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    तैयार हो जाइए सूखे के लिए, अल नीनो स्थापित हो चुका है और गायब बादलों के बीच बिलख रहे हैं खेत

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 22, 2026

    मानसून के पहले का मौसम लोगों को पसीने से तर कर रहा है। इससे उस आशंका की पुष्टि हुई, जिसे लेकर लोग डर रहे थे।

    उपग्रह से मिली तस्वीरों में मानसून के बादल अदृश्य हो चके हैं हैं। मौसम विभाग और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट के बता रही हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के बड़े हिस्सों में अचानक कमजोर पड़ गया है। ऊपरी वायुमंडल में हवा के पैटर्न में बदलाव से खरीफ बुवाई के महत्वपूर्ण मौसम की शुरुआत में ही मानसून में विराम लग गया है।

    इस समय जब मानसून के पहले का मौसम लोगों को पसीने से तर कर रहा है, उस आशंका की पुष्टि हो चुकी है, जिसे लेकर लोग डर रहे थे। अल नीनो आधिकारिक रूप से स्थापित हो चुका है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आगे चलकर यह एक शक्तिशाली ‘सुपर’ अल नीनो घटना का रूप भी ले सकता है।

    ग्रीष्मकालीन मानसून देश की कुल सालाना वर्षा में लगभग 82 प्रतिशत योगदान देता है। इसमें 10-20 प्रतिशत की कमी भी कृषि के लिए आफत बन सकती है, ग्रामीण रोजगारों को नुकसान पहुंचा सकती है और आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है। इस बार मौसम विभाग ने 90 प्रतिशत यानी सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है। केन्द्र सरकार ने पहले ही 150-200 संवेदनशील जिलों को विशेष निगरानी में रखा है, क्योंकि अगस्त और सितंबर में वर्षा की कमी से कृषि संकट का खतरा हो सकता है।

    भारत के सामने खड़ा संकट केवल कमजोर मानसून तक सीमित नहीं है। यह अल नीनो हमें याद दिला रहा है कि भरोसेमंद मानसून का युग अब समाप्ति की ओर है। देश अब किसी अस्थायी मौसमीय झटके से नहीं जूझ रहा, बल्कि उस स्थिति से गुजर रहा है जिसे कई विशेषज्ञ स्थायी “जल दिवालियेपन” (वॉटर बैंकरप्सी) की अवस्था बताते हैं।

    संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी भी दी है कि दुनिया के कई हिस्से “जल दिवालियेपन” के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहां भूजल भंडार और मिट्टी की नमी प्रकृति द्वारा पुनर्भरण किए जाने की क्षमता से कहीं तेज गति से समाप्त हो रहे हैं।

    ये चेतावनी भारत के लिए काफी अहम है। दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का घर होने के बावजूद, भारत के पास विश्व के मीठे जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। इसलिए यह संकट भारत पर सबसे भारी है।

    केन्द्रीय जल आयोग के अनुसार, भारत के पास लगभग 1,123 अरब घन मीटर (बीसीएम) उपयोग योग्य जल संसाधन हैं। इनमें से 690 बीसीएम सतही जल से और 433 बीसीएम भूजल से प्राप्त होते हैं। कृषि इन संसाधनों का लगभग 80 प्रतिशत उपभोग करती है, जबकि घरेलू और औद्योगिक उपयोगकर्ता बाकी 20 प्रतिशत साझा करते हैं। कृषि केवल पानी की उपभोक्ता नहीं है वह भारत की जल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी “ऋणी” भी है।

    भारत के जल संकट का सबसे चिंताजनक पहलू दिखाई नहीं देता। पिछले पांच दशकों में भूजल की खपत लगभग 500 प्रतिशत बढ़ चुकी है। जिससे 1980 के दशक के बाद से देश में औसत भूजल स्तर आठ मीटर से अधिक नीचे चला गया है।

    इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है। कभी हरित क्रांति की जन्मभूमि कहलाने वाले इस राज्य में भूजल स्तर लगातार गिरता गया है। वर्ष 1973 से 2016 के यहां पानी 4.82 मीटर की गहराई पर मिल जाता था। अब 14.55 मीटर पर भी मुश्किल से मिलता है। यह क्षरण धीमा और अदृश्य, लेकिन विनाशकारी है। बाढ़ की तरह यह अचानक नहीं आता, बल्कि धरती के भीतर चुपचाप फैलता है और वर्ष-दर-वर्ष कृषि की पारिस्थितिक नींव को कमजोर करता रहता है। विडंबना यह है कि जिन नीतियों ने कभी भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की थी, वही आज उसकी जल असुरक्षा में योगदान दे रही हैं।

    अनुसंधान लगातार संकेत दे रहे हैं कि सरकारी खरीद नीतियों और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था ने अनजाने में एक पारिस्थितिक जाल तैयार कर दिया है। चावल और गेहूं की सुनिश्चित खरीद ने किसानों को उन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया, जिन्हें भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। आज चार फसलें- धान, गन्ना, गेहूं और कपास हर साल लगभग 700 बीसीएम पानी की खपत करती हैं, जो भारत के कुल उपयोग योग्य जल संसाधनों का लगभग 60 प्रतिशत है। महज एक किलोग्राम चावल पैदा करने के लिए लगभग 2,500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

    यह कहानी केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश में वर्ष 2008 के बाद सरकारी गेहूं खरीद में भारी वृद्धि हुई। राज्य द्वारा खरीद बोनस शुरू किए जाने के बाद गेहूं की खरीद 2007 के मात्र 57,000 टन से बढ़कर 2008 में 24 लाख टन हो गई। इससे किसानों ने स्वाभाविक रूप से गेहूं की खेती का रकबा बढ़ा दिया। इससे सिंचित गेहूं क्षेत्र तेजी से बढ़ा, ट्यूबवेलों पर निर्भरता बढ़ी, उथले कुएं सूखने लगे और किसानों को गहरे बोरवेल लगाने पड़े।

    हालांकि, जल संकट का अर्थ केवल पानी की कमी नहीं है। हरियाणा के कुछ हिस्सों, विशेषकर रोहतक-झज्जर क्षेत्र में, किसानों को बिल्कुल विपरीत समस्या का सामना करना पड़ रहा है- पानी का खेतों में फंस जाना। रोहतक के भालौत जैसे गांव जलभराव और मिट्टी की लवणता से जूझ रहे हैं। दशकों की नहर सिंचाई, खराब जल निकासी और धान की खेती ने भूजल स्तर को सतह के बेहद करीब ला दिया है। किसान एक भूमिगत परत का उल्लेख करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में “चावा” कहा जाता है। यह केशिका यानी कैपलरी प्रोसेस के खारा पानी ऊपर खींच लाती है।

    जहां भारत का बड़ा हिस्सा पानी की कमी से जूझ रहा है, वहीं किसान उपजाऊ भूमि को अनुपजाऊ बनते देख रहे हैं। उनके लिए समाधान अधिक सिंचाई नहीं, बल्कि गहरी जल निकासी प्रणालियां हैं, जो “चावा” को तोड़ सकें और ठहरे हुए खारे पानी को बाहर निकाल सकें। यह एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि भारत का जल संकट एक समान नहीं है। यह विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग रूप धारण करता है और इसके समाधान भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए।

    कमजोर मानसून को देखते हुए केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने राज्यों को जिला आकस्मिक योजनाओं (डिस्ट्रिक्ट कंटिन्जेंसी प्लान) को तैयार करने का निर्देश दिया है। सुझाव दिया गया है कि बारिश कम होती है तो किसान बाजरा, अरहर और ज्वार जैसी सूखा बर्दाश्त कर सकने वाली फसलों की ओर रुख करें। हालांकि, किसान ऐसे उपदेशों से दूर ही रहते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक किसान नेता कहते हैं, “कहना आसान है, करना नहीं। इन फसलों के लिए कोई पक्का बाजार ही नहीं है। किसान ऐसी फसल नहीं उगाएंगे जिसे वे बेच ही न सकें।”

    कृषि पहले ही कम मुनाफे और अधिक जोखिम वाला व्यवसाय बन चुकी है। वैकल्पिक फसलों के लिए खरीद व्यवस्था और बाजार विकसित किए बिना किसानों से पारंपरिक फसलें छोड़ने को कहना, जोखिम को सरकार से हटाकर सीधे किसान पर डाल देना है।

    विशेषज्ञों का तर्क है कि यह लचीलापन (रेजिलिएंस) ऐसी सलाहों से नहीं आने वाला। भारत को जल उपयोग के सरल आकलन से आगे बढ़ना होगा। नीति-निर्माताओं को केवल यह मापने के बजाय कि खेतों में कितना पानी लगाया गया, इस पर ध्यान देना होगा कि फसलें वास्तव में कितना पानी उपभोग करती हैं। ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकें खेत स्तर पर पानी बचा सकती हैं, लेकिन अधिक गहन खेती के मामले में इससे कुल जल दोहन बढ़ भी सकता है। खरीद और सब्सिडी नीतियों को इस प्रकार बनाना होगा कि वे केवल उत्पादन मात्रा के बजाय फसल विविधीकरण और पारिस्थितिक स्थिरता को प्रोत्साहित करें।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नीति-निर्माण किसान-केन्द्रित होना चाहिए। किसान अपने स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को दूर बैठे नौकरशाहों की तुलना में कहीं बेहतर समझते हैं। सूखे, जलभराव, मिट्टी के क्षरण और बाजार की विफलताओं से जुड़े उनके अनुभव भविष्य की जल और कृषि नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत के सामने चुनौती केवल अधिक खाद्यान्न उत्पादन की नहीं है।

    असल चुनौती यह है कि पर्यावरण को बरबाद किए बिना खाद्य उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए। भारत की भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल आसमान से बरसने वाले मानसून पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि उस पानी पर भी निर्भर करेगी जो अभी उसकी मिट्टी के नीचे बचा हुआ है। सवाल यह है कि क्या नीति-निर्माता उस छिपे हुए भंडार के पूरी तरह समाप्त होने से पहले कदम उठाएंगे?

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