भित है।

    कई जानकारों के अनुसार इस काम को संभवतः जानबूझकर पीछे छोड़ दिया गया है, क्योंकि आगे बढ़ाना उन प्रभावशाली वर्गों के हितों के खिलाफ जाता है, जिन्हें उसे पीछे छोड़ देने का लाभ मिल रहा है, जबकि इन वर्गों का यह लाभ देशवासियों की बड़ी संख्या के साथ जारी सामाजिक अन्यायों की उम्र लंबी करने का वायस बना हुआ है। स्वाभाविक ही, दलित और वंचित तबके इन सामाजिक अन्यायों के सबसे ज्यादा शिकार हैं।

    सवाल है कि इन अन्यायों का प्रतिकार कैसे मुमकिन हो, जब हालत यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते तो बार-बार हैं कि अदालती कार्यवाहियों और फैसलों की भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसे न केवल कानून के ज्ञाता बल्कि जनसाधारण भी समझ सकें, लेकिन उनकी सरकार इसके लिए जरूरी कदम नहीं उठाती और ऐसा जताती है कि जैसे उसके कानों पर जूं ही नहीं रेंग रही।

    गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी सहायता वितरण तंत्र को सुदृढ़ बनाने को लेकर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह बात दोहराते हुए कहा था कि इसके बगैर सारे देशवासियों के लिए सामाजिक न्याय कतई सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। वह तो तभी किया जा सकता है, जब इंसाफ की भाषा हर सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए बोधगम्य हो। उन्होंने यह भी कहा था कि लोगों के जीवन में सुगमता लाना तभी संभव है, जब न्याय की सुगमता से सुलभता सुनिश्चित हो।

    लेकिन वह कैसे सुनिश्चित हो सकती है, जब प्रधानमंत्री के यह सब कहने के बाद उनकी सरकार इस मामले में ‘एक चुप हजार चुप’ साध ले और बात को इस तरह आई गई हो जाने दें, जैसे कुछ हुआ ही न हो। वह भी जब इस मामले में जरूरत दृढ़ संकल्प से जरूरी कदम उठाने की हो।

    यह समझने की भी कि अदालतों के संदर्भ में न्याय की भाषा का मतलब ऐसी भाषा से है जो वहां आकर न्याय मांगने वाले पक्षों को समझ में आए। निस्संदेह, ऐसी भाषा के विकास के लिए सबसे जरूरी काम जटिल कानूनी शब्दावली के सरलीकरण और साधारणीकरण का है। यह काम हो जाए तो कानूनों (इसके बावजूद कि विद्वान उन्हें कॉमन सेंस आफ ऐन एवरेज इंटेलीजेंट मैन – एक औसत बुद्धि वाले व्यक्ति का सामान्य बोध- कहते हैं) की जिन बारीकियों और पेचीदगियों को अभी हम बहुत चाहकर भी नहीं समझ पाते, उन्हें समझने के लिए अपवादस्वरूप ही वकीलों और विधिवेत्ताओं के मोहताज रह जाएंगे।

    लेकिन यह स्थिति इतने भर से तो नहीं ही बन जाएगी कि अदालतों के फैसले और कानूनी दस्तावेज क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा दिए जाएं या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करा दिया जाए। अभी मामला इसी स्तर पर पहुंचा है, जबकि यह विश्वास करने के कारण हैं कि अपनी समझ में आने वाली भाषा में कानून और न्याय सुलभ होने के बाद ही लोग न्याय प्रक्रिया में पूरे विश्वास से शामिल हो सकेंगे और उसके सरल एवं पारदर्शी होने का संतोष अनुभव कर सकेंगे। क्योंकि ऐसी भाषा के अभाव में कई बार न न्याय पाने वाला व्यक्ति आसानी से यह समझ पाता है कि न्याय के रूप में उसे क्या मिला है, न ही अन्याय का शिकार यह कि उसकी उसे कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी या उसके प्रतिकार का उपाय क्या है।

    हां, ऐसी भाषा होने का एक और बड़ा लाभ होगा। यह कि कानूनों को ठीक से समझ लिए जाने के बाद लोगों द्वारा उनको तोड़ने की घटनाएं कम होंगी और एजेंसियों के लिए उनका अनुपालन कराना आसान हो जाएगा। साथ ही मुकदमेबाजी कम हो जाएगी।

    लेकिन अभी तो सरकार इस स्थिति की ओट में बैठी है कि संविधान के अनुच्छेद 348(1) में प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट समेत सभी हाईकोर्टों में कार्यवाही अंग्रेजी में होगी। चूंकि गुलामी के लंबे कहर के कारण संविधान निर्माण के वक्त तक हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएं खुद को इतनी सक्षम नहीं बना पाई थीं कि इन कोर्टों की कार्यवाही उनमें चलाई जा सके, इसलिए यह संवैधानिक प्रावधान जरूरी था।

    लेकिन संविधान निर्माता जानते थे कि समय के साथ स्थिति बदलेगी और देशवासी अपनी भाषा में न्याय की अपेक्षा करेंगे। इसलिए उन्होंने उक्त प्रावधान में यह व्यवस्था भी की थी कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों में अंग्रेजी तभी तक कार्यवाही की भाषा रहेगी, जब तक संसद कानून बनाकर उसमें कोई बदलाव न करे।

    सवाल है कि अब जब इस बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है, तो मोदी सरकार कानून बनाकर इसका मार्ग प्रशस्त क्यों नहीं करती? यों तो वह अपने निहित स्वार्थों के लिए संविधान तक को बदल डालने की बात करती रहती है। लोकसभा चुनाव में उसने इसके लिए मतदाताओं से लोकसभा की चार सौ पार सीटें भी मांगी थीं। अलबत्ता, खुदा की तर्ज पर गंजे को नाखून नहीं दिए थे।

    फल यह हुआ है कि न्याय के परिसरों में अभी भी अन्याय की भाषा का ही राज है और उसकी बेदखली भी बात इतने तक ही पहुंची है कि सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी में भी निर्णय दे सकता है। हां, उसके निर्णयों को हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।

    इसके अतिरिक्त जिला और अधीनस्थ अदालतों में संबंधित राज्य सरकारों की क्षेत्रीय भाषाओं और साक्ष्य रिकॉर्ड करने का कार्य स्थानीय भाषाओं में होता है। लेकिन हम जानते हैं कि कानूनी प्रक्रिया की पेचीदगियों को लेकर जनसामान्य के दिल और दिमाग में भरा हुआ डर निकलने वाला नहीं है। उसमें उनका विश्वास तेजी से बढ़कर नई ऊंचाइयां छुए, इसके लिए जिन सदाशयी प्रयत्नों और कदमों की जरूरत है, वे फिलहाल कहीं नहीं दिखाई देते।

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