सबसे बड़ा सवाल है कि देश का सबसे बड़ा स्कूल बोर्ड, इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल मूल्यांकन के बदलाव के लिए क्या सचमुच तैयार था? क्योंकि तकनीकी सुधार का मतलब सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर लागू करना नहीं, बल्कि जब वह सॉफ़्टवेयर नाकाम हो जाए, तो जवाबदेही तय करना भी है।
“मैं इतना गधा नहीं हूं कि पूरी कॉपी खाली छोड़कर आ जाऊंगा….मेरे 13 एमसीक्यू एकदम सही हैं…फिर भी उनमें मुझे सिर्फ 9 नंबर मिले हैं….मुझे रिपीट करने को कहा गया है…मेरा पूरा साल बरबाद हो गया है….मेरी कॉपी दोबारा चेक होनी चाहिए…लेकिन इसके लिए मैं पैसे बिल्कुल नहीं दूंगा…सीबीएसई की गलती के लिए मैं पैसे क्यों दूं….”
आंखों में आंसु भरे और गले रुंधे से कह गए यह शब्द रजक रेहरी के हैं, जिसने इस साल सीबीएसई 12वीं की परीक्षा दी थी, लेकिन उसका नतीजा जो आया है, उसके मुताबिक उसे इसी क्लास में रिपीट करना होगा।
इससे पहले वेदांत की कहानी तो सबने सुन ली…उस पर सीबीएसई ने गलती मानते हुए आश्वासन दे दिया कि उसकी कॉपी फिर से जांची जाएगी। लेकिन रजक जैसे छात्रों का क्या? और रजक अकेला नहीं है। लाखों ऐसे छात्र हैं जो अपने रिजल्ट को देखकर परेशान हैं। सीबीएसई खुद मान रहा है कि जितने छात्रों ने इस साल 12वीं की परीक्षा दी थी, उनमें से कम से कम 25 फीसदी छात्रों ने दोबारा कॉपी जांचने की मांग की है।
देश के इतिहास में पहली बार मूल्यांकन यानी कॉपी जांचने पर इतना शक पैदा हुआ है। आंकड़े साफ-साफ बता रहे हैं कि सीबीएसई के हर चौथे छात्र ने अपनी स्कैन कॉपी मांगी है। और ऐसे छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हालत यह है कि सीबीएसई का पोर्टल क्रैश हो गया है और मजबूरन छात्र रात में ढाई-तीन बजे तक फॉर्म भर रहे हैं।
सीबीएसई ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि इस साल बोर्ड ने दोनों कक्षाओं (10वीं और 12वीं) की कुल मिलाकर 98 लाख 60 हजार उत्तर पुस्तिकाओं का डिजिटल मूल्यांकन (ओएसएम) किया है। ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग की है। 12वीं की पूरी परीक्षा में देश भर से कुल 17.68 लाख छात्र शामिल हुए थे। सीबीएसई ने 13 मई को परीक्षाफल का ऐलान किया, जिसमें से 85.2 फीसदी छात्रों को पास दिखाया। वैसे बीते सात साल के दौरान पास यानी उत्तीर्ण होने वाले छात्रों का यह सबसे कम आंकड़ा है। पिछले साल 88.93 फीसदी छात्र पास हुए थे।
रिजल्ट की घोषणा होते ही छात्र अपने मार्क्स और परीक्षाफल देखकर हैरान रह गए। तमाम छात्रों ने अपने रिजल्ट पर असंतोष जताते हुए कॉपियां दोबारा चेक करने और उनकी कॉपी (उत्तर पुस्तिकाएं या आंसर शीट्स) दिखाए जाने की मांग की। इसके चलते सीबीएसई ने असंतुष्ट छात्रों के लिए री-इवैल्युएशन (पुनर्मूल्यांकन) और मार्क्स वेरिफिकेशन का ऑनलाइन पोर्टल ओपन किया। इस पोर्टल के शुरु होते ही बेशुमार छात्रों ने अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। हालत यह थी कि पोर्टल शुरू होने के पहले 3 घंटे के भीतर ही रिकॉर्ड 1.26 लाख से अधिक आवेदन दर्ज हो गए। पहले इस पोर्टल पर आवेदन की तारीख 24 मई 2026 रखी गई थी, लेकिन छात्रों की मांग देखते हुए सीबीएसई को इस डेडलाइन को 25 मई की रात 12 बजे तक बढ़ाना पड़ा। साथ ही यह भी कहना पड़ा कि जब तक आखिरी आवेदन की स्कैन कॉपी छात्रों को नहीं भेज दी जाती, तब तक और उसके दो दिन बाद तक यह पोर्टल खुला रहेगा।
फिलहाल तो सीबीएसई के अधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 26 मई 2026 की रात 8 बजे तक उसके पोर्टल पर 4,04,319 छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी की मांग की। सीबीएसई ने बताया है कि इन छात्रों ने विभिन्न विषयों की कुल 11,31,961 स्कैन कॉपी के लिए आवेदिन किया। सीबीएसई का दावा है कि उसने इनमें से 8,98,214 स्कैन कॉपियां छात्रों को उपलब्ध करा दी गई हैं और बाकी को भी जल्द ही उपलब्ध कराई जाएंगी। साथ ही यह भी कहा गया कि कॉपियों की दोबारा जांच के लिए आवेदन करने वाला पोर्टल 29 मई को शुरु कर दिया जाएगा।
इस सारी कवायद में एक और दिक्कत से छात्रों को दोचार होना पड़ा। वह थी, पोर्टल का पेमेंट सिस्टम, बार-बार सिस्टम का क्रैश होना आदि। कई मामलों में तो छात्रों को स्कैन कॉपी के लिए दो-दो बार पेमेंट करना पड़ा। हालांकि बाद में शिक्षा मंत्रालय ने इस समस्या के समाधान के लिए कुछ बैंकों को इस काम में लगाया ताकि पेमेंट का मुद्दा न झेलना पड़े।
सीबीएसई की विश्वसनीयता पर क्यों पैदा हुआ शक
लेकिन असली समस्या और खेल सामने आया जब छात्रों को उनकी आंसर शीट्स की स्कैन कॉपियां मिलना शुरु हुईं। बहुत से छात्रों को तो इतनी धुंधली स्कैन कॉपी मिली कि उसे पढ़ना मुश्किल था, लेकिन वेदांत नाम के छात्र ने तो पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए अपनी उत्तर पुस्तिका सोशल मीडिया पर शेयर कर दी। उसने साफ लिखा कि जो उत्तर पुस्तिका उसे बोर्ड ने भेजी है वह उसकी है ही नहीं। इस दावे के पक्ष में उसने अपनी अंग्रेजी की उत्तर पुस्तिका और फिजिक्स की उत्तर पुस्तिका की तस्वीरें सामने रखीं। इन दोनों के देखकर साफ समझा जा सकता था कि फिजिक्स की उत्तर पुस्तिका वेदांत की नहीं है। अंग्रेजी और फिजिक्स की उत्तर पुस्तिका में लिखावट का अंतर साफ था।
चौंकाने वाली एक और बात थी। वह यह कि वेदांत को फिजिक्स की जो उत्तर पुस्तिका की स्कैन कॉपी दी गई, उसका पहला पन्ना जिस पर छात्र अपना रोल नंबर, स्कूल का नाम, विषय आदि लिखते हैं, वह उसी का था, लेकिन अंदर के पन्ने किसी और के थे, जिनकी लिखावट अलग थी।
इससे ट्रोल तो शांत हुए, लेकिन एक बड़ा सवाल छोड़ गए। अगर वेदांत के मामले में यह हो सकता है कि उसे किसी अन्य छात्र के मार्क्स दे दिए गए हैं, तो इसकी पूरी संभावना है कि वेदांत या सभी उत्तर सही देने वाले छात्रों के मार्क्स किसी अन्य को दे दिये गए हों।
शिक्षा मंत्रालय ने किया आईआईटी से आग्रह
मामला तूल पकड़ता देख सीबीएसई को मानना पड़ा कि उसके सिस्टम में कुछ तकनीकी दिक्कतें हैं। उसने अधिक पेमेंट वाले छात्रों को रिफंड का वादा भी किया। घबराए शिक्षा मंत्रालय ने सिस्टम को समझने और उसे सुधारने के लिए आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर का रुख किया। साथ ही चार सरकारी बैंकों को भी शामिल किया कि पेमेंट गेटवे में आ रही खामियों को सुधारें।
हैकर के खुलासे से हवा हो गए सीबीएसई के दावे
अकसर लोग कहते हैं कि परीक्षाओं के कुछ दिन बुरे हो सकते हैं। लेकिन सीबीएसई में जो कुछ हुआ है, वह तो कुछ और ही है। सीबीएसई ने इस साल कॉपियों की जांच के लिए ओएसएम (ऑन स्क्रीन सिस्टम) अपनाया था। कहा जा रहा था कि परीक्षा पुस्तिकाएं जांचने की दिशा में यह मील का पत्थर साबित होगा। लेकिन नतीजा यह हुआ कि यह एक बड़ी तबाही के रूप में सामने आया, जिसमें हर चौथा छात्र अपनी कॉपियों की दोबारा जांच की मांग कर रहा है।
सीबीएसई पूरी खामियों को स्वीकार करता या समझ पाता, उससे पहले ही एक 19 साल के छात्र ने विस्फोट कर दिया। खुद को एथिकल हैकर बताने वाले इस छात्र ने दावा किया कि उसने सीबीएसई के मूल्यांकन सिस्टम के कुछ हिस्सों को सिर्फ “30 मिनट” में एक्सेस कर लिया था और वह भी तीन महीने पहले। उसने दावा किया कि इस बाबत उसने तो तीन महीने पहले ही सरकारी एजेंसी को इसकी जानकारी दे दी थी कि आपके सिस्टम में बेहद खामियां हैं। एक न्यूज चैनल से बातचीत में निसर्ग नाम से ब्लॉग लिखने वाले इस छात्र ने दावा किया कि वह परीक्षक-स्तर (इवैलुएटर लेवल) के फ़ंक्शन एक्सेस कर सकता है और यहां तक कि मूल्यांकन करने वालों (कॉपी जांचने वालों) की जानकारी भी बदल सकता है। हालांकि उसके इन दावों की अबी पुष्टि नहीं हुई है, और सीबीएसई ने भी स्पष्टीकरण दिया है कि यह दावे गलत हैं, क्योंकि जिस पोर्टल को हैकर ने एक्सेस किया है वह सिर्फ टेस्ट के लिए था, असली नहीं। सीबीएसई ने ज़ोर देकर इनकार किया है कि उसके असली मूल्यांकन पोर्टल में कोई सेंध लगी है। बोर्ड का कहना है कि इसमें सिर्फ़ एक टेस्टिंग वाला हिस्सा शामिल था जिसमें सैंपल डेटा था और असली ओएसएम सिस्टम एकदम सुरक्षित है।
सीबीएसई को यह भी मानना होगा कि जिन छात्रों के सामने यह सब खुलासे हो रहे हैं वे कोई साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट नहीं हैं। वे तो आगे की शिक्षा के लिए कॉलेज कट-ऑफ का इंतज़ार कर रहे युवा हैं। उन्हें बोर्ड बता रहा है कि सबकुछ सही है, लेकिन हकीकत में उनके सामने बोर्ड की खामियों के नए-नए खुलासे सामने आ रहे हैं।
थर्ड पार्टी पर बोर्ड की चुप्पी
इस सारे मामले में सीधे तौर पर कहे बिना बोर्ड और शिक्षा मंत्रालय दोनों ने ही माना है कि कॉपी जांचने के लिए ओएसएम सिस्टम लगाने का काम थर्ड पार्टी को दिया गया था। इसीलिए इस डिजिटल समस्या के समाधान के लिए शिक्षा मंत्रालय को आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर की शरण में जाना पड़ा। लेकिन यह थर्ड पार्टी कौन है, उसे किस आधार पर चुना गया, इस पर अधिकारिक तौर पर सन्नाटा है। सोशल मीडिया पर एकाध कंपनी का नाम इस बाबत लिया जा रहा है, जिसका पूर्व का इतिहास खामियों भरा है। लेकिन अधिकारिक तौर पर अभी तक कुछ नहीं कहा गया है।
लेकिन सवाल यह है कि लाखों छात्रों के भविष्य का फैसला करने वाली एक व्यवस्था, स्कैनिंग की गुणवत्ता से लेकर पोर्टल की स्थिरता और उत्तर पुस्तिकाओं की मैपिंग तक—इतने सारे स्तरों पर एक साथ कैसे गड़बड़ा सकती है?
और इस सबमें सबसे बड़ी चिंता यह उभरकर सामने आई है कि देश का सबसे बड़ा स्कूल बोर्ड, इतने बड़े पैमाने पर देशव्यापी डिजिटल मूल्यांकन की ओर बदलाव के लिए क्या सचमुच तैयार था? क्योंकि तकनीकी सुधार का मतलब सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर लागू करना नहीं है, बल्कि जब वह सॉफ़्टवेयर काम करना बंद कर दे, तो जवाबदेही तय करना भी है।
और, इस आशंका का जवाब कौन देगा कि क्या सीबीएसई को इस साल 12वीं की परीक्षा दोबारा कराना पड़ेगी, ताकि उसकी विश्वसनीयता बहाल हो सके?

