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    विष्णु नागर का व्यंग्यः मोहन भागवत का सामूहिक भोज, दलितों को तो कपड़ों से ही पहचान लिया होगा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldFebruary 23, 2026

    सड़कों पर गुंडागर्दी करने के लिए हर मोड़ पर बजरंग दल वाले मिल जाएंगे मगर जहां कोई दलित- आदिवासी पिट रहा होगा, उसे घसीटा जा रहा होगा, मार खिलाई जा रही होगी, उसका घर तोड़ा जा रहा होगा, वहां हिंदुत्व के ये ‘वीर सपूत’ न जाने कहां छुपे होते हैं।

    विष्णु नागर

    Published: 22 Feb 2026, 7:59 AM

    आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सवर्ण, पिछड़ा और दलित समाज के प्रतिनिधियों के साथ गोरखपुर में सामूहिक भोज किया। बहुत बड़ा पुण्य कार्य किया! आजकल इतना बड़ा और इतना साहसिक कदम इस देश में कौन उठाता है मगर उनकी हिम्मत देखिए, उन्होंने यह  कर दिखाया! इस बात पर तालियां बजनी चाहिए!

    तालियां अगर बज चुकी हों तो हम आगे बढ़ें। भागवत जी ने सब आमंत्रितों की सबसे पहले उनकी जाति से उनकी पहचान की होगी! उन्हें किसी का धर्म जानने की जरूरत नहीं थी क्योंकि सब उनकी तरह के ‘हिंदू’ थे! यूं तो वे मुसलमानों को भी अपने भाषणों में ‘हिंदू’ बताते हैं। उनके अनुसार भारतभूमि में जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है। सबका डीएनए एक है मगर उन्होंने इन वाले ‘हिंदुओं’ को भोज पर नहीं बुलाया! उन्होंने सिखों और बौद्धों को भी नहीं बुलाया! जब मुसलमान उनके लिए हिंदू हो सकते हैं तो ये तो उनसे डबल-ट्रिपल हिंदू हैं मगर ये सब भाषण करने और इंटरव्यू देने के लिए ‘हिंदू’ हैं, बाकी क्या हैं, आप समझते हैं!

    भोजन से पहले भागवत जी को बताया गया होगा कि ये शर्मा जी या मिश्रा जी हैं, ये अग्रवाल साहब हैं या गुप्ता जी हैं, ये सिंह साहब हैं या राजपूत साहब हैं। ये सब सवर्ण हैं, इतना तो भागवत जी जानते ही हैं! जहां तक दलितों की बात है, महामानव जी ने एक बार मुसलमानों के बारे में ज्ञान दिया था कि उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है, उसी फार्मूले से दलितों को भागवत जी ने उनके कपड़ों से ही पहचान लिया होगा! महामानव जी का यह फार्मूला इतना सीधा और सरल है कि चार साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान करवा दिया जाए तो वह सड़क चलते दलितों और मुसलमानों को भी ‘पहचान’ लेगा! वैसे महामानव जी की भी असली पहचान उनके पल-पल बदलते कपड़े हैं!

    यह तो नहीं पता कि भोजन के लिए किस-किस जाति के कितने-कितने प्रतिनिधि बुलाए गये थे और किसे, कहां बैठाया गया था! हो सकता है कि सारे सवर्ण एक साथ बैठाए गए हों। संभव यह भी है कि सवर्णों को भी वर्ण व्यवस्था के क्रम से बैठाया गया हो, ताकि सबकी पहचान सुरक्षित रहे, किसी तरह का उनमें घालमेल न हो! आजकल ऐसी गड़बड़ियां काफी होने लगी हैं।अंत:धार्मिक ही नहीं, अंतर्जातीय विवाह भी अब बहुत होने लगे हैं। इस कारण हिंदू वर्ण-व्यवस्था खतरे में पड़ गई है! ऐसे लड़के-लड़कियों की कभी-कभार हत्या कर दी जाती है और कभी-कभी उन्हें आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया जाता है, फिर भी यह सिलसिला थमता नहीं!

    भोजन की इस व्यवस्था के कारण भागवत जी के लिए हरेक की जाति पहचानना आसान रहा होगा! शर्मा जी को सिंह साहब समझने की गलती उनसे नहीं हुई होगी! इस तरह इन जातिवीरों की ‘भावनाएं’ सुरक्षित रही होंगी! आजकल हिंदुओं का एक वर्ग बेहद ‘भावना-प्रधान’ हो चुका है! और इन भावनाओं का एकमात्र काम भड़कना है। इन भावनाओं की भड़कने से रक्षा करना  इक्कीसवीं सदी के चौथाई भाग में इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि लोग अपनी बेटी तक की जान ले लेते हैं!

    भोजन के दौरान संभव है कि भागवत जी ने यह पूछा हो कि कहिए, शर्मा जी, भोजन तो आपको ठीक लगा न! आप ब्राह्मणों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शाकाहारी भोजन बनवाया गया है।  रसोइया भी ब्राह्मण ही है, ताकि आपका धर्म भ्रष्ट न हो! प्याज़-लहसुन को हमारे यहां तामसिक माना गया है, इसलिए उनका भी उपयोग नहीं किया गया है। और गुप्ता जी, आपको तो यह सादा भोजन शायद ही रुचा हो! इसमें केवल दो ही मिठाइयां हैं! इससे आपको कहां संतोष होने वाला! और सिंह साहब, शाकाहारी भोजन तो आपको क्या ही पसंद आया होगा, इसके लिए मैं आपसे अब क्षमा ही मांग सकता हूं। फिर हंसकर कहा होगा कि सच्चे हिंदुओं की संगत में आदमी कष्ट भी आराम से झेल लेता है!

    फिर उन्होंने शायद यह भी बताया हो कि ‘हिंदू एकता’ के लिए उनके स्वयंसेवकों ने पिछले सौ वर्षों में न जाने कितनी तरह के कितने कष्ट भोगे हैं! परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने यह नहीं कहा होगा कि इन कष्टों में वैसे एक कष्ट दलितों के साथ भोजन करना भी है! उन्होंने वाल्मीकि जी से भी पूछा होगा कि भोजन तो रुचिकर है न! इसके आगे यह कहने से उन्होंने स्वयं को रोका होगा कि आप लोगों को ऐसा भोजन तो यदा-कदा ही मिलता होगा! आप संघ से जुड़े रहिए, जब कभी हम समरसता भोज का आयोजन करेंगे, आपको अवश्य आमंत्रित करेंगे!

    मित्रो, उस भोज का यह विवरण काल्पनिक है मगर उतना काल्पनिक भी नहीं है! कुछ वास्तविक आधार है इसका! संघ और बीजेपी के नेता दलितों के घर भोजन करने का ड्रामा बहुत समय से कर रहे हैं। एक बार कर्नाटक के इनके एक बड़े नेता ने किसी आला होटल से अपने और अपने भक्तों के लिए बढ़िया सा नाश्ता मंगवाया और उसे दलित की झोपड़ी में ग्रहण किया क्योंकि उस समय दलित-दलित खेलने का बीजेपी-संघ का कार्यक्रम जोरों से चल रहा था!

    दलित पति-पत्नी इनके चरणों में बैठे इन्हें मुग्धभाव से इन्हें खाते हुए देखते रहे और ये गपागप खाते रहे!संघ की समरसता इससे आगे जा भी नहीं सकती! नाश्ता चूंकि किसी ऊंची होटल से आया था तो इसे दलित परिवार के सदस्यों के साथ साझा करना अनुचित होता,क्योंकि इससे उनकी आदत बिगड़ जाती! इससे ‘सामाजिक समरसता’ अभियान खतरे में पड़ जाता! नेता जी ने भक्षण किया, फोटो खिंचवाया और बड़ी सी गाड़ी में फुर्र हो गए!

    खाने के बाद की लंबी डकार भी नेताजी ने शायद वहीं ली होगी और इतनी जोरदार रही होगी कि पूरा झोपड़ा हिल गया होगा मगर टीवी के न्यूज़ चैनल वाले और अखबार वाले इस तरह की जरूरी बातें नहीं बताते! बताते तो यह खबर इतनी धांसू बन सकती थी कि किसी- किसी कन्नड़ अखबार में तो यह उस दिन की पहली खबर होती!

    इसी तरह बीजेपी के दिल्लीवासी एक उड़िया सांसद जी का मन भी एक आदिवासी के यहां भोजन करने का हुआ! चुनाव के समय नेताओं के मन में अकसर क्रांतिकारी भाव पैदा हो जाते हैं! उन्होंने बढ़िया सी लिपी-पुती झोपड़ी में जमीन पर बैठकर पांच-छह तरह के सुस्वादु व्यंजनों का अकेले-अकेले स्वाद लिया। जिस आदिवासी के यहां वह भोजन कर रहे थे, उसके परिवार के लोगों की तरफ उनकी पीठ थी! उस आदिवासी परिवार की तीन बच्चियां और दो बूढ़ी औरतें बड़ी हसरत से उस भोजन और उस सांसद का भकोसन कार्यक्रम देखती रहीं मगर सांसद जी को इससे अंतर नहीं पड़ा! उनकी भूख, सुस्वादु भोजन की उनकी लालसा को जानने-समझने की उन्हें न फुरसत थी, न इच्छा! उन्हें तो राजनीतिक प्वाइंट स्कोर करना था! उन्होंने फोटो खिंचवा लिया था, उसे वायरल करवा दिया था। बन चुका था उनका काम! हो गया था, जयश्री राम!

    तो दलित या आदिवासी के घर खाने का नाटक तो ये बढ़िया ढंग से कर लेते हैं, उसकी खबर भी ढंग से छपवा लेते हैं, टीवी पर दिखवा भी लेते हैं मगर जब किसी दलित लड़की को किसी आंगनबाड़ी में रसोइये का काम मिल जाता है तो छूआछूत के मारे इस समाज के लोग तीन महीने तक अपने बच्चों को वहां नहीं भेजते, ताकि इस भोजन से उनकी जाति भ्रष्ट न हो! ऐसे समय सामाजिक समरसता के ये सिपाही न जाने कहां छूमंतर हो जाते हैं!

    जब कहीं दलित लड़के से थूक चटवाया जाता है, उसके कपड़े उतारकर उसके साथ कुकर्म करने की कोशिश की जाती है, वहां भी समरसतावादी दूर-दूर तक नज़र नहीं आते! कोई दलित लड़का ग़लती से तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के घर में चला जाता है और उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह आत्महत्या कर लेता है, तब भी हिंदू एकता के हिमायती किसी बिल में घुसे पाए जाते हैं!

    दलितों में इन्हें हिंदू के दर्शन नहीं होते! उस समय वे किसी मस्जिद के आगे डीजे बजा रहे होते हैं या भगवा फहरा रहे होते हैं या हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे होते हैं! जब किसी दलित लड़के को मूत पिलाया जाता है तो ये गली-गली में हिंदू सम्मेलन करने में व्यस्त रहते हैं। सड़कों पर गुंडागर्दी करने के लिए हर मोड़ पर बजरंग दल वाले मिल जाएंगे मगर जहां कोई दलित- आदिवासी पिट रहा होगा, उसे घसीटा जा रहा होगा, मार खिलाई जा रही होगी, उसका घर तोड़ा जा रहा होगा या उसके जंगल कटवाए जा रहे होंगे, वहां हिंदुत्व के ये ‘वीर सपूत’ महाराणा प्रताप और शिवाजी कै वंशज न जाने कहां छुपे होते हैं कि अंतरिक्ष में लगी दूरबीन से भी दिखाई नहीं देते!

    जब दिल्ली में एक लड़की दलितों का मज़ाक़ बनाते हुए उनसे कह रही थी कि पांच हजार साल से तुमने पानी नहीं पिया होगा, आओ मैं तुम्हें पानी पिला दूं तो एक भगवा भी उस मुंहजोर को जवाब देने आगे नहीं आया! ऐसा ‘महान’ है यह हिंदुत्व, जिसके सौ साल का उत्सव आजकल जोर और शोर से मनाया जा रहा है!

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