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    पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उदय के मायने

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 9, 2026

    यह बंगाल का तीसरा उपनिवेशीकरण है। राज्य पर अपनी अमूर्त संपदा- यानी विचारों और अभिव्यक्ति से नियंत्रण खोने का खतरा मंडरा रहा है। उसे अपनी उस बौद्धिक संस्कृति में एक हिंसक और भयानक बदलाव से जूझना पड़ रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से बहस-असहमति पर ही फली-फूली है।

    जागोती बागची

    Published: 09 May 2026, 5:00 PM

    बचपन की सुबहें हमेशा एक नए दिन के वादे से कहीं ज्यादा लेकर आती थीं। उनका मतलब होता था अखबार, राजनीति पर चर्चा और आकाशवाणी पर गूंजता रबींद्र संगीत। बीते तमाम वर्षों में पहली बार 5 मई 2026 की सुबह यह सारी चीजें इतनी दूर की लगने लगीं, मानो किसी और ही जिंदगी का अवशेष हों।

    आजाद बंगाल में पहली बार एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई है। विडंबना यह कि मेरा ही राज्य इस पार्टी का वैचारिक उद्गम स्थल रहा। जैसे-जैसे इसका शैशव का सफर आगे बढ़ा, हिन्दू महासभा से जनसंघ और फिर वयस्क रूप में भारतीय जनता पार्टी में बदलते हुए बंगाल पर राज करने का अपना सपना पूरा करने में इसे सौ साल लग गए।

    यह सब मेरे दिल के बहुत करीब है। मैं पहली पीढ़ी की एक शरणार्थी की बेटी हूं। मेरे पिता को स्थिरता विरासत में नहीं मिली। उन्होंने इसे खुद बनाया था- अपना घर, गुलाब का अपना बगीचा और अपनी ट्रॉफियां खोने के बाद। वह अकेले नहीं थे; उन लाखों लोगों में से एक थे जिन्होंने उपमहाद्वीप के इतिहास में उथल-पुथल भरे दौर में सीमाएं नापी थीं। पश्चिम बंगाल पहुंचकर, एक जीवित बचे इंसान के तौर पर, वह अपने पैरों तले की जमीन और सिर पर छत की तलाश में थे। बंगाल सिर्फ एक जगह नहीं, एक संभावना थी। भाषा, संस्कृति और समुदाय के जरिये बंगाल ने विस्थापन के गहरे जख्मों के बाद, निरंतरता का एक नाज़ुक मगर सच्चा एहसास दिया।

    बड़ी होती हुई, मैंने वह विस्थापन सीधे-सीधे महसूस नहीं किया, लेकिन उसकी यादों के साथ जीती रही। आज जब बीजेपी सत्ता में आई है, राजनीति की भाषा ऐसी बदल चुकी है जो जानी-पहचानी-सी लगती है। इसलिए नहीं कि मैं उन्हें पहले जी चुकी हूं, बल्कि इसलिए कि मुझे यह याद विरासत में मिली है कि वे बातें हमें कहां तक ले जा सकती हैं। ‘अपना न होने’ का वह बेहद गहरा, जाना-पहचाना खौफ। वे शब्द, वह लहजा। पहचान, नागरिकता, सुरक्षा, अपनापन- यह अब महज सामान्य शब्द नहीं हैं। इनके निहितार्थ ऐसे हैं जो शासन-प्रशासन से कहीं आगे बढ़कर हमारे जीवन के वास्तविक अनुभवों तक पहुंचते हैं। जिस किसी के भी पारिवारिक इतिहास की जड़ें विस्थापन में निहित हैं, उसके लिए ये कोई दूर की बहसें नहीं हैं। उनके लिए ये बेहद निजी मामले हैं।

    यह बदलाव, जिसे कई लोग ‘रीकैलिब्रेशन’ कह रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा है। मेरे लिए, यह बंगाल का फिर से उपनिवेशीकरण है। उपनिवेशीकरण का मतलब महज किसी इलाके पर कब्जा करना नहीं होता; इसका मतलब होता है लोगों पर कब्जा करना। एसआईआर ने दमन का माहौल बना दिया। विस्थापन की यादें ताजा कर दीं- वह लगातार सताने वाला डर कि कभी भी, बिना किसी चेतावनी के, हमें अपना घर छोड़कर जाने के लिए तैयार रहना होगा।

    एसआईआर ने एक सोची-समझी, चुनिंदा किस्म की बेदखली शुरू कर दी है। कोलकाता और सुंदरबन के आस-पास के इलाकों की अपनी यात्राओं में  मैंने लोगों, खासकर महिलाओं की बेबसी करीब से देखी। एक यात्रा के दौरान मैंने एक छोटी बच्ची को अपनी दादी की साड़ी पकड़े हुए देखा; वे दोनों एक लोकल ट्रेन के डिब्बे के दरवाजे पर खड़ी थीं। पता चला कि एसआईआर द्वारा चुनावी सूची से नाम काट दिए जाने के बाद, उस महिला ने अपनी जान लेने की कोशिश की थी, लेकिन बच गई। शायद उस छोटी बच्ची ने उसे इसलिए थाम रखा था, ताकि उसे उन चीजों से जोड़े रख सके जो अब भी मायने रखती थीं- परिवार, प्यार और अपना समाज। 5 मई की सुबह वह तस्वीर मेरे जहन में एक बार फिर, बेहद साफ और स्पष्ट रूप से उभर आई।

    अपनी भावनाओं को समझ पाना आसान नहीं था। कभी निराशा, कभी गुस्सा, लेकिन ज्यादातर, जैसे-जैसे दिन बीतता गया, हताशा। मैंने बार-बार चुनावों के महत्व पर सवाल उठाया, उसके महत्वहीन हो जाने पर अफसोस जताया। मुझे उम्मीद थी कि यह दिन भी बाकी दिनों की तरह बीत जाएगा। सोच रही थी कि जब सब कुछ शांत हो जाएगा, तो क्या मैं भी चुपचाप इसे ‘किस्मत’ मानकर स्वीकार कर लूंगी।

    बंगाल में अल्पसंख्यकों के लिए पहचान ऐतिहासिक रूप से कई परतों वाली रही है, लेकिन इससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर कोई खास खतरा नहीं रहा है। 5 मई को मैंने यह बुनियादी सच बदलते देखा- जरूरी नहीं कि उनके अधिकार छीनकर ही, बल्कि उनमें यह एहसास जगाकर कि इस देश से जुड़े होने के उनके अधिकार का फिर से मूल्यांकन हो रहा है। बेदखली का खतरा तो पहले से ही मौजूद था। उसमें विस्थापन का खतरा भी जुड़ गया है।

    बंगाल के अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों, ईसाइयों और छोटे भाषाई या जातीय समूहों के लिए ऐसे राजनीतिक बदलाव गहरे मायने रखते हैं। ये समुदाय लंबे समय से राज्य के सामाजिक ताने-बाने का अभिन्न अंग रहे हैं। उनकी मौजूदगी कोई मामूली बात नहीं है; बल्कि यह उस राज्य का मूल तत्व है, जो कभी हुआ करता था।

    बदलाव वैसी बयानबाजी के रूप में आया जिसने शक पैदा किया, ऐसे प्रशासनिक तौर-तरीकों के रूप में जो असमान लगे, और एक व्यापक नैरेटिव के रूप में जिसने कुछ खास पहचानों को अनिश्चित या शर्त आधारित बना दिया। यह बदलाव सूक्ष्म, लेकिन हर जगह मौजूद था- आसानी से अपनापन महसूस करने और हक जताने की भावना से हटकर, अब यह शर्तों के साथ सामने आ रहा था। बेदखली और विस्थापन का डर बढ़ता जा रहा था- जो हमेशा नीतियों से व्यक्त नहीं होता, बल्कि अनिश्चितता के माहौल में महसूस होने लगता है।

    संभव है कि मौजूदा हालात उथल-पुथल वाले लगें, और उम्मीद जगे कि यह दौर भी गुजर जाएगा। लेकिन भारत के अन्य हिस्सों के अल्पसंख्यकों के अनुभवों से पता चलता है कि ऐसी स्थितियां एक ‘न्यू नॉर्मल’ बन सकती हैं।

    मुझे एक अजीब-सी घबराहट महसूस हुई, मानो कोई तूफान आने को हो, जो मेरी हर उस चीज को तबाह कर देगा जो मुझे प्यारी थीं। जैसे-जैसे दिन ढलकर शाम में बदला, और फिर रात आई- जो कभी खत्म न होने वाली-सी लग रही थी, मैं उस तबाही को दहशत भरी नजरों से देखती रही। सोशल मीडिया रातों-रात नफरत और ‘तुमने क्या किया’ वाली बहसों के एक बदबूदार गटर में तब्दील हो चुका था।

    महिला उम्मीदवारों के साथ की गई बदतमीजी मेरे लिए सबसे ज्यादा खौफनाक थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, कम-से-कम मेरे बंगाल में तो नहीं। कई महिलाएं, जो बीजेपी की ज्यादतियों के खिलाफ खुलकर बोलती रही थीं, उन्हें अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल बंद करने पड़े। धमकियां इतनी घिनौनी थीं कि, बेमानी था कि वे सिर्फ वर्चुअल थीं। रील्स में ऐसे पुरुष और लड़के दिखाए गए जिन्होंने ममता बनर्जी का रूप धरा हुआ था और जिन्हें नंगा करके पीटा जा रहा था। तो, बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की यही असल सोच है!

    पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक स्थल लंबे समय से राजनीतिक अभिव्यक्ति का जरिया रहे हैं। लेकिन आज ये जगहें बीजेपी के गुंडे-बदमाशों के कब्जे  में हैं, जिन्हें पार्टी ने बंगाल पर जबरदस्ती कब्जा करने के लिए बाहर से बुलाया है।

    यह कोई ‘पुनर्समायोजन’ नहीं है। यह बंगाल का तीसरा उपनिवेशीकरण है। राज्य पर अपने संसाधनों और अपनी अमूर्त संपदा- यानी विचारों और अभिव्यक्ति पर से नियंत्रण खोने का खतरा मंडरा रहा है। उसे अपनी उस बौद्धिक संस्कृति में एक हिंसक और भयानक बदलाव से जूझना पड़ रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से बहस और असहमति पर ही फली-फूली है।

    मेरे लिए, 5 मई की सुबह वैसी रही मानो एक धागा था, जो टूट गया। मैं खुद को थामे रखने की कोशिश कर रही हूं- ठीक उस छोटी बच्ची की तरह, जो अपनी दादी की साड़ी को कसकर थामे रहती है।

    (जागोती बागची एक राजनीतिक और लैंगिक अधिकार कार्यकर्ता हैं।, जिनकी पृष्ठभूमि कानून और फोरेंसिक एंथ्रोपोलॉजी में है। वर्तमान में उनका ज़्यादा समय कोलकाता और कंपाला में बीतता है)

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