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    एथेनॉल मिश्रणः हरित ईंधन का सपना या पर्यावरणीय संकट की नई भूमिका?

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 8, 2026

    प्रश्न यह नहीं है कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि क्या वह वास्तव में उतना हरित है जितना बताया जा रहा है? क्या भारत जैसी जल-संकटग्रस्त और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था में यह नीति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ सिद्ध होगी?

    शैलेंद्र चौहान

    Published: 08 Jul 2026, 5:00 PM

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    इतिहास

    ऊर्जा के क्षेत्र में शायद ही कोई नीति पिछले कुछ वर्षों में उतनी तेजी से चर्चा के केंद्र में आई हो जितनी पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की नीति। इसे भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन से निपटने की एक महत्त्वाकांक्षी रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकारी दावों के अनुसार एथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आधार मिलेगा। भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि सरकार स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में यह कह चुकी है कि E20 कार्यक्रम के समग्र परिणामों का आकलन अभी जारी है और इसे पूरी तरह स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

    लेकिन किसी भी सार्वजनिक नीति का मूल्यांकन केवल उसके घोषित उद्देश्यों से नहीं किया जा सकता। विज्ञान और लोकतंत्र दोनों की मांग है कि हर दावे की निष्पक्ष जांच हो। यही कारण है कि एथेनॉल मिश्रण को लेकर आज विश्वभर में वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के बीच गंभीर बहस चल रही है। प्रश्न यह नहीं है कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि क्या वह वास्तव में उतना “हरित” है जितना उसे बताया जा रहा है? क्या उसके पर्यावरणीय लाभ उसके सामाजिक और पारिस्थितिक दुष्प्रभावों से अधिक हैं? क्या भारत जैसी जल-संकटग्रस्त और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था में यह नीति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ सिद्ध होगी?

    एथेनॉल एक सरल रासायनिक यौगिक (C₂H₅OH) है, जिसे मुख्यतः गन्ने के शीरे, गन्ने के रस, मक्का, टूटे चावल और अन्य स्टार्चयुक्त या शर्करायुक्त कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसे जैव-ईंधन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका स्रोत जीवित जैविक पदार्थ हैं। पेट्रोल में मिलाने पर इसकी उच्च ऑक्टेन संख्या इंजन के दहन को अधिक समान बनाती है और कुछ प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी ला सकती है। यही कारण है कि अमेरिका, ब्राज़ील, भारत और अनेक अन्य देशों ने विभिन्न स्तरों पर एथेनॉल मिश्रण को अपनाया है।

    किन्तु विज्ञान किसी ईंधन का मूल्यांकन केवल एग्जॉस्ट पाइप से निकलने वाले धुएं के आधार पर नहीं करता। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान में लाइफ साइकिल असेसमेंट (LCA) को सबसे विश्वसनीय पद्धति माना जाता है। इसका अर्थ है कि किसी उत्पाद के पूरे जीवन-चक्र- फसल की बुवाई, सिंचाई, उर्वरकों का निर्माण, कीटनाशकों का उपयोग, कृषि मशीनों में खर्च होने वाला डीज़ल, परिवहन, एथेनॉल संयंत्रों में प्रसंस्करण, आसवन और अंततः वाहन में उसके दहन- सभी चरणों का समग्र विश्लेषण किया जाए।

    यहीं से एथेनॉल के बारे में प्रचलित अनेक धारणाएं चुनौती के घेरे में आ जाती हैं। अक्सर कहा जाता है कि एथेनॉल “कार्बन-न्यूट्रल” है क्योंकि जितनी कार्बन डाइऑक्साइड उसके जलने पर निकलती है, उतनी ही उसकी फसलें अपने विकास के दौरान वायुमंडल से अवशोषित कर लेती हैं। यह तर्क सुनने में आकर्षक अवश्य लगता है, किंतु अधूरा है। फसल उगाने के लिए प्रयुक्त नाइट्रोजन उर्वरकों का निर्माण अत्यधिक ऊर्जा-प्रधान प्रक्रिया है। सिंचाई के लिए बिजली या डीजल की आवश्यकता होती है। ट्रैक्टर और हार्वेस्टर जीवाश्म ईंधन पर चलते हैं। एथेनॉल के आसवन में बड़ी मात्रा में ऊष्मा ऊर्जा खर्च होती है। यदि यह ऊर्जा कोयले या प्राकृतिक गैस से प्राप्त हो रही हो, तो एथेनॉल का वास्तविक कार्बन लाभ उल्लेखनीय रूप से कम हो जाता है।

    इसलिए वैज्ञानिक केवल टेलपाइप उत्सर्जन नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-चक्र का अध्ययन करते हैं। भारत पर किए गए हालिया जीवन-चक्र अध्ययनों में पाया गया है कि एथेनॉल मिश्रण से जलवायु और जीवाश्म ईंधन उपयोग में लाभ मिल सकते हैं, लेकिन भूमि उपयोग, जल-क्षय और कृषि-रसायनों से जुड़े दुष्प्रभाव भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

    यही कारण है कि एथेनॉल को न तो पूर्णतः पर्यावरण-मित्र कहा जा सकता है और न ही पूर्णतः पर्यावरण-विरोधी। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस कच्चे माल से तैयार किया गया है, किस तकनीक से निर्मित हुआ है और उसके उत्पादन में ऊर्जा का स्रोत क्या है।

    एक दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न ऊर्जा दक्षता का है। एथेनॉल का ऊष्मीय मान पेट्रोल की तुलना में लगभग एक-तिहाई कम है। अर्थात समान दूरी तय करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक ईंधन की आवश्यकता होती है। आधुनिक इंजन इस अंतर की कुछ हद तक भरपाई कर लेते हैं, लेकिन ऊर्जा के भौतिक नियमों को बदला नहीं जा सकता। इसलिए एथेनॉल मिश्रण का अर्थ केवल पेट्रोल का विकल्प नहीं, बल्कि ऊर्जा घनत्व में भी परिवर्तन है। कुछ वाहन निर्माताओं ने भी स्वीकार किया है कि E20 ईंधन पर माइलेज में थोड़ी कमी आ सकती है, यद्यपि इसे सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त बताया गया है।

    यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि किसी नीति की सफलता केवल प्रयोगशाला के परिणामों से निर्धारित नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्यांकन खेतों, कारखानों, बाजारों और समाज में दिखाई देने वाले प्रभावों से होता है। यदि किसी हरित तकनीक को अपनाने के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन करना पड़े, खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो, जैव विविधता नष्ट हो और छोटे किसानों पर अतिरिक्त दबाव पड़े, तो उसकी पर्यावरणीय उपयोगिता स्वतः संदिग्ध हो जाती है। इसलिए एथेनॉल पर बहस केवल ईंधन की नहीं, बल्कि विकास के उस मॉडल की बहस भी है जिसे भारत आने वाले दशकों के लिए चुनना चाहता है।

    एथेनॉल नीति के समर्थक और आलोचक- दोनों अपने-अपने तर्क रखते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि इन दोनों अतियों से बचते हुए प्रमाणों का विश्लेषण करने की अपेक्षा करती है। इसलिए आवश्यक है कि इस नीति को न तो अंध-समर्थन मिले और न ही पूर्वाग्रहपूर्ण विरोध। आवश्यकता तथ्यों पर आधारित संतुलित मूल्यांकन की है। इसी मूल्यांकन के क्रम में अगला प्रश्न हमें भारत के सबसे बड़े पर्यावरणीय संकट- जल, कृषि और खाद्य सुरक्षा- की ओर ले जाता है, जहां एथेनॉल नीति के वास्तविक प्रभाव अधिक स्पष्ट होकर सामने आते हैं।

    इतिहास

    यदि एथेनॉल मिश्रण की नीति का सबसे गंभीर और दूरगामी पक्ष कोई है, तो वह है- जल, कृषि और खाद्य सुरक्षा पर उसका प्रभाव। भारत जैसे देश में, जहां कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है, किसी भी जैव-ईंधन नीति का मूल्यांकन इन प्रश्नों से अलग करके नहीं किया जा सकता। भारत आज विश्व के सबसे अधिक भूजल दोहन करने वाले देशों में है। अनेक राज्यों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप भी अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। ऐसे समय में गन्ने जैसी अत्यधिक जल-आधारित फसल पर आधारित एथेनॉल उत्पादन गंभीर चिंताओं को जन्म देता है।

    गन्ना भारत की कुल कृषि भूमि का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा घेरता है, लेकिन सिंचाई के जल का असमान रूप से बड़ा भाग उपयोग करता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां पहले से जल-संकट मौजूद है, गन्ने के विस्तार ने जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाला है। विडंबना यह है कि कई बार सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी गन्ना इसलिए बोया जाता है क्योंकि उसका सरकारी समर्थन मूल्य और औद्योगिक बाजार अपेक्षाकृत सुनिश्चित होता है। यदि एथेनॉल की बढ़ती मांग गन्ने की खेती को और प्रोत्साहित करती है, तो इसका परिणाम भूजल के और अधिक दोहन के रूप में सामने आ सकता है।

    यही कारण है कि अनेक जल वैज्ञानिक ‘वाटर फुटप्रिंट’ अर्थात जल पदचिह्न की अवधारणा पर बल देते हैं। किसी उत्पाद के निर्माण में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कितना जल खर्च हुआ, इसका समग्र आकलन ही उसका वास्तविक जल पदचिह्न है। एथेनॉल के संदर्भ में यह पदचिह्न अत्यंत बड़ा हो सकता है, विशेषकर तब जब उसका स्रोत सिंचित गन्ना या मक्का हो। इस दृष्टि से देखा जाए तो पेट्रोल की जगह एथेनॉल का प्रयोग केवल ऊर्जा का प्रश्न नहीं, बल्कि जल संसाधनों के पुनर्वितरण का भी प्रश्न बन जाता है।

    इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ता है। अर्थशास्त्र में एक प्रसिद्ध प्रश्न है- “Food versus Fuel”, अर्थात भोजन या ईंधन? यदि उपजाऊ भूमि, सिंचाई का पानी और कृषि निवेश का बड़ा हिस्सा ईंधन उत्पादन के लिए प्रयुक्त होगा, तो भोजन के उत्पादन पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यह प्रभाव हर वर्ष स्पष्ट दिखाई दे, ऐसा आवश्यक नहीं; किंतु दीर्घकाल में कृषि की दिशा बदल सकती है।

    भारत ने एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल शीरे तक अपने को सीमित नहीं रखा है। अब गन्ने के रस, टूटे चावल और मक्का का उपयोग भी बढ़ रहा है। यह परिवर्तन आर्थिक दृष्टि से आकर्षक दिखाई देता है, लेकिन यही वह बिंदु है जहां खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे के सामने खड़ी हो जाती हैं। जब किसी खाद्यान्न की कीमत ईंधन उद्योग निर्धारित करने लगे, तब गरीब उपभोक्ता सबसे पहले प्रभावित होता है।

    इतिहास भी इस आशंका की पुष्टि करता है। वर्ष 2007-08 के वैश्विक खाद्य संकट के दौरान अनेक शोधों में यह निष्कर्ष सामने आया कि अमेरिका और यूरोप में जैव-ईंधनों के लिए मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग ने खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ाया। यद्यपि खाद्य मूल्य वृद्धि के पीछे कई अन्य कारण भी थे, फिर भी जैव-ईंधन नीति को उनमें एक महत्त्वपूर्ण कारक माना गया।

    भारत की स्थिति अमेरिका या ब्राजील से भिन्न है। यहां बड़ी आबादी आज भी सीमित आय पर निर्भर है और कुपोषण की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में खाद्यान्नों का एक भाग ईंधन उद्योग की ओर मोड़ने के निर्णय को केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं आँका जा सकता।

    एथेनॉल नीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भूमि उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) है। यदि जैव-ईंधनों की बढ़ती मांग के कारण अधिक भूमि गन्ने या मक्का जैसी फसलों के अधीन आती है, तो इसका प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहता। कई देशों में जंगलों, घासभूमियों और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को कृषि भूमि में बदले जाने के उदाहरण सामने आए हैं। इससे जैव विविधता को क्षति पहुंचती है, मिट्टी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है और बड़ी मात्रा में कार्बन वातावरण में उत्सर्जित होता है।

    यही कारण है कि पर्यावरण वैज्ञानिक अब प्रत्यक्ष (Direct) और अप्रत्यक्ष (Indirect) भूमि उपयोग परिवर्तन का अलग-अलग अध्ययन करते हैं। कई बार किसी क्षेत्र में गन्ने की खेती बढ़ने से दूसरी खाद्य फसलें अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित होती हैं और अंततः नए कृषि क्षेत्र के लिए जंगल काटे जाते हैं। इस अप्रत्यक्ष प्रभाव का आकलन कठिन अवश्य है, लेकिन उसकी अनदेखी करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

    कृषि जैव विविधता पर भी एथेनॉल नीति का प्रभाव पड़ सकता है। यदि किसानों को केवल उन्हीं फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जाएगा जिनसे एथेनॉल उद्योग को लाभ मिलता है, तो पारंपरिक बहुफसली कृषि धीरे-धीरे एकल फसल (Monoculture) की ओर बढ़ सकती है। एकल फसल व्यवस्था मिट्टी की उर्वरता, कीट नियंत्रण और पारिस्थितिक संतुलन- तीनों के लिए चुनौती मानी जाती है। इससे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता भी बढ़ सकती है।

    एथेनॉल नीति के समर्थक यह तर्क देते हैं कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी। यह तर्क पूरी तरह असत्य नहीं है। विशेषकर गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के किसानों और चीनी मिलों को अतिरिक्त बाजार मिलने से आर्थिक लाभ हो सकता है। वर्षों से लंबित गन्ना भुगतान की समस्या में भी कुछ सुधार देखने को मिला है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह लाभ सभी किसानों तक समान रूप से पहुंचेगा?भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। उनमें से बड़ी संख्या वर्षा आधारित खेती करती है। वे न तो बड़े पैमाने पर गन्ना उगा सकते हैं और न ही एथेनॉल उद्योग से प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त कर सकते हैं। फलतः यह नीति कुछ क्षेत्रों और कुछ फसलों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ पहुंचाती है, जबकि अन्य किसान उससे लगभग अप्रभावित रहते हैं। इससे कृषि असमानता बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है। 
    इतिहास

    इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि एथेनॉल केवल ऊर्जा नीति नहीं है; यह जल नीति, कृषि नीति, खाद्य नीति और पर्यावरण नीति- चारों का साझा प्रश्न है। यदि इसे केवल पेट्रोलियम आयात कम करने के साधन के रूप में देखा जाएगा, तो उसके अनेक दीर्घकालिक प्रभाव हमारी दृष्टि से ओझल रह जाएंगे। इसीलिए आज विश्व के अनेक वैज्ञानिक इस बात पर बल दे रहे हैं कि पहली पीढ़ी (First Generation) के एथेनॉल, जो खाद्यान्नों और गन्ने पर आधारित हैं, की सीमाएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। भविष्य उन जैव-ईंधनों का है जो कृषि अवशेषों, पराली, गन्ने की खोई, लकड़ी के अपशिष्ट और अन्य सेलुलोसिक पदार्थों से तैयार किए जाएं। इन्हें दूसरी पीढ़ी (2G) का एथेनॉल कहा जाता है और इन्हें अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ विकल्प माना जाता है।

    एथेनॉल मिश्रण की नीति पर बहस केवल उसके वर्तमान स्वरूप तक सीमित नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की दिशा क्या होगी और उसमें एथेनॉल की भूमिका कितनी स्थायी है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग अब इस बात पर सहमत है कि पहली पीढ़ी (First Generation) के जैव-ईंधन, जो गन्ने, मक्का या अन्य खाद्यान्नों से तैयार किए जाते हैं, ऊर्जा परिवर्तन का अंतिम समाधान नहीं हो सकते। उनका योगदान संक्रमणकालीन (Transitional) हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन नहीं।

    इसी कारण वैज्ञानिक अनुसंधान अब दूसरी और तीसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों पर केंद्रित है। दूसरी पीढ़ी (2G) का एथेनॉल कृषि अवशेषों- जैसे धान की पराली, गेहूं के भूसे, गन्ने की खोई, मक्का के डंठलों तथा अन्य सेलुलोसिक अपशिष्टों- से बनाया जाता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए अतिरिक्त कृषि भूमि या खाद्यान्नों की आवश्यकता नहीं होती। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो खेतों में पराली जलाने की समस्या कम हो सकती है, वायु प्रदूषण में कमी आ सकती है और किसानों को कृषि अपशिष्ट से अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।

    लेकिन यहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं। सेलुलोज़ को शर्करा में बदलना रासायनिक और जैव-प्रौद्योगिकीय दृष्टि से जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए महंगे एंज़ाइम, उन्नत संयंत्र और अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। आज भी दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल का उत्पादन पहली पीढ़ी की तुलना में अधिक महंगा है। भारत ने इस दिशा में कुछ संयंत्र स्थापित किए हैं, किंतु अभी यह तकनीक प्रारंभिक अवस्था में है और उसकी आर्थिक व्यवहार्यता पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई है।

    तीसरी पीढ़ी (3G) के जैव-ईंधन, विशेषकर शैवाल (Algae) आधारित ईंधन, भविष्य की संभावना माने जाते हैं। शैवाल अत्यंत तीव्र गति से बढ़ते हैं, खाद्यान्न नहीं हैं, और अपेक्षाकृत कम भूमि पर अधिक जैव-द्रव्य उत्पन्न कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल हो जाती है तो जैव-ईंधनों की पूरी दिशा बदल सकती है। लेकिन वर्तमान में यह अभी अनुसंधान और प्रायोगिक विकास के चरण में है।

    इस परिप्रेक्ष्य में भारत की वर्तमान एथेनॉल नीति का मूल्यांकन करना आवश्यक है। यह स्वीकार करना होगा कि इस नीति के कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। पेट्रोलियम आयात में आंशिक कमी आई है, चीनी उद्योग को अतिरिक्त बाजार मिला है और गन्ना किसानों के भुगतान में कुछ सुधार देखने को मिला है। विदेशी मुद्रा की बचत भी एक वास्तविक लाभ है। इन उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं होगा। लेकिन किसी नीति की सफलता केवल अल्पकालिक आर्थिक लाभ से नहीं आंकी जा सकती।

    यदि वही नीति जल संकट को बढ़ाती है, कृषि को एकल फसल की ओर धकेलती है, खाद्य सुरक्षा पर दबाव डालती है और पर्यावरणीय लागतों को भविष्य की पीढ़ियों पर छोड़ देती है, तो उसका समग्र मूल्यांकन अलग होगा। यहीं पर “हरित विकास” (Green Growth) और “टिकाऊ विकास” (Sustainable Development) के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। हरित विकास केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने तक सीमित हो सकता है, जबकि टिकाऊ विकास जल, मिट्टी, जैव विविधता, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को भी समान महत्व देता है। यदि किसी हरित तकनीक की कीमत जल संकट, भूमि क्षरण और खाद्य असुरक्षा के रूप में चुकानी पड़े, तो उसे टिकाऊ नहीं कहा जा सकता।

    भारत की ऊर्जा नीति का भविष्य संभवतः किसी एक ईंधन पर आधारित नहीं होगा। विद्युत वाहनों का विस्तार तेजी से हो रहा है। सौर और पवन ऊर्जा की लागत लगातार कम हुई है। हरित हाइड्रोजन को भारी उद्योगों और लंबी दूरी के परिवहन के लिए संभावित विकल्प माना जा रहा है। सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा दक्षता, बैटरी प्रौद्योगिकी और जैव-ईंधन- इन सभी का संतुलित मिश्रण ही भविष्य की वास्तविक ऊर्जा व्यवस्था बनेगा। ऐसे परिदृश्य में एथेनॉल एक महत्त्वपूर्ण सहायक ईंधन हो सकता है, लेकिन सम्पूर्ण समाधान नहीं।

    नीति निर्माण में एक और सावधानी आवश्यक है। किसी भी तकनीक के बारे में अति-उत्साह या अति-निराशा- दोनों वैज्ञानिक दृष्टि के विरुद्ध हैं। इतिहास बताता है कि अनेक तकनीकों को प्रारंभ में चमत्कारी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन बाद में उनके अप्रत्याशित दुष्प्रभाव सामने आए। रासायनिक कीटनाशकों से लेकर प्लास्टिक और जीवाश्म ईंधनों तक इसका इतिहास हमारे सामने है। इसलिए एथेनॉल के संदर्भ में भी प्रमाण-आधारित, पारदर्शी और स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य है।

    यह भी आवश्यक है कि सरकार एथेनॉल मिश्रण के पर्यावरणीय प्रभावों पर नियमित सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। भूजल दोहन, फसल चक्र में परिवर्तन, खाद्यान्न उपलब्धता, ग्रीनहाउस गैसों के वास्तविक उत्सर्जन और जैव विविधता पर प्रभाव जैसे संकेतकों की स्वतंत्र निगरानी हो। यदि किसी नीति की सफलता का दावा किया जाता है, तो उसके समर्थन में सार्वजनिक और सत्यापन योग्य आंकड़े भी उपलब्ध होने चाहिए। विज्ञान का आधार विश्वास नहीं, बल्कि प्रमाण होता है।भारत के लिए सबसे विवेकपूर्ण मार्ग यह होगा कि पहली पीढ़ी के एथेनॉल पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों, कृषि अवशेषों के उपयोग, जल-संरक्षण आधारित कृषि, विद्युत वाहनों, सार्वजनिक परिवहन और नवीकरणीय ऊर्जा के समन्वित मॉडल को प्राथमिकता दी जाए। इससे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच अधिक संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

    अंततः प्रश्न केवल एथेनॉल का नहीं है, बल्कि विकास की उस अवधारणा का है जिसे हम अपनाना चाहते हैं। क्या विकास का अर्थ केवल अधिक ईंधन उपलब्ध कराना है, या ऐसा समाज बनाना भी है जहां जल सुरक्षित हो, भूमि उपजाऊ रहे, भोजन सबको उपलब्ध हो और प्रकृति के साथ संतुलन बना रहे? यदि दूसरा लक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण है, तो एथेनॉल सहित हर ऊर्जा नीति को उसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। एथेनॉल न तो कोई शत्रु है और न ही कोई चमत्कारी उद्धारक। वह एक तकनीकी विकल्प है- जिसकी उपयोगिता उसकी सीमाओं को स्वीकार करने में निहित है। विज्ञान हमें यही सिखाता है कि किसी भी समाधान को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसके लाभ और हानि, दोनों का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए। भारत की ऊर्जा नीति का भविष्य भी इसी वैज्ञानिक विवेक, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर निर्भर करेगा। यही दृष्टिकोण हमें अल्पकालिक उपलब्धियों से आगे ले जाकर वास्तव में टिकाऊ और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में अग्रसर कर सकता है।

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