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    लोकतंत्र की उघड़ती जाती ऊपरी परत

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 18, 2026

    इन दिनों देश में एक ‘शैतानी हवा’ बह रही है, जो सत्ता-लोभ, लालच, मजहबी कट्टरता, जातिवाद और हिंसा को नंगा कर दे रही है।

    अभय शुक्ला

    Published: 18 May 2026, 7:01 AM

    ये समय थोड़ा मुश्किल है, तो आइए इस हफ्ते की शुरुआत एक मुश्किल सवाल से करते हैं: नीचे दी गई घटनाओं में क्या समानता है?

    • पिछले महीने नोएडा में फैक्टरी मजदूरों और घरेलू कामगारों द्वारा न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर किया गया व्यापक प्रदर्शन जो कई बार हिंसक भी हो गया।

    • एक हाईकोर्ट जज का उस मामले से खुद को अलग करने से इनकार करना, जिसमें उस मामले के एक पक्ष के लिए उस जज के बच्चे काम करते हैं। साथ ही कथित तौर पर उस जज ने उस पक्ष से जुड़े संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत भी की थी।

    • पश्चिम बंगाल के एक जिले में, ऐसे हजारों मतदाताओं द्वारा न्यायिक अधिकारियों का घेराव जिनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया था।

    • पश्चिम बंगाल में लगभग 30 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए जाना- ये वे मतदाता थे जिन्होंने पिछले चुनावों में वोट डाला था और जिनके पास सभी जरूरी दस्तावेज थे; ऐसा एक अस्पष्ट, एल्गोरिदम-आधारित ‘तार्किक विसंगति’ की वजह से हुआ, जिसका प्रावधान न तो किसी कानून में है और न ही किसी अन्य राज्य में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

    • इन 30 लाख बदकिस्मत लोगों की लंबित अपीलों पर फैसला किए बिना ही चुनाव करवा देना, और वोट देने के उनके संवैधानिक अधिकार के प्रति सुप्रीम कोर्ट की घोर उदासीनता- यह कहना कि वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं!

    • ओडिशा की एक अदालत द्वारा आदिवासी और दलित आरोपियों (जिनपर आरोप तो थे, लेकिन जिन्हें दोषी नहीं ठहराया गया था) पर एक जातिवादी जमानत शर्त थोपना-कि उन्हें दो महीने तक हर सुबह पुलिस थानों की सफाई करनी होगी-जिसने उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई और कानून का मजाक बना दिया।

    • राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में शामिल होना।

    • ओडिशा के एक गरीब आदिवासी को अपनी मृत बहन का शव बैंक तक ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा, ताकि वह उसकी मृत्यु को साबित कर सके और उसके खाते में जमा मामूली रकम, उसके वारिस के तौर पर उसे मिल सके- इस घटना ने केवाईसी (नो योर कस्टमर) को ‘नो योर कॉर्प्स’ में बदल दिया।

    • एक अदालत द्वारा एक राजनीतिक दल के नेताओं के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण के मामलों को इस आधार पर खारिज कर देना कि उनके बयान न तो नफरत फैलाने वाले थे और न ही हिंसा भड़काने वाले। इनमें से एक भाषण में वह कुख्यात नारा भी शामिल था: “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को”। दूसरा एक मुख्यमंत्री का वीडियो था, जिसमें वह एक मुस्लिम व्यक्ति की तस्वीर वाले लक्ष्य पर राइफल ताने दिखाई दे रहे थे।

    ऊपर जिन घटनाओं का जिक्र किया गया है, वे संदर्भ, विषय-वस्तु, महत्व और जगह के लिहाज से जरूर अलग हैं, लेकिन उन सबमें एक बात समान है: उस चीज का पूरी तरह ढह जाना जो किसी विकसित देश को ‘विकसित’ बनाती है- यानी शासन-प्रशासन, सामान्य कानून, सामाजिक मूल्य, सहानुभूति, कानून का राज, सरकार या उसकी संस्थाओं पर भरोसा, समानता का विचार और निष्पक्ष न्याय।

    इन सब को एक साथ देखने पर, ये एक ऐसी चीज के टूटने की ओर इशारा करती हैं जो इन सबसे कहीं ज्यादा कीमती है- यानी खुद लोकतंत्र। ये डॉ. आम्बेडकर के उन दूरदर्शी और चेतावनी भरे शब्दों को सही साबित करती हैं: कि भारत में लोकतंत्र जमीन की ऊपरी परत जैसा एक बहुत ही पतला आवरण मात्र है, जिसे आसानी से उड़ाया जा सकता है और इसे कभी भी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

    आजकल देश में एक ‘शैतानी हवा’ बह रही है, जो आम्बेडकर की बिछाई ऊपरी परत को हटाकर उस सत्ता-लोभ, लालच, मजहबी कट्टरता, जातिवाद और हिंसा को नंगा कर रही है, जो हमेशा से हमारे समाज में जिंदा रही। हमने उम्मीद की थी कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रगतिशील सरकारें समय के साथ हमारी सभ्यता की इन बुराइयों को धीरे-धीरे मिटा देंगी और उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देंगी; लेकिन हुआ इसका ठीक उलट।

    एक के बाद एक सरकारों ने- और खासकर पिछले बारह सालों से सत्ता में रही सरकार ने-इन कमियों और दरारों को और भी चौड़ा किया है; इन्हें राष्ट्रीय (और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय) नीतियों का मुख्य आधार बना दिया गया है, इन्हें कानूनों और शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है, ये अब सरकारी नीतियों के ऐसे साधन बन गए हैं जिनके इस्तेमाल पर कोई शर्मिंदगी नहीं होती, और अब तो चुनाव भी इन्हीं मुद्दों के एजेंडे पर लड़े जा रहे हैं।

    राघव चड्ढा का पाला बदलना इस भारी गिरावट की ही पुष्टि करता है, क्योंकि इससे यह साबित होता है कि उदारवादी परवरिश और लंदन की शिक्षा भी भारतीय राजनीति की बेईमानी और अवसरवादिता से बचाने में कोई ढाल नहीं बन सकती; साथ ही, यह राजनेताओं के प्रति आम लोगों के बढ़ते अविश्वास को भी सही ठहराता है।

    कार्यपालिका ने हमारे समाज को इस हद तक क्रूर बना दिया है कि शीर्ष 10 फीसद लोग केवल अपनी सुख-सुविधाओं और विशेषाधिकारों की परवाह करते हैं, जबकि बाकी 90 फीसद लोगों को जैसे-तैसे गुजारा करने के लिए छोड़ दिया गया है। हम दुनिया के सबसे ज्यादा असमान देशों में से एक हैं, और हमें इस बात पर गर्व भी है। इस ‘चुड़ैल के कड़ाहे’ से लोकतंत्र जैसी चीज के निकलने की तो गुंजाइश ही नहीं है।

    हमने भोलेपन में यह उम्मीद की थी कि जब कार्यपालिका बेलगाम हो जाएगी, तो कम-से-कम हमारी न्यायपालिका उसे काबू में करेगी और कानून के राज को बचाकर रखेगी। लेकिन हमारी वह उम्मीद झूठी साबित हुई और अब धूल में मिल चुकी है, जैसा कि ऊपर बताई गई कुछ घटनाओं से साफ जाहिर होता है।

    आज हम आपातकाल के दिनों वाले एडीएम, जबलपुर वाले दौर से भी नीचे गिर चुके हैं। तब कम-से-कम, संवैधानिक रूप से वैध आपातकाल तो लागू था; आज तो हमारे पास सरकार की सत्ता पाने की निरंकुश नंगी दौड़ को छिपाने के लिए वह दिखावा भी नहीं बचा।

    आज हर दिन हमें हजारों न्यायिक वार झेलने पड़ रहे हैं- चाहे वह जमानत न देना हो, मजिस्ट्रेटों की नाक के नीचे चुनावों को चोरी होने देना हो, किसी खास विचारधारा के हिसाब से ‘नफरत’ की परिभाषा बदलना हो, जवाबदेही के किसी भी विचार को ठुकरा देना हो, या फिर न्यायिक मूल्यों की किसी भी पुनर्स्थापना से मुंह फेर लेना हो।

    केवल संविधान ही किसी लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकता, न ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि लोकतंत्र जीवित रहे। ऐसा होने के लिए, ऊपरी मिट्टी की देखभाल अत्यंत सावधानी से करनी होगी; उसमें पोषक तत्व डालने होंगे और उन्हें संरक्षित रखना होगा; साथ ही, हानिकारक कीटाणुओं और खर-पतवारों को उससे दूर रखना होगा। इसके माली ऐसे लोग होने चाहिए जो ज्ञान और संवेदनशीलता से परिपूर्ण हों-ऐसे लोग जो अपने काम से प्रेम करते हों, न कि ऐसे भाड़े के टट्टू हों जो केवल ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की फिराक में रहते हों।

    अफसोस की बात है कि आज हमारी जमीन के इस टुकड़े पर भाड़े के लोगों और मौकापरस्तों का कब्जा है। ऊपरी मिट्टी का जो कुछ भी हिस्सा बचा है, वह भी जल्द ही उड़ जाएगा; पीछे रह जाएगा एक ऐसा ‘सभ्यतागत रेगिस्तान’, जिसका इन सत्ता-लोभी और लालची लोगों तथा उनके भाड़े के टट्टुओं के अलावा किसी और के लिए कोई मोल नहीं होगा। वे एक बंजर जमीन पर राज करेंगे, लेकिन जैसा कि मिल्टन की रचना ‘पैराडाइज लॉस्ट’ में शैतान ने सोचा था: ‘जन्नत में चाकरी करने से तो बेहतर है कि जहन्नुम में राज किया जाए।’

    (अभय शुक्ला रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं।)

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