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    टूटे सपनों की कहानी है नीट पेपर लीक कांड

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 1, 2026

    कोचिंग इंडस्ट्री का टर्नओवर सालाना 60,000 करोड़ रुपये से बढ़कर अब 1.5 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अंदाजा है। इससे अनैतिक और आपराधिक हरकतों को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है, और इसी वजह से यह संकट गहराता जा रहा है।

    रश्मि सहगल

    Published: 30 May 2026, 8:14 PM

    भारत में परीक्षा संचालन से जुड़े विवाद केवल नकल घोटाले तक सीमित नहीं हैं। ये एक गहरे भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत खामियों को उजागर करते हैं, जो चिकित्सा शिक्षा और छात्रों के भविष्य के लिए खतरा हैं।

    2016 से 2026 के बीच, बड़ी परीक्षाओं में 89 बार पेपर लीक हुए और 48 बार परीक्षा दोबारा करानी पड़ी। इनमें सबसे ताजा मामला नीट-यूजी 2026 का है जिसकी 21 जून को दोबारा परीक्षा होनी है। इसका असर 23 लाख छात्रों पर पड़ रहा है, जिन्हें एक बार फिर मानसिक-आर्थिक रूप से थका देने वाले मुश्किल दौर का सामना करना होगा। इसकी भी गारंटी नहीं कि इस बार कोई गड़बड़ी नहीं होगी। इसी बीच, सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा के मूल्यांकन से जुड़ा घोटाला भारत की परीक्षा प्रणाली की पोल-पट्टी खोलकर रख देता है।

    यह रिपोर्ट लिखे जाने तक नीट-यूजी परीक्षा देने वाले कम-से-कम चार छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी। सीकर, लखीमपुर खीरी, दिल्ली और गोवा के इन युवाओं ने दोबारा परीक्षा की तैयारी के दबाव को झेलने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।

    करियर्स 360 के चेयरमैन महेश्वर पेरी का कहना है कि सबसे बड़ी दिक्कत मांग और आपूर्ति में भारी बेमेल की है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की 30,000 सीटों के लिए 23 लाख छात्र दो-दो हाथ करते हैं। सरकारी कालेजों में 5-6 लाख रुपये की फीस के मुकाबले, निजी मेडिकल कॉलेज 1 करोड़ से 5 करोड़ रुपये तक फीस लेते हैं। इससे ही उस हताशा, निराशा और मायूसी की वजह समझ आती है। पेरी कहते हैं, ‘मां-बाप को प्रश्नपत्र के सेट के लिए 10-15 लाख रुपये खर्च करने में हिचक नहीं होती, बशर्ते उन्हें यकीन हो कि उनके बच्चों को किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिल जाएगी।’

    एलन करियर इंस्टीट्यूट के सीईओ नितिन कुकरेजा कहते हैं, ‘मेडिकल की डिग्री को आर्थिक रूप से सुरक्षित भविष्य की कुंजी माना जाता है। लेकिन किसी प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में दाखिला केवल नीट में अच्छा स्कोर करने पर ही मिल सकता है।’ ‘इंडिया टुडे’ के नवीनतम ‘बेस्ट कॉलेज सर्वे’ के मुताबिक, सरकारी मेडिकल कॉलेज में सबसे कम मासिक फीस 1,628 रुपये है, जबकि निजी कॉलेज में यह 1.9 लाख रुपये प्रति माह है।

    सीबीआई ने इस साल के नीट पेपर लीक मामले में अब तक जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे, लातूर और अहिल्यानगर से 11 लोगों को गिरफ्तार किया है जिनमें कोचिंग सेंटर के डायरेक्टर, प्रिंसिपल और शिक्षक शामिल हैं। 2015 से अब तक पेपर लीक के 15 मामलों की जांच के बावजूद सीबीआई  का रिकॉर्ड खासा निराशाजनक रहा है- अब तक सिर्फ एक मामले में सजा हुई है। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय 11 मामलों की जांच कर रहा है, लेकिन किसी में सजा नहीं दिला पाया है।

    कोचिंग संस्थानों पर वर्षों से संदेह बना हुआ है। सैकड़ों ऐसे संस्थान छात्रों को लुभाने की होड़ में लगे हैं। इनमें से कई संस्थान और उनसे संबद्ध ‘फर्जी स्कूल’ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजनेताओं से जुड़े हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कोचिंग केन्द्रों को ‘प्रतिभाओं को हथियाने के केन्द्र’ और ‘प्रतिभाओं के लिए काले गड्ढे’ बताते हुए उनकी निंदा की है, जो छात्रों की क्षमता को दबाने वाले अनुशासित समूह बनाते हैं।

    राजनीति और कोचिंग सेंटर के इस गठजोड़ का खुलासा 2024 में तब हुआ, जब नीट-यूजी परीक्षा में टॉप करने वाले कई छात्र हरियाणा के बहादुरगढ़ स्थित एक ही परीक्षा केन्द्र के निकले। इनमें से छह के सीट नंबर एक ही क्रम में थे। जांच में पता चला कि इस परीक्षा केन्द्र का संचालन स्थानीय बीजेपी युवा मोर्चा के प्रमुख की पत्नी कर रही थीं। परीक्षा के दिन प्रश्नपत्रों में गड़बड़ी हो गई थी, जिसके कारण परीक्षा शुरू होने में देरी हुई। इसके अलावा, बाद में यह भी सामने आया कि कुछ ‘टॉपर्स’ ने बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, जिससे उनके नीट के ऊंचे अंकों पर संदेह पैदा हुआ।

    2024 में, सीकर के एक सेंटर से 67 छात्रों ने 720 में 720 नंबर पाए। पता चला कि इस सेंटर के राजस्थान के एक राजनेता से गहरे रिश्ते हैं। 2024 में एक और घोटाला गोधरा के एक अनजान ‘जय जलाराम सेंटर’ में सामने आया, जहां छात्रों द्वारा अधूरे भरे गए जवाबों को, उत्तर-कुंजिका जारी होने के बाद, परीक्षा खत्म होने पर शिक्षकों द्वारा पूरा किया गया था। गुजरात पुलिस ने पाया कि पूरे देश से कम-से-कम 26 छात्रों ने इसी सेंटर से नीट पास करने के लिए 10 से 66 लाख रुपये तक की रकम चुकाई थी।

    शिक्षाविद अब सवाल उठा रहे हैं कि नीट, जेईई सिस्टम क्यों नहीं अपनाता, जहां प्रश्न पत्र एक विशाल, एन्क्रिप्टेड बैंक से अपने आप तैयार होते हैं, जिसे कई सालों की कड़ी मेहनत से विकसित किया गया है, और उन्हें तभी डिक्रिप्ट किया जाता है जब उम्मीदवार अपनी परीक्षा शुरू करते हैं। जेईई साल में दो बार, 5-6 दिनों तक आयोजित किया जाता है और इसमें 14 लाख छात्र बैठते हैं। जेईई-मेन के लिए प्रश्न तैयार करने में आईआईटी के शीर्ष प्रोफेसर शामिल होते हैं। नीट के मामले में, न तो इंडियन मेडिकल बोर्ड और न ही प्रमुख मेडिकल कॉलेजों के प्रोफेसरों की प्रश्न तैयार करने में कोई भूमिका होती है।

    शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अब कहा है कि नीट भी जेईई की तरह पेन-एंड-पेपर मोड से हटकर कंप्यूटर-आधारित टेस्ट में बदल जाएगा। हालांकि, इसमें भी तकनीकी गड़बड़ियां और कभी-कभार किसी और के नाम पर परीक्षा देने के मामले सामने आते हैं, लेकिन नीट को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनकी तुलना में ये कम गंभीर होती हैं।

    एनटीए के गठन से पहले, सीबीएसई ही संबंधित राज्य की परीक्षाओं के अलावा अखिल भारतीय प्री-मेडिकल/प्री-डेंटल (एआईपीएमटी) प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करता था। एआईपीएमटी पास करने वाला छात्र केन्द्र सरकार के अधीन किसी भी मेडिकल कॉलेज में सीधे प्रवेश ले सकता था, और साथ ही हर राज्य के मेडिकल कॉलेज में गैर-निवासी छात्रों के लिए निर्धारित 15 प्रतिशत कोटे का लाभ भी उठा सकता था।

    एनटीए को अमेरिका की ‘एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस’ (ईटीएस) मॉडल पर बनाया गया है, जो ‘स्कॉलैस्टिक असेसमेंट टेस्ट’ (एसएटी), ‘अमेरिकन कॉलेज टेस्ट’ (एसीटी) और ‘ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशंस’ (जीआरई) आयोजित करती है। हालांकि, ईटीएस के उलट, जिसमें 200 से ज्यादा स्थायी कर्मचारी हैं, एनटीए अपने दिल्ली कार्यालय में सिर्फ दो दर्जन स्थायी कर्मचारियों के साथ काम करता है।

    कर्मचारियों की भारी कमी के कारण एजेंसी को पेपर-सेटिंग, वितरण और डेटा सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को निजी एजेंसियों को आउटसोर्स करना पड़ा है, जिससे पेपर लीक होने का खतरा बढ़ गया है। उच्च शिक्षा के पूर्व सचिव आर. सुब्रमण्यम का कहना है कि एनटीए को ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित करने के लिए बनाया गया था, और वह नीट जैसी परीक्षा कराने में सक्षम नहीं है; यह परीक्षा इतने विशाल पैमाने पर होती है कि इसके संचालन में ही दो लाख से अधिक लोगों की जरूरत पड़ती है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा संकाय की पूर्व डीन डॉ. अनीता रामपाल विश्वविद्यालयों के लिए साझा प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है, ‘बहुविकल्पीय प्रश्न किसी छात्र की समझ की गहराई नहीं आंकते। न ही यह आंकते हैं कि छात्र में एक अच्छा डॉक्टर बनने की क्षमता और संवेदनशीलता है या नहीं।’ रामपाल बताती हैं कि कैसे एक ही केन्द्रीय नीट परीक्षा होने से राज्य बोर्डों की अहमियत कम हो गई है।

    रामपाल कहती हैं, ‘तमिलनाडु ने नीट का विरोध किया क्योंकि वे अपने गांवों में अच्छा काम करने वाले क्लिनिक चाहते थे, लेकिन यह परीक्षा उनके गांव के लड़कों को इसमें शामिल होने का मौका नहीं देती। मौजूदा परीक्षा ने ऐसे डॉक्टर पैदा किए हैं जो सिर्फ अपना फायदा देखते हैं, न कि ऐसे डॉक्टर जो लोगों की सेवा करते हैं।’ वह एनटीए की छात्रों के प्रति दूरदर्शिता की कमी और शोध क्षमताओं के अभाव की भी उतनी ही आलोचना करती हैं- ‘इसे एक वैधानिक निकाय बनाया जाना चाहिए जो संसद के प्रति जवाबदेह हो। इसे संवैधानिक दर्जा देने से एजेंसी को उन संबद्ध स्कूलों को सीधे दंडित करने का अधिकार मिलेगा जो ये परीक्षाएं आयोजित करते हैं और गलत गतिविधियों में लिप्त होते हैं। फिलहाल, वे एनटीए के प्रति जवाबदेह नहीं।’

    नलसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के पूर्व वाइस-चांसलर फैजान मुस्तफा कहते हैं, ‘हमारे जैसे बड़े देश में, कम-से-कम तीन, चार या पांच परीक्षाएं होनी चाहिए, ताकि अगर कोई एक में अच्छा न कर पाए, तो उसे दूसरी में बैठने का मौका मिले और उसका साल बर्बाद न हो।’

    इस परीक्षा प्रणाली में आपराधिक तत्वों के घुसपैठ का डर बना हुआ है। शिक्षाविदों का कहना है कि इसमें बहुत बड़ी रकम शामिल है। 60,000 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर से बढ़कर, कोचिंग इंडस्ट्री का टर्नओवर अब करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इससे अनैतिक और आपराधिक हरकतों को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है, जिससे यह संकट गहराता जा रहा है और इसका कोई आसान हल नजर भी नहीं आ रहा।

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