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    तमिलनाडु क्यों कह रहा है नीट को ‘ना’?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 3, 2026

    जब परीक्षा पास करने के लिए कोचिंग जरूरी हो जाए, तो वह योग्यता के बजाय आर्थिक संपन्नता का प्रतीक बन जाती है।

    तमिलनाडु कड़वी राजनीतिक खींचतान के लिए जाना जाता है। यहां सरकारें बदलती हैं, गठबंधन टूटते-बनते हैं और राष्ट्रीय महत्व के अहम मुद्दों पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में भी दल मंच साझा करने से कतराते हैं। इसके बावजूद, एक ऐसा मुद्दा है जो बीजेपी को छोड़कर राज्य की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों को एकजुट करता है।

    चाहे द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) हो, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके), कांग्रेस, वामपंथी दल, पट्टाली मक्कल काच्ची (पीएमके), विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके), मरूमलारची द्रविड़ मुनेत्र कजगम (एमडीएमके) हो या अन्य क्षेत्रीय दल- सब इस बात पर सहमत हैं कि नीट को खत्म किया जाना चाहिए। भारतीय राजनीति में ऐसी अभूतपूर्व सर्वसम्मति कम ही देखने को मिलती है।

    अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) ने तो न केवल नीट का विरोध किया है, बल्कि इसे खत्म ही करने की मांग की है। आखिर तमिलनाडु, देश के अन्य राज्यों से इतर, एक ऐसी केन्द्रीय प्रवेश परीक्षा को लगातार खारिज क्यों कर रहा है, जिसे केन्द्र सरकार पारदर्शी, योग्यता-आधारित और चिकित्सा शिक्षा में एकसमान मानक बनाए रखने के लिए अनिवार्य बताती है? इसका उत्तर हालिया राजनीति में नहीं, बल्कि एक सदी पुराने सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में छिपा है।

    मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के पूर्व प्रोफेसर सी. लक्ष्मणन कहते हैं: ‘नीट के राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने से बहुत पहले, 1916 में स्थापित जस्टिस पार्टी ने उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों पर चंद विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। बाद में पेरियार ई.वी. रामासामी के ‘स्वाभिमान आंदोलन’ ने उस संघर्ष को जातिगत पदानुक्रम और वंशानुगत सामाजिक विशेषाधिकारों के खिलाफ एक व्यापक अभियान में बदल दिया। शिक्षा इस बदलाव का सबसे शक्तिशाली हथियार बनी। पेशेवर कॉलेजों, विशेष रूप से मेडिकल कॉलेजों को ऐसे प्रवेश द्वार के रूप में देखा गया जहां से ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय सम्मान, रोजगार और सामाजिक स्थिति हासिल कर सकते थे।’

    वह आगे कहते हैं, ‘स्वतंत्र भारत ने जब ऐतिहासिक भेदभाव को मिटाने के लिए संवैधानिक उपाय के रूप में आरक्षण को अपनाया, तो तमिलनाडु ने उस सोच को पूरी तरह अपनाया। राजनीतिक विचारधारा से परे, सभी सरकारों ने आरक्षण का दायरा बढ़ाया, स्कूली शिक्षा को मजबूत किया और उच्च शिक्षा को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय एक सार्वजनिक हित के रूप में देखा। किसान परिवारों, मछुआरा बस्तियों, दलित बहुल इलाकों, पिछड़े वर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के हजारों छात्रों ने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाया। इनमें से कई तो अपने परिवार के पहले स्नातक थे, और कई वापस लौटकर सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और दूरदराज के गांवों में सेवा देने पहुंचे। उनकी कहानियों ने इस विश्वास को पुख्ता किया कि प्रतिभा हर जगह है, बात केवल अवसर की है।’

    उसी विश्वास ने तमिलनाडु के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक को आकार दिया। साल 2006 में, राज्य ने व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षाओं को समाप्त कर दिया। मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पूरी तरह से बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा के अंकों पर आधारित कर दिया गया। सरकार का तर्क था कि तीन घंटे की परीक्षा की तुलना में दो साल का निरंतर शैक्षणिक प्रदर्शन छात्र की क्षमता का बेहतर आकलन करता है। एक दशक से भी अधिक समय तक यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही।

    कोयंबटूर के एक कॉलेज में सहायक प्रोफेसर और शिक्षाविद सुमति पद्मनाभन बताती हैं, ‘नीट की शुरुआत ने उस मॉडल को बुनियादी रूप से बदल दिया। इसके समर्थकों का तर्क था कि एक राष्ट्रीय परीक्षा से दाखिले में मनमानी खत्म होगी, निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली कैपिटेशन फीस पर रोक लगेगी और यह सुनिश्चित होगा कि हर भावी डॉक्टर एक ही शैक्षणिक मानक पर खरा उतरे। इसके विपरीत, तमिलनाडु का तर्क था कि नीट विषमता की भयावह वास्तविकता की अनदेखी करता है। अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग संसाधनों में पढ़ने वाले छात्रों से अचानक एक ही राष्ट्रीय परीक्षा में प्रतिस्पर्धा करने की उम्मीद की जाने लगी। शहरी सीबीएसई छात्रों के पास अध्ययन सामग्री और कोचिंग तक आसान पहुंच थी, जबकि सरकारी स्कूलों के स्टेट बोर्ड छात्र इससे वंचित थे।’

    कोटा, चेन्नई, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में कोचिंग उद्योग के तेजी से फैलने से यह असमानता और साफ दिखने लगी। परिवार कोचिंग, रहने और अध्ययन सामग्री पर लाखों रुपये खर्च करते हैं। नीट की तैयारी अब महंगी कक्षाओं, मॉक टेस्टों और स्कूली पढ़ाई के बाद सालों की तैयारी का खर्चीला जरिया बन चुकी है। संपन्न परिवार इसे बच्चों के भविष्य में निवेश के रूप में देखते हैं, जबकि गरीब परिवार इसे अपनी आकांक्षाओं और अवसरों के बीच एक मजबूत दीवार मानते हैं। तमिलनाडु का स्पष्ट कहना था कि यदि कक्षाओं की जगह कोचिंग सेंटरों को लेनी है और मेडिकल दाखिला सालों की पढ़ाई के बजाय कोचिंग का खर्च उठाने की पारिवारिक क्षमता से तय होना है, तो नीट हमारे लिए नहीं है।

    इस पूरी प्रक्रिया के केन्द्र में 2021 में तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति ए.के. राजन समिति थी, जिसे नीट के प्रभावों का अध्ययन करने का काम सौंपा गया था। दाखिले के रुझानों और छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों व जनता से प्राप्त 86,000 से अधिक जवाबों के बाद, समिति इस नतीजे पर पहुंची कि नीट अनिवार्य होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों का अनुपात घट गया। तमिल माध्यम के स्कूलों और स्टेट बोर्ड से होने वाले दाखिलों में भारी गिरावट आई, जबकि सीबीएसई स्कूलों के छात्रों की हिस्सेदारी बढ़ गई। सरकारी स्कूलों के छात्र, जो कभी निरंतर शैक्षणिक प्रदर्शन के बल पर मेडिकल कॉलेजों में पहुंचते थे, लगभग गायब हो गए। यह स्थिति तब थोड़ी सुधरी जब राज्य ने 2020 में उनके लिए 7.5 प्रतिशत का आरक्षण लागू किया।

    कागज पर एक समान परीक्षा निष्पक्ष लगती है, लेकिन छात्र बेहद असमान शैक्षणिक माहौल में पलते-बढ़ते हैं। किसी दूरदराज के गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा-जहां न पर्याप्त प्रयोगशालाएं हैं, न अनुभवी शिक्षक और न ही कोचिंग तक पहुंच- उस शहरी अमीर छात्र की तुलना में बहुत पीछे से दौड़ शुरू करता है जिसके पास डिजिटल संसाधन और साधन उपलब्ध हैं।

    दोनों को एक ही परीक्षा के तराजू पर तौलना योग्यता के नाम पर असमानताओं को सही ठहराने का जोखिम पैदा करता है। लेकिन वास्तव में योग्यता क्या है? क्या यह तीन घंटे की परीक्षा में बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर देने की क्षमता है, या फिर सालों की अनुशासित पढ़ाई और निरंतरता? तमिलनाडु हमेशा दूसरे दृष्टिकोण का पक्षधर रहा है।

    डॉक्टरी का पेशा संवेदनशीलता, धैर्य, संवाद कौशल, नैतिक निर्णय क्षमता और दबाव में काम करने की योग्यता की मांग करता है। इन्हें नीट जैसी परीक्षा के जरिये मापना लगभग असंभव है। आंकड़ों और नीतिगत बहसों से परे एक और मुद्दा है जिसने तमिलनाडु में जनमानस को प्रभावित किया है: नीट का मानसिक दबाव। बीते सालों में राज्य ने ऐसे कई छात्रों की आत्महत्या की दर्दनाक खबरें देखी हैं जो असफल होने के डर से टूट गए या नतीजों से हताश हो गए थे। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि किसी किशोर के भविष्य को केवल एक परीक्षा के नतीजे पर निर्भर कर देने के गंभीर मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं। यद्यपि परीक्षाएं शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था ने एक ऐसा तनावपूर्ण माहौल पैदा कर दिया है जो पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों और कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

    मदुरै के मानवाधिकार कार्यकर्ता हेनरी टीफेन कहते हैं, ‘तमिलनाडु नीट को बढ़ते केन्द्रीकरण के रूप में भी देखता है। शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, जिसपर केन्द्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि राष्ट्रीय मानकों का अपना महत्व है, लेकिन राज्यों के पास अपनी शैक्षणिक वास्तविकताओं और सामाजिक उद्देश्यों के अनुकूल प्रवेश व्यवस्था बनाने का अधिकार होना चाहिए।’

    नीट के समर्थक अब भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों की सफलता की मिसालें देकर इसका बचाव करते हैं। लेकिन इन तर्कों से तमिलनाडु का रुख नहीं बदला है। जैसा कि टीफेन कहते हैं, ‘राज्य उत्कृष्टता को खारिज नहीं करता। वह केवल इस धारणा पर सवाल उठाता है कि उत्कृष्टताको सामाजिक संदर्भ से अलग करके मापा जा सकता है। एक ऐसे समाज में जहां शैक्षणिक अवसर बेहद असमान हैं, वास्तविक योग्यता को आंकने के लिए उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है जिनमें छात्र सीखते हैं और प्रतिस्पर्धा करते हैं।’

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