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    लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: आखिर क्यों उठाना पड़ा विपक्ष को ऐसा कदम

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMarch 10, 2026

    अविश्वास प्रस्ताव पर जब मंगलवार को चर्चा शुरु हुई तो आसन पर बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल विराजनमान हैं। सवाल यहां यह भी उठता है कि स्पीकर ने पिछले सात सालों से लोकसभा को डिप्टी स्पीकर चुनने की अनुमति क्यों नहीं दी है?

    ए जे प्रबल

    Published: 10 Mar 2026, 4:20 PM

    अभी पिछले हफ़्ते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओम बिरला को एक बेहतरीन सांसद और एक उत्कृष्ट लोकसभा अध्यक्ष कहते हुए उनकी तारीफों के पुल बांधे। हो सकता है पीएम को बिरला के लिए ऐसे शब्द इसलिए जरूरी लगे हों क्योंकि वे राजस्थान के कोटा में लोगों से बात कर रहे थे और कोटा ओम बिरला का निर्वाचन क्षेत्र है। वैसे यह कोई छिपा रहस्य नहीं है कि ओम बिरला पर प्रधानमंत्री का वरदहस्त है और ओम बिरला को भी प्रधानमंत्री पर पूरा भरोसा है।

    याद होगा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का वह भाषण जिसमें उन्होंने याद दिलाया था लोकसभा अध्यक्ष उनसे मिलते समय तो सीधे खड़े रहते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री से मिलते समय वे सम्मानपूर्वक झुकते हैं। हालांकि यह टिप्पणी हल्के-फुल्के अंदाज़ में की गई थी, लेकिन यह कोई छिपी बात नहीं है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला प्रधानमंत्री को सदन के किसी भी अन्य सदस्य की तुलना में कहीं अधिक छूट देते हैं।

    बीते वर्षों के दौरान अकसर यह देखा गया है कि जब सत्तापक्ष के सांसद सदन में ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते हैं तो ‘भारत माता की जय’ का जयकारा लगाते हैं तो लोकसभा अध्यक्ष उन्हें नहीं टोकते और उन्होंने कभी भी किसी सत्तापक्ष के सांसद के खिलाफ कभी कोई फैसला नहीं दिया। इसके विपरीत वह विपक्ष को लगातार यह याद दिलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते कि सदन नियमों से चलता है।

    अभी पिछले महीने की ही तो बात है जब ओम बिरला ने ही ऐलान किया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री को लोकसभा में उपस्थित न होने की सलाह दी थी और उन्हें सदन के भीतर उन पर होने वाले काल्पनिक और कथित हमले के खतरे के बारे में आगाह किया था। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि उन्होंने किस आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाला। दुर्भाग्यवश, लोकसभा अध्यक्ष के पद की उतनी बारीकी से जांच-परख नहीं होती है जितनी कि होनी चाहिए। मीडिया का ध्यान तो कहीं और ही रहता है, जबकि कुछ ही लोग हैं जो फ़ैसलों, टिप्पणियों और आचरण को याद रखते हैं या उन पर सवाल उठाते हैं।

    ओम बिरला की अध्यक्षथा में लोकसभा की सबसे कम बैठकें हुई हैं। स्पीकर के तौर पर उनके कार्यकाल में विपक्षी सांसदों को सबसे ज़्यादा बार निलंबित किया गया है। यह भी एक रिकॉर्ड है कि उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के किसी भी सांसद को निलंबित नहीं किया, यहां तक कि बीजेपी के पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी को भी नहीं, जिन्होंने एक मुस्लिम सांसद को संसद में बुरा भला कहने के लिए सांप्रदायिक गालियों का इस्तेमाल किया था। यह भी रिकॉर्ड में है कि उन्होंने विपक्ष द्वारा लाए गए एक भी स्थगन प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया; उन्होंने पेगासस स्पाइवेयर द्वारा जासूसी, हिंडनबर्ग द्वारा लगाए गए अडानी के स्टॉक और मूल्यांकन में हेरफेर के आरोपों, किसानों के विरोध प्रदर्शन या मणिपुर संकट जैसे मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं दी।

    ओम बिरला ही लोकसभा अध्यक्ष थे जब कुछ युवा लोकसभा की सुरक्षा तोड़कर सदन में पहुंच गे थे और विज़िटर्स गैलरी से पर्चे फेंके और किसी तरह का फ़ोम स्प्रे किया। इस मुद्दे पर भी स्पीकर ने किसी भी चर्चा की अनुमति नहीं दी और उन 99 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया, जिन्होंने अनुमति न दिए जाने का विरोध किया था। लोकसभा की नियम समिति की 2019 से 2022 के बीत एक बार भी बैठक नहीं हुई। इस समिति के अध्यक्ष स्वंय स्पीकर ओम बिरला हैं। इसके अलावा 2022-24 के बीच केवल एक बार ही इस समिति की बैठक हुई।

    अपने कार्यकाल के दौरान ओम बिरला ने सरकार को मनमर्जी से कोई भी बिल जब चाहे तब पेश करने की खुली छूट दे रखी है। कभी तो सत्र के आखिरी दिन भी सरकार को ऐसे करने की आज़ादी दी गई, जबकि सांसदों को इन बिलों को पढ़ने तक का समय नहीं दिया गया।  2023 के शीतकालीन सत्र में, विपक्ष के 146 सांसदों के निलंबन के महज़ तीन दिनों के भीतर ही 14 बिल पास कर दिए गए। उसी साल के मॉनसून सत्र में, लोकसभा ने एक हफ़्ते के अंदर सात बिल पास किए, जिन पर चर्चा के लिए औसतन सिर्फ़ 21 मिनट का समय दिया गया। विवादित ‘वन संरक्षण संशोधन बिल’ लोकसभा में महज़ 33 मिनट के अंदर पास कर दिया गया, और उस पर बोलने की अनुमति सिर्फ़ चार सांसदों को ही दी गई। ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल’ पर तो सिर्फ़ 40 मिनट तक ही बहस हुई।

    कांग्रेस के पवन खेड़ा आरोप लगाते हैं कि स्पीकर ने न केवल केंद्र सरकार के पूरे बजट को सदन में बिना किसी चर्चा के पारित होने दिया, बल्कि 35 प्रतिशत बिल भी एक घंटे से भी कम समय की चर्चा के साथ पारित कर दिए गए। खेड़ा ने दावा किया कि ओम बिरला के कार्यकाल में 20 प्रतिशत से भी कम बिल विस्तृत जांच के लिए संसदीय समितियों को भेजे गए।

    यह ओम बिरला ही थे जिन्होंने सदन से निलंबित सांसदों द्वारा पूछे गए सवालों को रिकॉर्ड से हटा दिया और सरकार को उनके जवाब देने की तकलीफ से बचा लिया। लोकसभा का ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है जो इसकी अनुमति देता हो, लेकिन संसदीय निगरानी संस्था ‘माध्यम’ ने बताया कि इसमें स्पीकर के विशेषाधिकार या मर्जी का ही बोलबाला रहा। ‘माध्यम’ ने संसद टीवी द्वारा विपक्ष पर सेंसरशिप के कई मामलों को भी उठाया है और ओम बिरला की देखरेख में, विरोध-प्रदर्शनों के बीच पारित किए गए विधेयकों की संख्या की ओर ध्यान दिलाया—ऐसे समय में जब सदन में कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था।

    बताया गया है कि यूं तो स्पीकर ही ‘कार्य मंत्रणा समिति’ (बिजनेस एडवाइजरी कमेटी) के अध्यक्ष होते हैं, जो हर दिन के लिए सदन का एजेंडा तय करती है, फिर भी सरकार नियमित रूप से इस एजेंडे से इतर कार्यवाही करती है और अध्यक्ष ऐसा होने देते हैं। इसी क्रम में सरकार बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक विधेयक ले आती है, ताकि सांसदों को चौंकाया जा सके।

    कुल मिलाकर, और जब यह रिपोर्ट तैयार की जा रही है, तब भी लोकसभा में स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा जारी है; ऐसे में स्पीकर के तौर पर ओम बिरला का रिकॉर्ड कतई भी सराहनीय नहीं कहा जा सकता।

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