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    ईरान संघर्ष और अमेरिकी महाशक्ति का ढलता सूरज

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 9, 2026

    ईरान युद्ध ने किसी ‘नई विश्व व्यवस्था’ का आगाज नहीं किया है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्थाहीन दुनिया का खाका पेश किया है, जहां वैश्विक स्थिरता सहमत नियमों पर नहीं बल्कि ताकत के बदलते समीकरणों पर टिकी है।

    अशोक स्वैन

    Published: 08 Jul 2026, 7:00 PM

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    इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब युद्ध भूगोल की सीमाओं से कहीं ज्यादा अहम बदलाव कर देते हैं। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पूरे ढांचे को बदल देते हैं। ईरान युद्ध ऐसा ही एक पड़ाव साबित हो सकता है। चाहे कोई स्थायी ‘शांति समझौता’ हो या न हो, इसका एक भू-राजनीतिक नतीजा अभी से दिखने लगा है। इस संघर्ष ने अमेरिकी प्रभुत्व वाले एकध्रुवीय युग के अंत को तेज कर दिया है।

    यह युग पहले ही चीन के उभरने, रूस के पुनरुत्थान और अन्य क्षेत्रीय ताकतों के बढ़ते हौसले के साथ सिमटना शुरू हो चुका था। ईरान युद्ध ने पहले से चल रहे उस संक्रमण को तेज कर दिया है।

    फिर भी, एक बहुध्रुवीय दुनिया के आगाज का जश्न मनाना खतरनाक रूप से जल्दबाजी होगी। दुनिया बहुध्रुवीय तो बन रही है, लेकिन अभी तक कोई वैकल्पिक विश्व व्यवस्था मौजूद नहीं है। शक्ति का संतुलन उस बदलाव को संभालने के लिए आवश्यक संस्थानों और नियमों के निर्माण की तुलना में बहुत तेजी से बदल रहा है। यह एक अत्यंत अस्थिर अंतरराष्ट्रीय वातावरण पैदा कर रहा है।

    हर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक आधार की जरूरत होती है। इसे ऐसे नियमों की जरूरत होती है जिनका उल्लंघन करने से ताकतवर देश भी हिचकें। इसे ऐसे संस्थानों की जरूरत होती है जिनकी वैधता तब भी बनी रहे जब वे सभी को संतुष्ट करने में विफल रहें। इसे ऐसे तंत्र की जरूरत होती है जो संकटों को युद्धों में बदलने से रोकने में सक्षम हों। सबसे बढ़कर, इसके तहत बड़ी ताकतों को संयम बरतने की जरूरत का अहसास हो कि उनके अपने हितों के लिए भी स्थिरता जरूरी है।

    अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था ने इनमें से कुछ बुनियादी आधार प्रदान किए थे। संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स संस्थान, अंतरराष्ट्रीय कानून, हथियार नियंत्रण समझौते और बहुपक्षीय कूटनीति ने ऐसे रास्ते दिए जिनसे विवादों को प्रबंधित किया जा सकता था। यह प्रणाली अक्सर चयनात्मक, असमान और अमेरिकी हितों से भारी रूप से प्रभावित थी, लेकिन फिर भी इसने एक हद तक पूर्वानुमान की स्थिति पैदा की। यहां तक कि जब बड़ी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी की, तब भी वे आमतौर पर अपने कार्यों को इसके दायरे के भीतर सही ठहराने के लिए मजबूर महसूस करते थे क्योंकि तब वैधता मायने रखती थी।

    आज वह वैधता गायब हो रही है और अंतरराष्ट्रीय कानून तेजी से चयनात्मक व्याख्याओं का विषय बनता जा रहा है। सैन्य हस्तक्षेपों, आर्थिक प्रतिबंधों, व्यापार प्रतिबंधों, साइबर हमलों और राजनीतिक जबरदस्ती को स्वीकृत कानूनी सिद्धांतों की अवहेलना करते हुए राष्ट्रीय हित के बहाने सही ठहराया जा रहा है। बड़ी ताकतें अब सामान्य नियमों को मजबूत करने की कोशिश नहीं कर रही हैं; वे अल्पकालिक रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उन्हें नए सिरे से लिख रही हैं। ईरान संघर्ष ने इस वास्तविकता को उजागर कर दिया है।

    सैन्य संघर्षों ने यह दिखाया है कि सैन्य श्रेष्ठता अब राजनीतिक परिणामों की गारंटी नहीं। ईरान ने दिखाया है कि भारी प्रतिबंधों का सामना कर रहा एक क्षेत्रीय देश भी विषम क्षमताओं, क्षेत्रीय नेटवर्क और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों को बाधित करने की क्षमता से एक महाशक्ति पर रणनीतिक कीमत थोप सकता है। इसके साथ ही, इस संघर्ष ने अमेरिकी प्रभाव की सीमाओं को भी उजागर किया है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका अचानक कमजोर हो गया है। अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति है, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर उसका दबदबा है और तकनीकी नवाचार में वह अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। डॉलर अब भी दुनिया की मुख्य आरक्षित मुद्रा है, और वर्तमान में किसी भी देश के पास सैन्य, वित्तीय, तकनीकी और सांस्कृतिक प्रभाव का वह संयोजन नहीं है जो वाशिंगटन के पास आज भी है। लेकिन यह ताकत अब प्रभुत्व या पूर्ण नियंत्रण का पर्याय नहीं रह गई है। अमेरिका अब भी घटनाओं को प्रभावित करने में सक्षम है, लेकिन वह उनके परिणामों को निर्धारित करने की अपनी क्षमता खो रहा है।

    चीन अमेरिकी प्रभुत्व के लिए बड़ी दीर्घकालिक चुनौती बनकर उभरा है। पिछले उभरते देशों के विपरीत, बीजिंग ने वाशिंगटन के साथ सीधे सैन्य टकराव से परहेज किया है। इसके बजाय, उसने व्यापार, तकनीकी विकास, बुनियादी ढांचे के निवेश, कूटनीति और आर्थिक साझेदारी के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाया है। उसकी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’, दक्षिण और पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बढ़ती उपस्थिति, और एससीओ तथा ब्रिक्स जैसे रणनीतिक समूहों में उसकी बढ़ती भूमिका टकराव के बजाय पूरे धैर्य के साथ अपना प्रभाव बढ़ाने की रणनीति दिखाती है।

    फिर भी चीन ने वैश्विक व्यवस्था के गारंटर के रूप में अमेरिका की जगह लेने की इच्छा नहीं दिखाई है। वह समकक्ष वैश्विक जिम्मेदारियों को उठाए बिना अधिक प्रभाव चाहता है। बीजिंग अपने आधिकारिक बयानों में लगातार बहुपक्षवाद का समर्थन करता है, लेकिन उसने दुनिया का प्राथमिक सुरक्षा प्रदाता बनने में बहुत कम रुचि दिखाई है। ईरान संघर्ष के दौरान, चीन ने तनाव बढ़ने की निंदा की और कूटनीति का आह्वान किया, लेकिन सीधे सैन्य जुड़ाव से सावधानीपूर्वक दूरी बनाए रखी। यह उसकी रणनीतिक सतर्कता को दिखाता है।

    इसका परिणाम एक ऐसी दुनिया के रूप में सामने आया है जहां शक्ति तो बिखर रही है लेकिन जिम्मेदारी अपरिभाषित है- यह हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है। कई ताकतें उभर रही हैं, लेकिन कोई भी एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण करने के लिए तैयार या सक्षम नहीं है जो व्यापक वैधता हासिल कर सके।

    सामूहिक कार्रवाई को सुविधाजनक बनाने वाले संस्थान औपचारिक रूप से जीवित तो हैं लेकिन अप्रभावी हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वीटो की राजनीति के कारण पंगु हो चुकी है। विश्व व्यापार संगठन विवादों को सुलझाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक प्रतिनिधित्व और वैधता के सवालों का सामना कर रहे हैं। यहां तक कि जलवायु वार्ता, महामारी की प्रतिक्रिया, शरणार्थी संरक्षण और परमाणु कूटनीति भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बजाय भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की भेंट चढ़ चुके हैं।

    यह स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। विश्व व्यवस्था ऐसे समय में चरमरा रही है जब मानवता आधुनिक इतिहास के किसी भी मोड़ की तुलना में बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है, जब सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता सबसे अधिक है। जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय सीमाओं का पालन नहीं करता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व्यक्तिगत सरकारों की क्षमता से परे जोखिम पैदा करता है। साइबर हमले महाद्वीपों की सीमाओं को पलक झपकते पार कर जाते हैं। वित्तीय अस्थिरता चंद घंटों में व्यापक क्षेत्रों को अपनी जद में ले लेती है। महामारियां हमें याद दिलाती हैं कि वायरस को किसी वीजा की जरूरत नहीं होती।

    इतिहास इस मामले में कोई सांत्वना नहीं देता। प्रथम विश्व युद्ध से पहले के लंबे बहुध्रुवीय युग को पहले तो कई महाशक्तियों में एक स्थिर संतुलन के रूप में सराहा गया था। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और आस्ट्रिया-हंगरी सभी का मानना था कि बदलते गठबंधन किसी भी एक देश को यूरोप पर हावी होने से रोकेंगे। इसके बजाय, संकट प्रबंधन के लिए प्रभावी तंत्र की अनुपस्थिति ने एक आर्कड्यूक की हत्या को विश्व युद्ध में बदल दिया। विश्वसनीय संस्थानों के बिना बहुध्रुवीयता तनाव को बढ़ने से रोकने में नाकाफी साबित हुई।

    इसी तरह, यह मानने का कोई कारण नहीं है कि आज की बहुध्रुवीयता, या शक्ति का यह बिखराव, स्वतः ही अधिक स्थिरता पैदा करेगा। इसके विपरीत, जोखिम कहीं अधिक बड़े हो सकते हैं। ईरान युद्ध एक ऐसी दुनिया के आगाज की घोषणा करता है जिसमें कोई भी एक ताकत नतीजों को तय नहीं कर सकती, फिर भी कई शक्तिशाली देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रबंधित करने के लिए कोई सामूहिक तंत्र मौजूद नहीं। अमेरिका अब उस तरह के निर्बाध नेतृत्व को बनाए नहीं रख सकता जो शीत युद्ध के बाद के दशकों की विशेषता थी। चीन उसकी जगह लेने के लिए आगे नहीं आया है। रूस रचनात्मक होने के बजाय विनाशकारी अधिक है। यूरोप आंतरिक रूप से विभाजित और नेतृत्वविहीन है। भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की कसम खाता है लेकिन उसने ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का मौका गंवा दिया है।

    अंततः, ईरान युद्ध को अमेरिकी सदी के अंत के रूप में नहीं, बल्कि एक नेतृत्व-विहीन और अराजक युग की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा। यह किसी नई वैश्विक व्यवस्था का आगमन नहीं है; यह एक ‘व्यवस्था-शून्य’ विश्व का उदय है। यहां बहुपक्षवाद केवल बातों में जीवित है, अंतरराष्ट्रीय कानून बेमानी हो चुका है, और वैश्विक स्थिरता अब किन्हीं तयशुदा नियमों के बजाय केवल शक्ति और रणनीतिक जोखिम के बदलते आकलनों के रहमोकरम पर है।

    (अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं।)

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