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    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldApril 29, 2026

    सरकार या पार्टी में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर बीजेपी की कथनी और करनी एकदम अलग है, आखिर ऐसा क्यों?

    आकार पटेल

    Published: 26 Apr 2026, 9:00 PM

    इस महीने छपी एक खबर की हेडलाइन थी: ‘बीजेपी की बंगाल लिस्ट में किसी भी मुस्लिम नाम को जगह नहीं मिली’। इस खबर में पाठकों को आंकड़े भी दिए गए थे—यानी, कितने टिकट बांटे गए आदि, लेकिन इस हेडलाइन के अलावा इस खबर में और कुछ जोड़ने की गुंजाइश नहीं है। हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए यह कोई हैरानी की बात भी नहीं है, क्योंकि 2014 से अब तक के आंकड़ों ने हमें यह सिखा दिया है कि बीजेपी असल में क्या चाहती है।

    पिछली तीन लोकसभाओं में, भारतीय जनता पार्टी ने 282, 303 और 240 सीटें जीती हैं, इनमें कोई भी मुस्लिम नहीं था। राज्यसभा में भी उसके 100 से ज़्यादा सांसद हैं, वहां भी कोई मुस्लिम नहीं है। लगभग एक दशक पहले, यह रिपोर्ट आई थी कि पूरे भारत में उसके एक हज़ार से ज़्यादा विधायक थे, जिनमें से केवल एक मुस्लिम था। केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। यह ऐसी बात है जो हम 1947 के बाद पहली बार देख रहे हैं। फिर भी, इससे हमें कोई हैरानी नहीं होती, क्योंकि अगर बीजेपी की किसी एक बात की तारीफ़ की जा सकती है, तो वह है उसकी ईमानदारी। यह पार्टी—खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले अपने मौजूदा स्वरूप में—इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है कि वह भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को पूरी तरह से बाहर रखना चाहती है, जिसके प्रति उसके मन में ऐतिहासिक रूप से गहरा द्वेष है।

    हमें इस रुख और रवैये के कारणों पर जाने की ज़रूरत नहीं है, बस यह मान लेना चाहिए कि पार्टी और उसके कई समर्थक इस बारे में ऐसा ही महसूस करते हैं। सोचने वाली बात कुछ और है। बीजेपी और खासकर प्रधानमंत्री की इस बहिष्करण (एक्सक्लूज़न) को आगे बढ़ाने के बारे में सोच इतनी स्पष्ट है, फिर भी हम ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ और ‘140 करोड़ भारतीय’ जैसी बातें क्यों सुनते हैं? पार्टी और नेता ईमानदार हो सकते थे और ऐसे नारे बना सकते थे जो उनके व्यवहार की तरह ही बहिष्करण वाले वाले हों, लेकिन वे ऐसा नहीं करते। क्यों?

    इसका जवाब देने के दो तरीके हैं, और पहला तरीका कम पेचीदा है। ये नारे उन लोगों को तसल्ली देने के लिए गढ़े और दोहराए जाते हैं, जो ऐसी बातों को लेकर चिंतित रहते हैं। इन नारों का कोई खास मतलब नहीं होता, क्योंकि बहिष्कार की असलियत हमारे सामने ही है—ठीक उसी रूप में, जिस तरह इसे अमल में लाया जाता है।

    यह जवाब खास तौर पर संतोषजनक नहीं है, क्योंकि यह इस बात पर रोशनी नहीं डालता कि बीजेपी को ऐसा करने की ज़रूरत ही क्यों है—खासकर तब, जब उसके कामकाज में इतनी पारदर्शिता है। यह इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ करता है कि मुसलमानों के बहिष्कार और उत्पीड़न के मामले में पूरी तरह से मुखर और बेबाक होने के अपने ही कृत्यों से, प्रधानमंत्री ने ऐसे कई लोगों का दिल जीत लिया है, जो इसी तरह के व्यवहार और इसी तरह के समाज की चाह रखते हैं।

    पार्टी और प्रधानमंत्री के पाखंड करने पर मजबूर होने का असली कारण यह है कि पूरी तरह से बहिष्कार करने की उनकी चाहत भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति के साथ मेल नहीं खाती। अपने घोषणापत्र में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसी बातें कौन कहता है? यह न तो विपक्ष है और न ही बुद्धिजीवी वर्ग; यह बीजेपी है। जब अपनी चीज़ों का प्रचार करने की बात आती है, तो यह भारतीय ज्ञान-परंपरा का सहारा लेती है, जबकि असल में यह कुछ और ही बेच रही होती है।

    बीजेपी की असली पेशकश के लिए वोटरों का एक वर्ग बेशक मौजूद है, लेकिन यह बीजेपी के कुल वोटरों की संख्या से छोटा है। इसी वजह से ‘विकास’ पार्टी के एजेंडे का इतना बड़ा हिस्सा रहा है—या कम-से-कम पहले तो था ही। औपचारिक बयानों में, और खासकर जब दुनिया के सामने बात रखने की बारी आती है, तो अपने तीखे तेवर छिपाकर रखने पड़ते हैं। हमारे बेचारे राजनयिकों को इसी दुविधा से जूझना पड़ता है: अपने देश में तो वे सख़्ती से पेश आते हैं, लेकिन विदेश में उदार होने का दिखावा करते हैं।

    अमेरिका की अपनी एक यात्रा के दौरान, विदेश मंत्री जयशंकर ने डोनाल्ड ट्रम्प के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जनरल एच.आर. मैकमास्टर के साथ एक इंटरव्यू किया। जनरल, जो भारत से भली-भांति परिचित हैं और यहां का दौरा भी कर चुके हैं, उन्होंने जयशंकर से यह सवाल पूछा: ‘मैं आपसे यह जानना चाहता था कि आप अपने ही देश में हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को किस नज़र से देखते हैं। आप कोई पक्षपाती व्यक्ति नहीं हैं। आपने कई अलग-अलग प्रशासनों के तहत अत्यंत विशिष्टता के साथ अपनी सेवाएँ दी हैं।’

    “महामारी के बीच, हिंदुत्व से जुड़ी कुछ ऐसी नीतियों को लेकर चिंता जताई जा रही है, जो भारतीय लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कमज़ोर कर सकती हैं… और क्या भारत के दोस्तों की इन हालिया रुझानों को लेकर चिंता जायज़ है?” जयशंकर ने इस सवाल का सीधा जवाब देने से परहेज़ किया, और इसके बजाय उन्होंने यह बताना शुरू कर दिया कि राशन का वितरण और नकद राशि का हस्तांतरण किस तरह किया गया। उन्होंने हिंदुत्व नीतियों से जुड़ी उस विशिष्ट समस्या पर कोई बात नहीं की, जिसके बारे में मैकमास्टर ने पूछा था।

    ये क्या हैं? ये भारत द्वारा नागरिकता में धर्म को शामिल करना है। ये ऐसे नए कानून हैं जो मुस्लिम विवाह और मुस्लिम तलाक़ को अपराध बनाते हैं; या ऐसे नए कानून हैं जो बीफ़ रखने को अपराध बनाते हैं; गुजरात में कानून के ज़रिए मुसलमानों को ज़बरदस्ती एक ही जगह (घेरे में) सीमित करना; भारत के सिर्फ़ एक हिस्से — कश्मीर — में भीड़ पर शॉटगन का इस्तेमाल; और सरकार द्वारा मुसलमानों को खलनायक के तौर पर पेश करना, जिसमें कोविड फैलाने का आरोप भी शामिल है।

    ये वही बातें थीं जिनके बारे में भारत के दोस्त चिंतित थे। जयशंकर ने मैकमास्टर को जवाब देते समय एक बार भी ‘हिंदुत्व’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, और न ही उन कानूनों का ज़िक्र किया जिनके लिए दुनिया भर में भारत की आलोचना हो रही थी। ज़ाहिर है, इस बहस से उनके पीछे हटने की वजह यही थी कि उनके पास इसका कोई बचाव नहीं था। इस आरोप का जवाब देने का एकमात्र तरीका बात को घुमाना और मुद्दे से बचना ही था—और यह आरोप बिल्कुल सही था—कि भारत हिंदुत्व के ज़रिए खुद को और अपने ही लोगों को नुकसान पहुँचा रहा है।

    इससे उन लोगों को कुछ उम्मीद मिलनी चाहिए—भले ही वह बहुत थोड़ी ही क्यों न हो—जो हमारे समाज को लेकर, और इस बात को लेकर कि वह आज किस मुकाम पर आ पहुंचा है और किस दिशा में आगे बढ़ रहा है, सही ही चिंतित रहते हैं। अगर वे लोग भी, जो भारतीयों को धर्म के आधार पर सफलतापूर्वक बांट देते हैं, चुनौती मिलने पर अपने विश्वासों पर डटे रहने में असहज महसूस करते हैं, तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि अंततः हम यही नहीं चाहते और असल में हम ऐसे हैं भी नहीं।

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