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    हिन्दू राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का तीव्र अवमूल्यन

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 16, 2026

    पिछले एक दशक के घटनाक्रम और बीजेपी की कारगुजारियों से हमें यह पता लगता है कि यह पार्टी हमारे लोकतांत्रिक चरित्र को तहस-नहस करने पर तुली हुई है, जो हमने अपने स्वतंत्रता आंदोलन में कई मुसीबतों को झेलते हुए विकसित किया था।

    राम पुनियानी

    Published: 15 May 2026, 7:59 AM

    हाल में आए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों की ब्रेसब्री से प्रतीक्षा की जा रही थी। असम में परिसीमन से हिमंता बिस्व सरमा को एक बार फिर विधानसभा चुनाव जीतने में मदद मिली। उनका जोर मुख्यतः घुसपैठियों पर था और साथ ही अन्य कई नफरत फैलाने वाले नारे भी उछाले गए। बंगाल में ऐसा लग रहा था कि चुनाव नहीं हो रहे हैं बल्कि बंगाल पर आक्रमण कर दिया गया है। पहले चुनाव आयोग और बाद में करीब ढ़ाई लाख अर्धसैनिक बलों की तैनाती से बीजेपी के लिए काफी अनुकूल स्थितियां बन गईं। यह विडंबना ही है कि इन बलों की सबसे अधिक जरूरत मणिपुर में थी।

    बंगाल में बीजेपी की जीत के साथ उनकी नाक के नीचे जीत का जश्न मनाया गया और व्यापक हिंसा हुई। राज्य में इन बलों की तैनाती का उद्देश्य क्या था और इन्होंने कौन सी भूमिका अदा की, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। केन्द्रीय गृह मंत्री स्वयं कई हफ्तों तक बंगाल में रहे। चुनाव के ठीक पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बंगाल का लंबा दौरा किया और आरएसएस के सभी अनुषांगिक संगठनों को हिन्दू एकता के काम में लगा दिया। तब तक ‘हिन्दू खतरे में है‘ का नारा ‘समाज के व्यापक नजरिए‘ का हिस्सा बन चुका था। भागवत की यात्रा का अधिक प्रचार नहीं किया गया लेकिन वह राज्य में बीजेपी के चुनाव जीतने के प्रयासों की पृष्ठभूमि बनी।

    केरल और तमिलनाडु राज्यों में मतदाता बीजेपी के प्रोपेगेंडा से अधिक प्रभावित नहीं हुए, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन राज्यों में कई रैलियां कीं। मोदी एंड कंपनी ने इन चुनावों को कितना महत्व दिया यह इस तथ्य से जाहिर होता है कि ‘दिन में 18 घंटे काम करने वाले‘ प्रधानमंत्री एक महीने से अधिक समय के दौरान अपने कार्यालय नहीं गए।

    इन चुनावों में लोगों की नजरें सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल पर केन्द्रित थीं। यहां सत्ता विरोधी भावनाओं के अतिरिक्त एसआईआर से लेकर बड़े पैमाने पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती तक बीजेपी द्वारा रची गई कई साजिशों का भी तृणमूल कांग्रेस के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यहां चुनाव आयोग की भूमिका भी बीजेपी की जीत के लिए काफी महत्वपूर्ण रही। आयोग ने 91 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से विलोपित कर दिए, जिनमें अधिक संख्या मुस्लिम इलाकों के मतदाताओं की थी, जो संभवतः बीजेपी के खिलाफ थे। प्रतिष्ठित पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने ट्वीट करके बताया कि ‘‘91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए जिनमें से 27 लाख को ट्रिब्यूनल के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं मिला। कम से कम 50 सीटों पर एसआईआर के जरिए हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा रही‘‘।

    उत्कृष्ट मानवाधिकार कार्यकर्ता अंजली भारद्वाज ने कहा ‘‘क्या अब हम कम से कम सर्वोच्च न्यायालय को इस बेतुकी एसआईआर के संबंध में कोई कदम उठाते देखेंगे? एसआईआर पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने एक  प्रासंगिक और सटीक सवाल उठाया- यदि जीत का अंतर मताधिकार से वंचित किए गए मतदाताओं की संख्या से कम होगा तो क्या होगा? ऐसा लगता है कि उनकी आशंकाएं सही साबित हुईं‘‘। शेरवानी ने हमें बागची की वह टिप्पणी भी याद दिलाई जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि जीत का अंतर 2 प्रतिशत हो और 15 प्रतिशत मतदाता वोट न दे पाएं तो नतीजे पर सवालिया निशान लगाया जा सकता है।

    वैसे बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज कराते हुए सरकार बनाई। लेकिन यह लोकतांत्रिक मानदंडों से बहुत हटकर थी। पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट संबंधी शंकाओं को तमिलनाडु में हुए घटनाक्रम से और बल मिलता है। यहां जोसेफ विजय, जो एक बड़े अभिनेता हैं और दलितों और वंचित वर्गों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, का दल सबसे बड़े दल के रूप में उभरा। तमिलनाडु के राज्यपाल, जो एक पक्के हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, ने विजय के सरकार बनाने के दो प्रयासों को, जो पूरी तरह परंपराओं और मानदंडों पर खरे उतरते थे, स्वीकार करने से इंकार कर दिया। बाद में उन्होंने सदन में बहुमत का जुगाड़ कर लिया और इसके ठीक बाद एकआईएडीएमके के एक बड़े धड़े ने भी उन्हें  समर्थन दे दिया।

    पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हमने लोकतांत्रिक मूल्यों का गहन हनन होते देखा। हम अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, लेकिन पिछले एक दशक के घटनाक्रम और बीजेपी की कारगुजारियों से हमें यह पता लगता है कि यह पार्टी हमारे लोकतांत्रिक चरित्र को तहस-नहस करने पर तुली हुई है, जो हमने अपने स्वतंत्रता आंदोलन में कई मुसीबतों को झेलते हुए विकसित किया था। यह एक संयोग मात्र नहीं था कि बीजेपी की पितृ संस्था आरएसएस स्वतंत्रता संघर्ष से पूरी तरह दूर रही।

    लोकतंत्र पेड़ से नहीं टपकता, यह समाज के लोकतंत्र के प्रति आस्था और आकांक्षा रखने वाले वर्गों दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, मजदूर वर्ग, महिलाओं और कुछ हद तक उभरते हुए उद्योगपति वर्गों द्वारा खून-पसीने से सींचकर विकसित किया जाता है। आरएसएस के मुख्य समर्थक वर्ग सामंती राजे-रजवाड़े, ब्राह्मण और समाज के उच्च वर्ग थे, इसलिए लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का हिस्सा बनना आरएसएस को किसी तरह से भी स्वीकार्य नहीं हो सकता था।

    आरएसएस संविधान के खिलाफ था और मनुस्मृति का समर्थक था। हम जानते हैं कि आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने संविधान की यह कहते हुए आलोचना की थी कि इसमें मनुस्मृति के मूल्यों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। आरएसएस के एजेंडे का अधिक साफ नजर आने वाला हिस्सा, जिसका समर्थन और जिसे आगे बढ़ाने का काम भारतीय जनसंघ और बीजेपी ने किया है, उसका मुस्लिम और ईसाई विरोधी रवैया है जो उसके एजेंडे का केन्द्रीय मुद्दा है।

    आरएसएस के द्वितीय संरसंघ चालक, गोलवलकर ने अपनी दो प्रमुख पुस्तकों में इस पर जोर दिया। ‘व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड‘ में उन्होंने हिटलर और फासीवाद की सराहना की और लिखा कि ‘‘गैर-हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र की संस्कृति और भाषा को अपनाना होगा, हिन्दू धर्म के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव रखना सीखना होगा और अपनी अलग पहचान को त्याग देना होगा। अगर वे ऐसा करने में असफल रहते हैं, तो उनके साथ विदेशियों जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए‘‘ और उन्हें ‘‘…हिन्दू राष्ट्र की अधीनता पूरी तरह स्वीकार करनी होगी, उन्हें किसी बात का हक नहीं जताना चाहिए, विशेषाधिकार और तरजीहपूर्ण व्यवहार तो दूर सामान्य नागरिक के अधिकारों की भी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए‘‘। बंच ऑफ़ थाट्स में वे लिखते हैं कि मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट हिन्दू राष्ट्र के आंतरिक शत्रु हैं।

    ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग गोलवलकर के विचारों को अमली जामा पहनाने में जुटा हुआ है। बीजेपी देश को हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर धकेल रही है जिसकी राह में लोकतांत्रिक मूल्य सबसे बड़ी बाधा हैं। लेकिन संघ परिवार बहुत कुटिलता और चालाकी से शुरूआत में ही मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने का प्रयास कर रहा है। शायद इसके बाद ईसाईयों को निशाना बनाया जाएगा। एक तरह से हम धीरे-धीरे उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं जिसपर पाकिस्तान चल चुका है, जहां मुस्लिम सम्प्रदायवादियों का बोलबाला है। हालांकि जिन्ना ने अपने 11 अगस्त 1947 के भाषण में धर्मनिरपेक्षता को ऊंचा दर्जा देने की बात कही थी, लेकिन साम्प्रदायिक शक्तियों ने धीरे-धीरे पाकिस्तान को जकड़ लिया और सेना और मुल्लाओं का प्रभुत्व हो गया। वहां लोकतंत्र तहस-नहस हो चुका है।

    भारत में लोकतंत्र की अन्य पहचानों- अभिव्यक्ति की आजादी और आस्था की आजादी- की स्थिति में भी पिछले कुछ वर्षों में बहुत गिरावट आई है। लोकतंत्र की सेहत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उन्हें मिली आजादियों से नापी जाती है, और पिछले कुछ दशकों में अल्पसंख्यकों को आतंकित किए जाने में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है, जिसका नतीजा अल्पसंख्यकों के अपने दायरों में सिमटते जाने की बढ़ती प्रवृत्ति के रूप में साफ देखा जा सकता है। धर्मपरिवर्तन का आरोप लगाकर ईसाईयों को आतंकित करने और विभिन्न जिहादों के बहाने निशाना बनाया जाना मानो मुसलमानों की नियति बन गई है।

    इन चुनावों ने लोकतंत्र के और ज्यादा पतन होने की एक झलक नजर आई है जिसपर वर्तमान सत्ताधारियों के राज में खतरा मंडरा रहा है।

    (लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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