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    IAF कोई कूरियर एजेंसी नहीं है—ऐसी 3 वजह, क्यों उसे NEET के पेपर नहीं ले जाने चाहिए

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 31, 2026

    भारत के पास 1,300 से ज़्यादा सिविलियन और सरकारी विमान हैं. NEET पेपर बांटने के लिए IAF के कम पैसे को उनके मुख्य काम से हटाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए.

    भारतीय सशस्त्र बलों का मुख्य काम देश की संप्रभुता की रक्षा करना है. यह बात सभी जानते हैं. लेकिन इसके अलावा उनकी एक और जिम्मेदारी होती है, जिसे ‘नागरिक प्रशासन की सहायता’ (Aid to Civil Power) कहा जाता है. यह तब किया जाता है जब उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया जाए.

    भारत के नागरिकों ने कई बार देखा है कि सशस्त्र बलों ने इन जिम्मेदारियों को बेहद कुशलता से निभाया है. लेकिन उनके पास कई ऐसे अनुरोध भी आते हैं, जो तर्क और सामान्य समझ से परे होते हैं. कभी-कभी ऐसे अनुरोध यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि क्या वास्तव में सशस्त्र बलों की भूमिका और जिम्मेदारियों को सही तरह से समझा गया है.

    NEET-UG 2026 की दोबारा परीक्षा के प्रश्न पत्रों को अलग-अलग परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने में भारतीय वायुसेना की मदद लेने के प्रस्ताव को पेशेवर नजरिए से देखने की जरूरत है. नौकरशाही की अक्षमता के पहलू को अलग रख दें, तो सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में ‘नागरिक प्रशासन की सहायता’ का मामला है?

    ‘नागरिक प्रशासन की सहायता’ का सबसे स्पष्ट उदाहरण मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) मिशन हैं, जिन्हें तीनों सेनाएं नियमित रूप से अंजाम देती हैं. जैसे बाढ़ राहत, दुर्घटना राहत, घायलों को निकालना और सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना आदि.

    इसके अलावा कुछ काम ऐसे भी होते हैं, जो राष्ट्र निर्माण में योगदान देते हैं. उदाहरण के लिए, केवल भारतीय वायुसेना के पास ऐसे हेलीकॉप्टर हैं जो सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले बुलडोजर जैसे भारी उपकरणों को मैदानों से पहाड़ों और घाटियों तक पहुंचा सकते हैं, जहां सड़क या अन्य सतही संपर्क का कोई साधन नहीं होता.

    सीमावर्ती सड़क नेटवर्क में जो बड़ा बदलाव आया है, उसमें आंशिक योगदान भारतीय वायुसेना के Mi-17, Mi-26 और Chinook हेलीकॉप्टर बेड़े का भी है. इन हेलीकॉप्टरों ने सड़क निर्माण के उपकरणों को रस्सियों से नीचे लटकाकर (अंडरस्लिंगिंग) पूर्वोत्तर के संकरे पहाड़ी और घाटी वाले इलाकों तक पहुंचाया.

    भारत में वन्यजीव संरक्षण को भी वायुसेना की एयरलिफ्ट सेवाओं से फायदा मिला है. Mi-17 हेलीकॉप्टरों की मदद से बाघों को एक वन्यजीव अभयारण्य से दूसरे अभयारण्य तक पहुंचाया गया है.

    हाल के वर्षों में इसका एक बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला, जब भारतीय वायुसेना के C-17 विमान दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से चीते भारत लेकर आए. इसका उद्देश्य भारत में इस शानदार लेकिन विलुप्त हो चुकी प्रजाति को फिर से बसाना था.

    इसके अलावा वायुसेना ने कुछ और भी बेहद अनोखे काम किए हैं.

    24 अक्टूबर 1995 को वैज्ञानिक अध्ययन के लिए पूर्ण चंद्र ग्रहण की तस्वीरें लेनी थीं. यह काम विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अनुरोध पर किया गया था. उस समय सूर्य की छाया उत्तरी भारत के ऊपर से गुजर रही थी. उस छाया की गति के साथ उड़ान भर सकने वाला एकमात्र विमान त्रि-ध्वनि गति वाला MiG-25 फॉक्सबैट था.

    और ऐसा ही हुआ. विशेष उपकरणों से लैस दो सीटों वाला MiG-25 विमान 80,000 फीट की ऊंचाई पर Mach 2.5 यानी ध्वनि की गति से ढाई गुना तेज रफ्तार से उड़ा और वैज्ञानिक समुदाय के लिए बेहद मूल्यवान तस्वीरें और वीडियो लेकर वापस लौटा.

    भारतीय वायुसेना की मदद लेना

    टीवी पर मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) मिशन रोमांचक और हैरतअंगेज दिखते हैं, और वे वास्तव में होते भी हैं. लेकिन 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान मौत फैलाने वाले गर्म मिथाइल आइसोसाइनेट टैंकों पर पानी का छिड़काव करना बिल्कुल अलग तरह की चुनौती थी.

    उस समय भारतीय वायुसेना के Mi-8 हेलीकॉप्टरों ने देश की सेवा में यही काम किया था, क्योंकि नागरिक विमानन क्षेत्र में ऐसा करने का कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं था.

    कोविड संकट के दौरान भी, दूरदराज के इलाकों में वैक्सीन पहुंचाने के अलावा, भारतीय वायुसेना सिंगापुर से क्रायोजेनिक टैंक भी लेकर आई थी.

    हाल के वर्षों में वायुसेना देश के लगभग हर हिस्से में जंगलों की आग बुझाने के काम में भी कई बार शामिल रही है. इसके लिए बैंबी बकेट से लैस Mi-17 हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया, जो नागरिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं.

    मीडिया में वायुसेना के ऐसे मिशनों को व्यापक कवरेज मिलने के कारण यह स्वाभाविक है कि कई एजेंसियां रक्षा मंत्रालय से “एयरलिफ्ट” की मांग करती हैं.

    इनमें से कुछ मामले वास्तव में “नागरिक प्रशासन की सहायता” की श्रेणी में आते हैं, जहां कोई अन्य नागरिक एजेंसी यह काम नहीं कर सकती. लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं होता.

    वायुसेना को ऐसे कामों में शामिल करने की कोशिश अक्सर एक अत्यधिक प्रशंसात्मक पत्र से शुरू होती है. उसमें लिखा होता है कि “देश को वायुसेना पर गर्व है”, वह “शानदार काम” कर रही है, और फिर पूछा जाता है कि “क्या वायुसेना हमारे लिए यह काम मुफ्त में कर सकती है?”

    जब लेखक वायुसेना मुख्यालय में तैनात थे, तब एक बहुत बड़े आकार की भित्ति चित्र (म्यूरल) को हवाई मार्ग से ले जाने का अनुरोध आया था. अनुरोध में कहा गया था कि इसे सड़क मार्ग से नहीं ले जाया जा सकता और केवल भारतीय वायुसेना का IL-76 विमान ही इसे ले जा सकता है.

    इसके जवाब में विनम्रता से मना करते हुए कहा गया कि देश में उपलब्ध सड़क कंटेनर सेवा का उपयोग किया जाए.

    इसी तरह, महानगरों और शहरों में आयोजित मैराथन की हवाई फोटोग्राफी के लिए भी अनुरोध आए थे. जाहिर है, यह भी मुफ्त में करने की मांग थी. इन्हें भी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि किराये पर नागरिक हेलीकॉप्टर उपलब्ध थे.

    एक बुनियादी सवाल

    मीडिया में आई उन खबरों से, जिनमें कहा गया कि NEET प्रश्न पत्रों को अलग-अलग शहरों तक पहुंचाने के लिए भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल किया जा सकता है, एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है.

    सशस्त्र बलों को शांति काल में प्रशिक्षण के जरिए खुद को तैयार रखना होता है ताकि वे किसी भी समय संघर्ष या युद्ध के लिए तैयार रहें.

    इस मूल जिम्मेदारी से अलग किसी भी काम का बहुत सावधानी से मूल्यांकन किया जाना चाहिए. इसके तीन कारण हैं.

    पहला, क्या शांति काल की मुख्य जिम्मेदारियों को प्रभावित किए बिना सैनिकों और उपकरणों को दूसरे कामों में लगाया जा सकता है?

    यह याद रखना चाहिए कि सैन्य उपकरणों की उपयोग अवधि असीमित नहीं होती. “नागरिक प्रशासन की सहायता” वाले काम महंगे और आसानी से प्रतिस्थापित न किए जा सकने वाले उपकरणों की कुल आयु को कम कर देते हैं.

    दूसरा, नागरिक माहौल में बहुत अधिक समय बिताने से सैनिकों की युद्ध क्षमता कमजोर पड़ सकती है.

    इसका असर अनुशासन, मनोबल और सशस्त्र बलों की सैन्य संस्कृति पर पड़ता है.

    सेना की छावनियों को शहरों से दूर बसाने के पीछे भी यही सोच थी. इससे एक तरह की भौतिक दूरी बनी रहती थी. लेकिन शहरों और कस्बों के विस्तार के कारण अब यह व्यवस्था काफी हद तक अप्रासंगिक हो गई है.

    तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नागरिक क्षेत्र में कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है, जिससे वायुसेना ही एकमात्र विकल्प बन जाए?

    NEET के प्रश्न पत्रों को ले जाने के लिए वायुसेना के विमानों के इस्तेमाल के प्रस्ताव का मूल्यांकन इन्हीं मानकों पर किया जाना चाहिए.

    नागरिक उड्डयन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के नागरिक विमानन बेड़े में 853 विमान हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों और निजी ऑपरेटरों के पास 458 विमान और हेलीकॉप्टर भी हैं.

    इतने बड़े बेड़े को देखते हुए यह कल्पना करना मुश्किल है कि NEET से जुड़े इस काम के लिए जरूरी संख्या में विमान उपलब्ध नहीं कराए जा सकते. साथ ही उनके परिवहन के दौरान आवश्यक सुरक्षा भी दी जा सकती है.

    अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो यह देश की विमानन क्षमता की कमजोरी को दिखाएगा. वायुसेना के सीमित और महत्वपूर्ण संसाधनों को उनकी मूल जिम्मेदारी के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

    लेखक सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल हैं. वे @bahadurmanmohan पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं. 

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