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    संकट ईंधन की किल्लत से बहुत बड़ा है, लेकिन सरकार दे रही सिर्फ आश्वासन

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 6, 2026

    सरकार के बार-बार दिए जा रहे आश्वासनों के बावजूद ऐसी खबरें ईंधन उपलब्धता के सच पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

    हरजिंदर

    Published: 06 Jun 2026, 5:00 PM

    एलपीजी संकट की कहानी पुरानी हो चुकी है। महानगरों में रसोई गैस सिलेंडर अभी भी मिल रहे हैं, भले ही इसके लिए वितरण केन्द्रों के चक्कर काटने पड़ रहे हों। जबकि छोटे शहरों और कस्बों में एलपीजी डिपो के बाहर लंबी कतारें अब भी हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक है इस सबके दूरगामी नतीजे जो अब सामने आ रहे हैं। पूरे देश में परिवार खर्चों में कटौती करने को मजबूर हैं, कारोबारी भी इसके जुगाड़ तलाश रहे हैं और नीति-निर्माता इस बात की कोशिश में जुटे हैं कि आपूर्ति का संकट आर्थिक आपदा में न बदल जाए।

    संकट के शुरुआती संकेत मार्च में दिखने लगे थे। एलपीजी और ईंधन की कमी का असर विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ने लगा। उद्योग संगठनों के अनुसार, मुंबई के कुछ हिस्सों में लगभग 20 प्रतिशत होटल और रेस्तरां या तो बंद हो गए या उन्होंने अपने कामकाज में भारी कटौती कर दी। गुजरात के औद्योगिक केन्द्र मोरबी में लगभग 170 कारखानों के बंद होने की खबरें आईं, जिससे करीब एक लाख श्रमिक प्रभावित हुए।

    खाने-पीने का सामान बेचने वाले कई छोटे विक्रेताओं के लिए बदलते हालात के अनुरूप खुद को ढालने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने एलपीजी छोड़कर बिजली आधारित खाना पकाने के साधनों को अपनाना शुरू कर दिया। इंडक्शन और इन्फ्रारेड कुकटॉप की बिक्री में भारी वृद्धि दर्ज हुई। पूरे देश में जहां पहले ऐसे लगभग 2,000 कुकटाॅप ही बिकते थे, इनकी संख्या तेजी से बढ़कर दो लाख तक पहुंच गई।

    यह ‘समाधान’ अपने साथ एक नई समस्या लेकर आया। बिजली की मांग में तेज उछाल और विद्युत उत्पादन के लिए ईंधन की कमी के कारण अब कई शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नियमित लोड शेडिंग के अलावा लंबे बिजली कट भी झेलने पड़ रहे हैं। गैस से बिजली की ओर हुआ यह बदलाव केवल दबाव को एक संकटग्रस्त व्यवस्था से दूसरी संकटग्रस्त व्यवस्था की ओर ले गया।

    भारत सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के प्रावधानों का सहारा लिया, जिसके तहत अधिकारियों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए ईंधन गैस की आपूर्ति मोड़ने का अधिकार दिया गया। यह हस्तक्षेप कितना प्रभावी सिद्ध होगा, अभी साफ नहीं है। कमी अब रसोईघरों और कारखानों से आगे फैलती दिखाई दे रही है।

    मई के मध्य में पुणे से ये खबरें आईं कि कई पेट्रोल पंपों ने ईंधन की राशनिंग शुरू कर दी है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि तेल कंपनियों द्वारा लागू की गई सख्त राशनिंग का आंध्र प्रदेश पर कैसा प्रभाव पड़ा। वहां लंबी दूरी के ट्रकों और अंतरराज्यीय बसों को एक बार में केवल 200 लीटर ईंधन खरीदने की अनुमति दी गई। मजबूरी में उन्होंने पड़ोसी राज्यों में ईंधन भरवाना शुरू कर दिया, जिससे देरी हुई और साथ ही आंध्र प्रदेश को ईंधन कर से होने वाली आय का नुकसान भी हुआ।

    उत्तर प्रदेश के महाराजगंज से एक्स पर अपलोड किए गए एक वीडियो में पेट्रोल पंप पर लगी लंबी कतारें दिखाई देती हैं। वहां एक पुलिस वाहन के लाउडस्पीकर से बार-बार घोषणा की जा रही थी कि हर ग्राहक को केवल पांच लीटर डीजल ही दिया जाएगा।

    सरकार के बार-बार दिए जा रहे आश्वासनों के बावजूद ऐसी खबरें ईंधन उपलब्धता के सच पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

    भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 88 प्रतिशत जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और प्राकृतिक गैस का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के लापरवाह युद्ध ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में से एक, होर्मुज स्ट्रेट से होने वाले सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा और प्राकृतिक गैस आयात का लगभग एक-तिहाई इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर आता है।

    स्थिति को और गंभीर बनाती है भारत की सीमित सामरिक भंडारण क्षमता। देश के सामरिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) में केवल 5.33 मिलियन टन कच्चा तेल जमा किया जा सकता है। मौजूदा भंडार लगभग 3.37 मिलियन टन बताया गया है, जो कुल क्षमता का करीब 64 प्रतिशत है। यहां तक कि यदि भंडार 100 प्रतिशत भरा भी हो, तब भी यह देश की जरूरतों को केवल लगभग दो सप्ताह तक ही पूरा कर सकता है।

    इसके प्रभाव केवल परिवहन और रसोई गैस तक सीमित नहीं हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक किसान नेता का कहना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो सिंचाई के लिए डीजल की मांग में भारी वृद्धि हो सकती है। खरीफ सीजन के दौरान डीजल की किसी भी प्रकार की राशनिंग का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। पहले से ही बढ़ती लागत से जूझ रहे लाखों किसानों के लिए आने वाले महीने बेहद कठिन साबित हो सकते हैं।

    युद्ध शुरू होने के तीन महीने बाद अब कच्चे तेल की कमी लगभग हर चीज की कमी में बदलने का खतरा पैदा कर रही है। पेट्रोलियम केवल ईंधन नहीं है, यह आधुनिक उत्पादन का आधार है। घरेलू उपयोग की वस्तुएं, प्लास्टिक बैग, प्लास्टिक ढक्कन, क्रेट, सिंथेटिक वस्त्र, पैकेजिंग सामग्री, जूता और फर्नीचर उद्योग में इस्तेमाल होने वाले चिपकाने वाले पदार्थ, मशीनों के लिए औद्योगिक स्नेहक, पेंट और सफाई प्रक्रियाओं में प्रयुक्त सॉल्वेंट, ये सभी पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं। बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों ने कीमतें बढ़ाने की चेतावनी दी है। कंडोम निर्माता भी यही संकेत दे रहे हैं। जैसे-जैसे कमी बढ़ेगी, लगभग हर विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ती लागत का सामना करना पड़ेगा।

    शायद सबसे बड़ा खतरा कृषि क्षेत्र के सामने है। खरीफ बुवाई का मौसम नजदीक आने के साथ उर्वरकों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बन गई है। भारत उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक फॉस्फेट, पोटाश और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा आयात करता है। इन आपूर्तियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा या तो होर्मुज जलडमरूमध्य से आता है या उससे जुड़े मार्गों से गुजरता है।

    कृषि का काम कैलेंडर के हिसाब से चलता है और उसमें देरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। फसलों की की एक खास स्थिति पर उर्वरकों की आवश्यकता होती है। देर से पहुंची आपूर्ति की भरपाई बाद में नहीं की जा सकती। यदि उर्वरक देर से पहुंचते हैं तो उत्पादन घटेगा ही। यदि उनकी कीमत किसानों की पहुंच से बाहर हो जाती है तो किसान उनका कम उपयोग करेंगे और नतीजा वही होगा- उत्पादन में गिरावट।

    संयुक्त किसान मोर्चा के डॉ. सुनीलम कहते हैं कि पानी के बाद उर्वरक किसान की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्हें आशंका है कि अगर किल्लत लंबे समय तक बनी रही तो व्यापक अशांति, यहां तक कि उर्वरक-दंगे भी भड़क सकते हैं। पिछले रबी सीजन में, जब खाड़ी क्षेत्र में कोई युद्ध नहीं था, तब भी कई इलाकों के किसानों को उर्वरकों की कमी का सामना करना पड़ा था और उन्हें कथित तौर पर अनौपचारिक चैनलों से ऊंची कीमतों पर खरीदारी करनी पड़ी थी। यह संकट अब कहीं अधिक गंभीर रूप ले सकता है।

    सरकार द्वारा विकल्प के रूप में प्रचारित नैनो यूरिया और नैनो डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) को किसानों के बीच बहुत कम स्वीकार्यता मिली है। किसानों का कहना है कि ये उत्पाद पारंपरिक उर्वरकों का पर्याप्त विकल्प नहीं हो सकते।

    चिंता केवल उर्वरकों तक सीमित नहीं है। कीटनाशकों, फफूंदनाशकों और खरपतवारनाशकों में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण रसायनों की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। हर बाधा लागत बढ़ाती है और कृषि उत्पादन को खतरे में डालती है। फिलहाल भारत के पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार हो सकता है, लेकिन भविष्य में उत्पादन में गिरावट निश्चित रूप से खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगी और ग्रामीण त्रासदी को और गहरा करेगी।

    व्यापक आर्थिक परिदृश्य भी उतना ही चिंताजनक है। हाल ही में प्रकाशित एक ब्लॉग में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने कहा कि दुनिया ऐसे समय में इस संघर्ष के बहुआयामी प्रभावों का सामना कर रही है, जब कई अर्थव्यवस्थाओं में अतिरिक्त झटकों को सहन करने की क्षमता सीमित है। निष्कर्ष स्पष्ट और चिंताजनक थाकृऊंची कीमतें और धीमी आर्थिक वृद्धि।

    भारत पहले से ही आपूर्ति पक्ष की बाधाओं से उत्पन्न मुद्रास्फीति के दबावों से जूझ रहा है। पश्चिम एशिया संकट इन चुनौतियों में एक नई और शक्तिशाली परत जोड़ सकता है।

    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी सीआरआईएसआईएल पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि इसका प्रभाव केवल ऊर्जा बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत में वृद्धि खाद्य मुद्रास्फीति और मूल महंगाई दोनों को बढ़ाएगी, जिससे लगभग हर परिवार प्रभावित होगा।

    ठीक उसी समय जब महंगाई केन्द्रीय आर्थिक चिंता बनती जा रही है, सरकार ने उसे मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सांख्यिकीय ढांचे में बदलाव करने का फैसला किया है। पैमाना बदल देने से बढ़ती कीमतों और आवश्यक वस्तुओं की घटती उपलब्धता से जूझ रहे आम नागरिकों का बोझ कम नहीं होने वाला।

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