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    पश्चिम में क्यों अप्रिय होते जा रहे हैं भारतीय?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 15, 2026

    प्रवासियों को बलि का बकरा बनाने वाले धुर-दक्षिणपंथी विस्तार और खुद भारतीयों का नस्लीय और जातिगत पूर्वाग्रहों, सांस्कृतिक अहंकार और जहरीले हिन्दुत्व को समर्थन जिसने पीढ़ियों से अर्जित सद्भावना को मिट्टी में मिला दिया है।

    अशोक स्वैन

    Published: 15 Jun 2026, 3:00 PM

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    पांच साल पहले, मैंने ‘हिन्दूफोबिया’ के मिथक को खारिज करते हुए एक लेख लिखा था। यह वह दौर था जब उत्तरी अमेरिका और यूरोप के कई हिन्दुत्ववादी संगठन ‘इस्लामोफोबिया’ की राजनीतिक काट के रूप में इस शब्द को आमफहम बनाने की कोशिश कर रहे थे। रणनीति साफ थी: अगर मुस्लिम भेदभाव, पूर्वाग्रह और हिंसा के इर्द-गिर्द गोलबंद हो सकते हैं, तो हिन्दू भी भारत में हिन्दुत्व की राजनीति को सुरक्षा कवच देने के लिए अपने ऊपर मंडराते खतरों का हौवा खड़ा कर सकते हैं। इसके तहत भारत में बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की आलोचना को ‘हिन्दू-नफरत’ के रूप में नया रंग देकर पेश किया गया।

    पांच साल बीत चुके हैं और यह धंधा आज भी फल-फूल रहा है। डॉनल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी ने पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथी आंदोलनों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। प्रवासियों के खिलाफ बयानबाजी अब वहां की मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। श्वेत राष्ट्रवादी समूह, जो कभी राजनीतिक हाशिये पर थे, आज कहीं ज्यादा प्रभाव का आनंद ले रहे हैं। इस नए माहौल में, विदेशों में रहने वाले भारतीय खुद को नस्लवाद और बाहरी लोगों के प्रति नफरती भावना का सामना कर रहे हैं।

    इस कड़वी हकीकत को स्वीकार किया जाना चाहिए। भारत और भारतीयों के खिलाफ नफरत की यह भावना वास्तविक है, बदसूरत है और लगातार बढ़ रही है। आयरलैंड, इटली, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीयों पर होने वाले हमलों की खबरें अब आम हैं। सोशल मीडिया पर भारतीयों के खिलाफ खुलकर नस्लीय और अपमानजनक टिप्पणियां की जा रही हैं।

    अमेरिका में विवेक रामास्वामी जैसे अत्यधिक सफल भारतीय-अमेरिकी, जिन्होंने बड़े उत्साह के साथ खुद को ट्रंप से जोड़ा था, भी अब समझ चुके हैं कि उनकी राजनीतिक वफादारी नस्लीय पूर्वाग्रहों से उनकी रक्षा नहीं कर सकती। श्वेत वर्चस्ववादियों के लिए भारतीय हमेशा ‘बाहरी’ ही रहेंगे, चाहे उनकी दौलत, शिक्षा, राजनीतिक विचार या पेशेवर हैसियत कितनी ही ऊंची क्यों न हो।

    लेकिन, भारतीयों के खिलाफ होने वाले इस नस्लवाद को ‘हिन्दूफोबिया’ का नाम नहीं दिया जा सकता। भारतीयों के प्रति इस शत्रुता की जड़ें उनकी हिन्दू पहचान में नहीं है। यह आंशिक रूप से नस्लीय पूर्वाग्रह, आर्थिक असुरक्षा और प्रवासी-विरोधी राजनीति का हिस्सा है।

    दशकों तक, विदेशों में भारतीयों की छवि बेहद अनुकरणीय रही। उन्हें मेहनती, शिक्षित, उद्यमशील और कानून का पालन करने वाले ‘आदर्श प्रवासियों’ के रूप में देखा जाता था। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा जगत, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों ने उन्हें सम्मान और सराहना दिलाई। लेकिन अब भारतीयों के प्रति यह बुनियादी नजरिया बदल रहा है।

    इस बदलाव का सबसे मुख्य कारण प्रवासियों का अंध-राष्ट्रवाद है। पिछले लगभग दस वर्षों में, मोदी सरकार ने प्रवासी भारतीयों में ‘सभ्यतागत गौरव’ को कूट-कूट कर भरने की कोशिश की है। अपनी विरासत या सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करना एक बात है, लेकिन जब यह गर्व अहंकार में बदल जाए, तो यह दूसरों को उकसाने का काम करता है।

    विदेशों में रहने वाले कई संपन्न भारतीय, विशेष रूप से उच्च जाति के हिन्दू, खुद को महज एक सफल प्रवासी के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक महाशक्ति के प्रतिनिधियों के रूप में देखने लगे हैं। उन्होंने इस भ्रामक नैरेटिव को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है कि मोदी के नेतृत्व में भारत एक ‘विश्वगुरु’ या महाशक्ति बन चुका है, जो वैश्विक मंच पर अपना खोया हुआ हक वापस ले रहा है। इस भ्रम ने उनके भीतर एक अवांछित अहंकार को जन्म दिया है।

    प्रवासी भारतीयों के कुछ हलकों में अब अन्य प्रवासी समुदायों को नीची नजर से देखने और स्थानीय समाज से विशेष व्यवहार की उम्मीद करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। पेशेवर सफलता ने उनके मन में यह उम्मीद जगा दी है कि वे अधिक पहचान और प्रभाव के हकदार हैं। उनके इस बढ़े हुए अहंकार और विशेषाधिकार की भावना पर पश्चिमी समाज की नजर पड़ चुकी है।

    प्रवासी भारतीयों का यह सांस्कृतिक अहंकार, आक्रामक राष्ट्रवाद और स्थानीय सामाजिक मानदंडों के प्रति सम्मान की कमी अब पश्चिम में सार्वजनिक बहसों का हिस्सा बन रही है। वहां के बुद्धिजीवी अब उन समाजों के अंतर्विरोधों पर सवाल उठा रहे हैं जो एक तरफ जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं और दूसरी तरफ समानता को बुनियादी मूल्य मानने वाले देशों में रहते हैं। विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों और सामाजिक संगठनों में अब जातिगत पहचान को लेकर ऐसे तनाव देखे जा रहे हैं, जिनसे पश्चिम का सामना पहले कभी नहीं हुआ था।

    भारतीय पर्यटक भी प्रवासी भारतीयों की इस खराब होती छवि में योगदान दे रहे हैं। सोशल मीडिया ऐसे वीडियो से भरा पड़ा है जहां भारतीय पर्यटक नियमों की अनदेखी करते, सार्वजनिक स्थानों पर हुड़दंग मचाते, स्थानीय रीति-रिवाजों का अपमान करते या गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करते दिखते हैं। मुमकिन है कि ऐसे लोग बेहद कम हों, लेकिन हम उस दौर में जी रहे हैं जहां आंकड़ों से ज्यादा वीडियो का वायरल होना मायने रखता है।

    इस व्यवहार की सबसे बड़ी खासियत वह विशेषाधिकार की भावना है जो दुनिया में भारत की बढ़ती साख और मोदी के वैश्विक कद के भ्रामक प्रचार से पैदा होती है। मोदी सरकार के राष्ट्रवादी दुष्प्रचार के लगातार संपर्क में रहने के कारण इस हुड़दंगी जमात को लगता है कि भारत पहले ही महाशक्ति बन चुका है; मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता हैं; ‘भारतीय संस्कृति’ की हर जगह पूजा होती है; और भारतीय जहां भी जाएंगे, उन्हें विशेष सम्मान मिलेगा। जब यह काल्पनिक दर्जा जमीनी हकीकत से टकराता है, तो वहां ऐसा व्यवहार पैदा होता है जिसे स्थानीय लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते।

    इसका मतलब यह कतई नहीं है कि नस्लवाद को जायज ठहराया जा सकता है। कभी नहीं। नस्लीय हरकतों की पूरी जिम्मेदारी हमेशा जुल्म करने वाले की होती है। फिर भी, इन नकारात्मक धारणाओं के फैलने के कारणों को समझने के लिए केवल निंदा करना काफी नहीं है। इसके लिए उस सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ को गहराई से समझना होगा जिसमें ये धारणाएं अपनी जगह बना रही हैं।

    एक और असहज करने वाली हकीकत खुद भारतीय समुदाय के भीतर मौजूद नस्लवाद और पूर्वाग्रहों से जुड़ी है। मुस्लिम-विरोधी पूर्वाग्रह, अश्वेतों के प्रति रूढ़िवादी सोच, शरणार्थियों के प्रति शत्रुता और विभाजनकारी राष्ट्रवादी राजनीति का समर्थन अब प्रवासी भारतीयों की पहचान बनता जा रहा है। अंतर्विरोध चौंकाने वाला है: भारतीयों के खिलाफ होने वाले नस्लवाद की सबसे तेज आवाज में आलोचना करने वाले लोग ही भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रवासियों, मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को खलनायक बनाने वाले राजनीतिक आंदोलनों का समर्थन करते हैं।

    यह अंतर्विरोध ट्रंप और अन्य धुर-दक्षिणपंथी आंदोलनों का समर्थन करने वाले भारतीयों में साफ दिखता है। कई लोगों का मानना था कि उनकी आर्थिक सफलता और राजनीतिक वफादारी उन्हें रूढ़िवादी राष्ट्रवादी हलकों में स्वीकार्यता दिला देगी। उन्होंने दूसरों के खिलाफ की जाने वाली प्रवासी-विरोधी बयानबाजी का खुशी-खुशी समर्थन किया, यह सोचकर कि वे खुद इसके दुष्परिणामों से सुरक्षित रहेंगे। लेकिन श्वेत राष्ट्रवाद कभी भी हिन्दुओं और मुसलमानों, सिखों या ईसाइयों के बीच फर्क नहीं करता, न ही अमीर और गरीब के बीच, और न रूढ़िवादी और उदारवादी के बीच। जब नस्लीय असुरक्षा बढ़ती है, तो हर ‘विदेशी’ उसका निशाना बनता है।

    हालांकि भारतीयों के खिलाफ नस्लवाद वास्तविक है, लेकिन विदेशों में रहने वाले भारतीयों को हर सामाजिक आलोचना को ‘नस्लवाद’ का बाना पहनाने की आदत से बचना होगा। सामाजिक व्यवहार के बारे में की जाने वाली हर शिकायत जेनोफोबिक नहीं होती। जातिगत भेदभाव पर चर्चाएं भारत-विरोधी नहीं हैं। और न ही भारत में बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की आलोचना करना हिन्दू धर्म पर हमला है।

    पश्चिमी दुनिया के कुछ हिस्सों में भारतीयों को जिस शत्रुता का सामना करना पड़ रहा है, वह दो समानांतर घटनाक्रमों का नतीजा है। यह जितना प्रवासियों को बलि का बकरा बनाने वाले धुर-दक्षिणपंथ के विस्तार से पैदा हुआ है, उतना ही खुद भारतीयों के नस्लीय और जातिगत पूर्वाग्रहों, सांस्कृतिक अहंकार और जहरीले हिन्दुत्व के समर्थन का भी नतीजा है, जिसने पीढ़ियों से अर्जित सद्भावना को मिट्टी में मिला दिया है।

    पश्चिम में प्रवासी भारतीयों का भविष्य न केवल नस्लवाद का विरोध करने पर, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी के गुणों को फिर से तलाशने पर निर्भर करता है; इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वे उन समाजों के प्रति सम्मानजनक हो सकते हैं जिनमें वे अब रह रहे हैं, और उन देशों का आदर कर सकते हैं जिन्हें वे अब अपना घर कहते हैं।

    अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं

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