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    क्षत-विक्षत छवि और नष्ट होती विरासत

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 24, 2026

    दुनियाभर में भारत की बदनामी बढ़ती जा रही है। सरकार हमेशा के लिए इस पर पर्दा नहीं डाल सकती।

    अभय शुक्ला

    Published: 23 Aug 2026, 4:00 PM

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    काफी समय से दीवार पर लिखी इबारत बिल्कुल साफ दिख रही है, जिसे शायद ‘अंध-भक्तों’ के अलावा हर कोई देख सकता है। पिछले एक दशक में शासन-प्रशासन के पैमानों पर भारत की लगातार गिरावट- चाहे वह प्रेस की आजादी, कानून का राज, असमानता, मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता हो या फिर पर्यावरण संरक्षण और अकादमिक आजादी- सरकारी संस्थाओं के ढांचागत पतन और अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों के प्रति बढ़ता तिरस्कार शीशे की तरह साफ है।

    वैश्विक स्तर पर इसके खिलाफ आवाज तो उठनी ही थी। इसका पहला संकेत 2021 के बाद सामने आया जब वी-डेम, ईआईयू (इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट) और फ्रीडम हाउस जैसी संस्थाओं ने भारत के लोकतांत्रिक दर्जे को घटाकर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’, ‘चुनावी तानाशाही’ और ‘दोषपूर्ण लोकतंत्र’ की श्रेणी में डाल दिया। वर्ष 2025 में, देश के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की स्वायत्तता में कथित कमी और मानवाधिकार हनन को रोकने में विफलता के आधार पर मानवाधिकार संस्थाओं के वैश्विक गठबंधन ने उसकी रेटिंग घटाकर ‘बी’ कर दी।

    अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अपनी कांग्रेस से सिफारिश की है कि भारत को ‘विशेष चिंता वाला देश’ और ‘अंतरराष्ट्रीय दमन का स्रोत’ घोषित किया जाए। उसने अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के आरोप में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम के मुख्यमंत्रियों समेत संघ और बजरंग दल से जुड़े संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की है। साथ ही, आयोग ने उन कंपनियों की जांच की मांग की है जिनके उपकरणों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया गया और नफरत फैलाने वाले ऑनलाइन टेक प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ सुनवाई करने को कहा है।

    इसी महीने एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत सरकार को पत्र लिखकर उस पर नरसंहार संधि और जिनेवा समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया। उसका कहना है कि भारत ने इजरायल को भारत-निर्मित हथियारों, गोला-बारूद और सैन्य साजो-सामान की करीब 800 खेपें भेजने की इजाजत देकर गाजा में इजरायल के नरसंहार में साझीदारी निभाई है जबकि इसराइल युद्ध अपराधों, नरसंहार, नस्ली सफाए और रंगभेद का दोषी ठहराया जा चुका है। एमनेस्टी ने ऐसी कम-से-कम सात भारतीय कंपनियों की पहचान की है, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां भी शामिल हैं। यह स्थिति हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर नैतिक और कानूनी नतीजों के मुहाने पर ला खड़ा करती है।

    लेकिन सबसे बड़ा झटका पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट से लगा, जो वस्तुतः एक ‘कारण बताओ नोटिस’ है। भारत सरकार को लिखे पत्र में धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों के मामलों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के तीन स्वतंत्र विशेषज्ञों ने उस तौर-तरीके पर गंभीर संदेह जताया है जिसके तहत भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार, बंगाल और देश के बाकी हिस्सों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) चलाया गया है या चलाया जा रहा है। उन्होंने इस मनमानी प्रक्रिया की अपारदर्शिता, कार्यप्रणाली, चुनिंदा रवैये और इसके औचित्य और उद्देश्य पर कड़े सवाल उठाए हैं। पत्र में सरकार के अपने स्रोतों और सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध तथ्यों और आंकड़ों का ही हवाला दिया गया है।

    इस पत्र में बड़े पैमाने पर मतदाताओं, खासकर अल्पसंख्यक समुदायों और पश्चिम बंगाल के लोगों के नाम काटे जाने पर गहरी चिंता जताई गई है। इसमें साफ तौर पर इस बात का जिक्र किया गया है कि निर्वाचन आयोग और सरकार के ये सभी कदम उन अंतरराष्ट्रीय संधियों और प्रस्तावों का उल्लंघन प्रतीत होते हैं जिन पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं। इन विशेषज्ञों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने से पहले सरकार से तय समय-सीमा के भीतर स्पष्टीकरण और जवाब मांगा है।

    इस आलेख को लिखे जाने के समय तक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र को कोई औपचारिक उत्तर नहीं दिया था, लेकिन विदेश मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान जारी कर इन आरोपों को ‘निराधार’ और ‘अनुचित’ बताया है और कहा है कि इस प्रक्रिया को देश के सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति प्राप्त है।

    संसद में 30 जुलाई को एक सवाल के जवाब में एक मंत्री ने लगभग यही बातें दोहराईं और जोड़ा कि मृत, विस्थापित या पता बदल चुके लोगों के नाम हटाना एक नियमित प्रक्रिया है। इस बयान में कोई दम नहीं दिखता, क्योंकि इस लापरवाह शासन पर होने वाली किसी भी आलोचना को खारिज करने के लिए मंत्रालय का यह एक तय ढर्रा बन चुका है।

    इसके अलावा, मंत्री ने बंगाल में रहस्यमयी और अपारदर्शी ‘तार्किक विसंगति’ वाले नियम के तहत हटाए गए नामों, अपील लंबित होने के बावजूद वोट देने से रोके गए 27 लाख लोगों, चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किए गए अप्रमाणित और गोपनीय एल्गोरिदम की अपारदर्शिता, या मतदाता सूची से मुसलमानों के अनुपातहीन ढंग से नाम काटे जाने के कारणों का कोई उल्लेख नहीं किया।

    संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का यह पत्र केवल निर्वाचन आयोग पर ही आरोप पत्र नहीं है, बल्कि यह हमारे सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर भी सवालिया निशान है। अदालत के पास बेलगाम होते निर्वाचन आयोग पर लगाम लगाने के तमाम मौके थे, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रही। इसकी वैधानिकता, कार्यप्रणाली, औचित्य और इससे नागरिकता पर पड़ने वाले असर की गहराई से जांच करने के बजाय अदालत साल भर सतही बातों में उलझी रही, जब तक कि एसआईआर प्रक्रिया उस मुकाम पर नहीं पहुंच गई जहां इसे पलटना असंभव हो। उसने इस स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया के आधार पर चुनाव आयोग को दो चुनाव कराने की छूट दी, और तब भी खामोश रही जब आयोग ने इसे पूरे देश में लागू कर दिया।

    अब उसने एसआईआर पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है, जिससे लाखों और लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे जाने का रास्ता साफ हो गया है। अदालत देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है, और यह बात संयुक्त राष्ट्र के पत्र से साफ होता है। संयुक्त राष्ट्र का यह पत्र हमारे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (जो पहले ही अपनी साख खो चुका है) और पूरी तरह निष्प्रभावी हो चुके अल्पसंख्यक आयोग पर भी एक तीखी टिप्पणी है। मुझे याद नहीं कि अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए और अपने ऊपर खर्च होने वाले करोड़ों रुपयों को सही साबित करते हुए इन दोनों में से किसी भी संस्था ने पिछली बार जनता के पक्ष में कब आवाज उठाई थी।

    एसआईआर के जरिये लाखों मतदाताओं (विशेषकर अल्पसंख्यकों) को मताधिकार से वंचित किए जाने, उनकी नागरिकता पर पैदा किए गए खतरनाक संशय और कई राज्यों द्वारा उन्हें कल्याणकारी योजनाओं से बेदखल किए जाने पर चुप्पी साधकर इन दोनों आयोगों ने इस नापाक कवायद की तरफ से आंखें मूंद ली हैं और अपने मूल दायित्व के साथ विश्वासघात किया है।

    भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय बदनामी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है और हमारी सरकार हमेशा के लिए इस पर पर्दा नहीं डाल सकती। मानवाधिकारों के बेहद संदिग्ध रिकॉर्ड और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़े इसराइल से जुड़ाव के कारण हमने अपना नैतिक कद, मानवाधिकारों और स्वतंत्रताओं की पारंपरिक पैरोकारी, और ग्लोबल साउथ, सार्क एवं शायद ब्रिक्स तक का अपना नेतृत्व गंवा दिया है।

    हम पाकिस्तान जैसे अपने विरोधी देश, जो इस समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की अध्यक्षता कर रहा है, को अपने खिलाफ कार्रवाई करने, प्रतिबंध लगाने और आईसीसी या आईसीजे से वारंट जारी कराने का मौका दे रहे हैं। हमने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने की अपनी रही-सही संभावनाओं को भी खुद ही मटियामेट कर दिया है।

    हमने तमाम अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर खुद को अलग-थलग कर लिया है और अमेरिका और इसराइल के पिछलग्गू बनकर रह गए हैं। बीजेपी की धार्मिक कट्टरता और आंतरिक सत्ता की अंधी हवस देश के लिए असहनीय कीमत वाली साबित हो रही है।

    क्या गांधी, नेहरू, टैगोर, कबीर और विवेकानंद के भारत के साथ इससे बेहतर सलूक नहीं होना चाहिए?

    (अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। यह https://avayshukla.blogspot.com से लिए उनके लेख का संपादित रूप है।)

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