जब यह सरकार गिरेगी तो एक ज्यादा न्यायपूर्ण और गतिशील समाज बनाने के लिए बहुत सुधार कार्य करना होगा. तब तक देश के संसाधनों और लोगों की जेब पर यह हमला बिना रुके जारी रहेगा. और बीच बीच में ध्यान भटकाने के लिए दिल्ली जिमखाना क्लब जैसे महत्वहीन विशेषाधिकार वाले स्थानों पर प्रतीकात्मक कार्रवाई होती रहेगी.
ज्यादातर लोग, जो दिल्ली जिमखाना क्लब के बाहर हैं, नरेंद्र मोदी सरकार के उस अचानक बेदखली नोटिस पर शायद आंसू नहीं बहाएंगे जो “सुरक्षा” के आधार पर दिया गया है. यह 113 साल पुराना और बेहद खास क्लब दिल्ली के सेंट्रल इलाके की 27 एकड़ जमीन पर स्थित है. इसकी सदस्यता ज्यादातर पूर्व नौकरशाहों और रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों की है. जिन्हें लुटियंस एलीट कहा जाता है.
लेकिन असली बात इसकी भाषा और तर्क है. अरबपतियों गौतम अडानी, मुकेश अंबानी और सुभाष चंद्रा के स्वामित्व वाले टीवी चैनल अचानक अब अपने अंदर के सामाजिक न्याय के समर्थक बनते दिख रहे हैं. वे जिमखाना क्लब में सस्ते जिन और टॉनिक पर नाराजगी जताते हुए बहस कर रहे हैं.
दुनियाभर के दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेताओं की तरह मोदी सरकार भी यह दिखाती है कि वह एलीट के खिलाफ है. लेकिन असल में उसने भारत में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्रीकरण कराया है. इसके करीबी लोगों को हजारों करोड़ रुपये की पूंजी सब्सिडी, टैक्स छूट और कीमती वन भूमि लगभग उपहार में दी गई है. जबकि आम लोग महंगाई, बेरोजगारी और रिकॉर्ड घरेलू कर्ज से जूझ रहे हैं. इसे छिपाने के लिए कभी-कभी आसान निशाने बनाए जाते हैं.
तथ्य अच्छी तरह से ज्ञात हैं. भले ही भारतीय मीडिया का एक हिस्सा आपको उन्हें न देखने दे.
- कई क्षेत्रों में आर्थिक शक्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण हुआ है. सबसे बड़े पांच समूहों की गैर वित्तीय संपत्तियों का हिस्सा 1991 में 10 प्रतिशत था जो 2021 में बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया. आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरलआचार्य ने दिखाया है कि यह केंद्रीकरण महंगाई भी बढ़ाता है क्योंकि बड़े एकाधिकारों के पास कीमत तय करने की शक्ति होती है और वे आयात शुल्क बढ़वाने के लिए लॉबी कर सकते हैं.
- मजदूरों की हालत खराब है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में स्वरोजगार और वेतनभोगी कामगारों की वास्तविक मासिक मजदूरी 2017-18 से कम थी. कृषि मजदूरों की वास्तविक मजदूरी यूपीए सरकार में औसतन 6.8 प्रतिशत बढ़ी थी. जबकि मोदी सरकार में यह -1.3 प्रतिशत रही. यानी नकारात्मक.
- नतीजा यह है कि भारत का “बिलेनियर राज” आज ब्रिटिश राज से भी ज्यादा असमान है. शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास 23.1 प्रतिशत आय है और 40.1 प्रतिशत संपत्ति है.
भारत हमेशा से असमान समाज रहा है. लेकिन आजादी के बाद, कुछ हद तक न्याय की दिशा में कोशिश की गई थी. यहां तक कि उदारीकरण वाली सरकारों के समय भी. लेकिन मोदी सरकार ने इसके उलट दिशा में वर्ग युद्ध जैसा रुख अपनाया है. अपने अरबपति दोस्तों और फाइनेंसरों के पक्ष में.
2019 में सरकार ने भारी कॉर्पोरेट टैक्स कट दिया. इससे खजाने को हर साल 1.45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. इसका सबसे ज्यादा फायदा सबसे ऊपर के 0.7 प्रतिशत कंपनियों को मिला. 2021 की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI योजना के तहत भी 1.97 लाख करोड़ रुपये ज्यादातर पूंजी आधारित कंपनियों को दिए गए. नतीजा यह हुआ कि यह टैक्स फायदा डिविडेंड और कर्ज चुकाने में चला गया. जबकि निजी निवेश GDP के 12 प्रतिशत पर स्थिर रहा.
अमीर लोग लंदन, दुबई और सिंगापुर जा रहे हैं, और अब उनका पैसा भी वहीं जा रहा है. इससे रुपये की कीमत गिर रही है.
सरकार ने कानूनों में बदलाव करके जंगलों की परिभाषा बदल दी ताकि 2023 में 1.97 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ‘विकास’ के लिए खोला जा सके. उसने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा बदलने की भी कोशिश की. अरावली पहाड़ियां उत्तर पश्चिम भारत की 670 किलोमीटर लंबी श्रृंखला हैं जो रेगिस्तान फैलने से रोकती हैं. गर्मी और भूजल की कमी को कम करती हैं. इसका उद्देश्य ज्यादा ‘विकास’ था. यानी बड़े पैमाने पर खनन.
सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों पर रोक लगा दी. लेकिन इससे मोदी सरकार की यह कोशिश खत्म नहीं हुई कि वह नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता और उसकी अवधि को कम करने की दिशा में काम कर रही है.
BJP और उसके बेस्ट फ्रेंड फॉरएवर अरबपति
“प्रो-रिच” शब्द मोदी की शैली को पूरी तरह नहीं बताता. वे केवल सबसे अमीर लोगों के लिए काम करने वाले माने जाते हैं. भारत की प्रमुख जांच एजेंसियों के इस्तेमाल को याद कीजिए, जिससे उनके दोस्तों को फायदा मिला. यह कोई रहस्य नहीं है कि एक के बाद एक प्रमोटर अपने कीमती एसेट्स जैसे पोर्ट, एयरपोर्ट और सीमेंट सेक्टर की संपत्तियां अडानी ग्रुप को बेचती गईं. यह सब ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आयकर विभाग की छापेमारी के बाद हुआ. इसके चलते गौतम अडानी कुछ समय के लिए दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए.
ऐसा दिखता है कि उन्हीं एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक फंडिंग निकालने के लिए भी किया गया. चुनावी बॉन्ड को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित करने से पहले, बीजेपी को उन कंपनियों से 2471 करोड़ रुपये की राजनीतिक फंडिंग मिली जो ईडी. सीबीआई और आयकर विभाग की जांच में थीं. इसमें से 69 प्रतिशत पैसा उन कंपनियों पर छापों के बाद मिला. कुल मिलाकर बीजेपी को 2024-25 में बिजनेस हाउस से 5717 करोड़ रुपये का दान मिला. यह सभी राष्ट्रीय पार्टियों को मिले दान से 13 गुना से भी ज्यादा है.
अधिकतम दोहन और अधिकतम केंद्रीकरण ही लक्ष्य लगते हैं. हर कोई इसका शिकार है. केवल बीजेपी और उसके BFF अरबपति ही लाभ में हैं. जब सफलता का रास्ता बीजेपी के खजाने से होकर जाता है तो कंपनियों से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे नवाचार करें और प्रतिस्पर्धी बनें.
यह स्थिति हमेशा नहीं चल सकती. विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लिखा है कि “प्ले फेयर” कंपनियों की संख्या “मैच फिक्सिंग” एकाधिकारों से कहीं ज्यादा है. चाहे स्टार्टअप हों या बड़ी घरेलू कंपनियां जो सिर्फ अपना काम करना चाहती हैं. भारत के बिजनेस माहौल को जो नुकसान हो रहा है, वह गंभीर है. और यह स्थिति और खराब हो सकती है.
लेकिन जब यह सरकार गिरेगी तो एक ज्यादा न्यायपूर्ण और गतिशील समाज बनाने के लिए बहुत सुधार कार्य करना होगा. तब तक देश के संसाधनों और लोगों की जेब पर यह हमला बिना रुके जारी रहेगा. और बीच बीच में ध्यान भटकाने के लिए दिल्ली जिमखाना क्लब जैसे महत्वहीन विशेषाधिकार वाले स्थानों पर प्रतीकात्मक कार्रवाई होती रहेगी.

