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    जलवायु परिवर्तन और भीषण गर्मी ने बढ़ाई चिंता, महिलाओं के स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा खतरा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 5, 2026

    जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी का असर महिलाओं पर पुरुषों से अधिक पड़ रहा है। अध्ययन में स्वास्थ्य, पोषण, गर्भावस्था और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर जोखिमों का खुलासा हुआ है।

    महेन्द्र पांडे

    Published: 05 Jun 2026, 10:07 AM

    संयुक्त राष्ट्र की संस्था, वर्ल्ड मेटेरियोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन ने हाल में ही चेतावनी जारी की है, इसके अनुसार वर्ष 2026 की रिकार्डतोड़ गर्मी में अत्यधिक तापमान के सभी रिकार्ड अगले 5 वर्षों में ही ध्वस्त हो जाएंगें। वर्ष 2026 से 2030 के बीच तापमान बृद्धि की दर हरेक वर्ष 1.5 डिग्री सेल्सियस पार करेगी। फिलहाल यह बृद्धि 1.4 डिग्री सेल्सियस है। इससे चरम तापमान की घटनाओं के साथ ही जंगलों में आग, सूखा, कम पैदावार के साथ ही स्वास्थ्य पर संकट बढ़ेगा।

    कुछ दिनों पहले तक दिल्ली समेत देश के अनेक शहरों में तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा था और देश के अनेक हिस्सों में 46 डिग्री तक तापमान पहुंच गया था। केवल दिन में ही नहीं बल्कि रात का न्यूनतम तापमान भी 30 डिग्री सेल्सियस के पास पहुंचने लगा है। वर्ल्ड वेदर ऐट्रिब्यूशन नामक वैज्ञानिकों के एक समूह ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर बताया है कि भारत के अधिकतर इलाकों में तापमान का 40 डिग्री सेल्सियस पार कर जाना अब कोई चरम स्थिति नहीं है बल्कि यह मॉनसून से पहले अब बिल्कुल सामान्य हो चला है।

    वैश्विक स्तर पर मौसम और वायु प्रदूषण का हाल बताने वाली संस्था, एक्यूआई, ने शहरों में तापमान के संदर्भ में 27 अप्रैल 2026 का दिन आधुनिक दौर का एक अभूतपूर्व दिन बताया था – इस दिन दुनिया के सबसे गरम 50 शहरों में सभी शहर भारत के थे। इनमें से अधिकतर शहर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के थे। एक्यूआई के अनुसार आधुनिक दौर में ऐसे स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई थी। सबसे गरम 50 शहरों का औसत तापमान उस दिन 44.7 डिग्री सेल्सियस था – सबसे कम तापमान महाराष्ट्र के शोलापुर में 41.9 डिग्री और सबसे अधिक उत्तर प्रदेश के बांदा में 46.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। यह स्थिति पूरे देश में जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित की जानी चाहिए थी, पर सामान्य जनता की दुश्वारियाँ सत्ता के गलियारों तक कभी नहीं पहुँचती हैं।

    भारत में पारंपरिक तौर पर अप्रैल का महीन सबसे गरम नहीं रहता, पर जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि ने देश में मॉनसून से पहले गर्मी के मौसम हो लंबा कर दिया है और पहले से अधिक गरम कर दिया है। एक्यूआई के अनुसार यदि तापमान बृद्धि रोकने के कदम जल्दी नहीं उठाए गए तो वर्ष 2050 तक देश के अनेक शहरों का तापमान मानव के बर्दाश्त करने की क्षमता से आगे बढ़ जाएगा। मानव शरीर का औसत तापमान 37.5 डिग्री सेल्सियस रहता है, इससे अधिक कोई भी तापमान आबादी के लिए जन स्वास्थ्य आपात स्थिति है।

    पैन-यूरोपियन कमिशन ऑन क्लाइमेट एण्ड हेल्थ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से कोविड की तरह हे जलवायु परिवर्तन को वैश्विक स्वास्थ्य आपदा घोषित करने की मांग की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही जलवायु परिवर्तन को वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य की गंभीर समस्या मान  चुका है। जलवायु परिवर्तन कोई छुआ-छूत का रोग नहीं है और ना ही ये किसी वेक्टर या जैविक माध्यम से फैलता है, फिर भी यह दुनिया की पूरी आबादी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। पैन-यूरोपियन कमिशन के अनुसार यदि इसे स्वास्थ्य आपदा जल्दी नहीं घोषित किया गया तो निश्चित तौर पर हरेक वर्ष करोड़ों लोगों की असामयिक मृत्यु निश्चित है।

    जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्या है, इससे जैविक माध्यम से प्रसारित होने वाले रोग बढ़ रहे हैं, चरम तापमान स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, कृषि उत्पादकता पर असर पड़ रहा है और वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। इन सबसे असामयिक मृत्यु की दर तेजी से बढ़ती जा रही है। जलवायु परिवर्तन कोई फेक न्यूज नहीं है, बल्कि अब हर कोई इसके प्रभाव को महसूस कर सकता है। स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न, पानी, पर्यावरण, और सुरक्षा के संदर्भ में इसके प्रभाव केवल अभी तक सीमित नहीं हैं बल्कि इसके दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेंगे। इसकी रोकथाम के लिए वैश्विक स्तर पर एक समन्वित योजना की आवश्यकता है, पर ऐसा हो नहीं रहा है। पैन-यूरोपियन कमिशन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी आपदा की तरह देखने का समय आ गया है।

    लान्सेट काउन्टडाउन शृंखला की 9 वीं रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर प्रभाव से संबंधित है। इसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि के कारण किस तरीके से पूरी दुनिया में गर्मी और चरम प्राकृतिक आपदाओं से मृत्यु के आँकड़े बढ़ रहे हैं, खाद्य असुरक्षा से कुपोषण का दायरा बढ़ता जा रहा है, जंगलों में आग के बढ़ते मामलों के कारण प्रदूषित हवा का प्रभाव पहले से अधिक लोगों पर पड़ रहा है और अनेक संक्रामक रोगों  का दायरा बढ़ता जा रहा है। इस दौर में जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य पर अभूतपूर्व खतरे बढ़ रहे हैं। रिकार्डतोड़ गर्मी, मारक प्राकृतिक आपदाएं और जंगलों की आग का प्रभाव दुनिया के हरेक कोने में पड़ेगा। दुनिया का 48 प्रतिशत हिस्सा भयानक सूखे की चपेट में है और अधिकतर हिस्सों में भयानक गर्मी का दौर 50 दिनों से भी अधिक समय तक रहने लगा है। पहले से भूखी आबादी में 15 करोड़ से भी अधिक नई आबादी जुड़ गई। वर्ष 1990 से अबतक चरम गर्मी के कारण 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी के मृत्यु दर में 167 प्रतिशत की बृद्धि दर्ज की गई है। डेंगू, मलेरिया और वेस्ट नाईल वायरस का प्रकोप पहले से अधिक भौगोलिक क्षेत्रों और आबादी पर पड़ रहा है।

    यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबोर्न के शोधकर्ताओं ने प्रशांत क्षेत्र, एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों का विस्तृत अध्ययन कर बताया है कि अत्यधिक गर्मी, जिसका दायरा और तीव्रता साल दर साल बढ़ता जा रहा है, का प्रभाव महिलाओं पर पुरुषों की अपेक्षा अधिक पड़ता है। यह प्रभाव तापमान के साथ ही सामाजिक कारणों से भी बढ़ता है। पर, महिलायें तापमान के प्रभाव को कम करने के रास्ते भी तलाश लेती हैं। इस अध्ययन को ओपन एसेस जर्नल, वायर्स क्लाइमेट चेंज, में 14 अप्रैल 2026 को प्रकाशित किया गया है।

    अत्यधिक तापमान को एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या माना गया है और इससे हरेक वर्ष वैश्विक स्तर पर लगभग पांच लाख लोगों की असामयिक मृत्यु होती है। पर, इन स्वास्थ्य प्रभावों में महिलाओं पर हरेक दिन पड़ने वाले प्रभावों या फिर कुल असामयिक मृत्यु में महिलाओं की संख्या पर कोई चर्चा नहीं की जाती। अत्यधिक तापमान से प्रभावितों और मृत्यु की कुल संख्या पर तो बहुत चर्चा की जाती है, पर इसके प्रभाव केवल बीमारी या मौत तक सीमित नहीं हैं। अत्यधिक तापमान पूरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

    अत्यधिक तापमान का अनुभव महिलाओं और पुरुषों को अलग होता है और इसका निर्धारण तापमान के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक आधार पर होता है। कितना भी तापमान बढ़ जाए सामाजिक तौर पर महिलाओं को दिनभर पुरुषों की तुलना में अधिक कपड़े पहने रहने पड़ते हैं। दूसरी तरफ अधिकतर गरीब  और मध्यम वर्ग की महिलायें परंपरागत तौर पर घर को संभालने का काम करती हैं और घर के अंदर ही रहती हैं। अधिकतर घरों में हवा के परिचालन की व्यवस्था नहीं रहती है और ना ही गर्मी से बचाव के कोई साधन। हाल में ही एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि ऐसे घरों में अंदर का तापमान बाहर से भी अधिक हो सकता है। इस अत्यधिक तापमान में दिनभर महिलायें घर के अंदर रहती ही नहीं हैं बल्कि रसोई में चूल्हे के आगे काम भी करती हैं। ऐसे ही अनेक कारण हैं जिनसे महिलाओं के लिए गर्मी की अनुभूति पुरुषों से अधिक रहती है, और उन्हें मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाती है। यह सब महिलाओं को केवल बीमार ही नहीं करता बल्कि शरीर के बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे को भी प्रभावित करता है।

    गरीब तबके की महिलायें घर से बाहर यदि काम पर भी जाती हैं तब खुले में काम करने पर मजबूर रहती हैं। दूसरी समस्या यह है कि अधिकतर सामान्य और खुले कार्यस्थलों पर शौचालय की सुविधा नहीं होती या फिर शौचालय इतने गंदे होते हैं कि कोई उपयोग करना नहीं चाहता। ऐसी स्थितियों में काम करने वाली महिलायें आवश्यकता से कम पानी पीती हैं और फिर अत्यधिक तापमान की दशा में शरीर में पानी की कमी का शिकार हो जाती हैं। महिलायें कमजोर और सुस्त हो जाती हैं, जिसका असर घर के कामों पर भी पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के लिए स्थितियां और भी खराब रहती हैं। अनेक अध्ययनों के अनुसार अत्यधिक तापमान की दशा में महिलायें अधिक संख्या में घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। बांग्लादेश, कॉम्बोडिया और नेपाल में किए गए अध्ययनों के अनुसार लगातार बढ़ते तापमान की स्थिति में बाल-विवाह की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

    महिलाओं का एक मौलिक गुण होता है – अपने बलबूते पर समस्याओं का हल खोजना। महिलायें समस्या के समाधान के लिए किसी सरकारी योजना या मदद की प्रतीक्षा नहीं करतीं। गुजरात के अहमदाबाद में गरीब और मध्यम वर्ग की अनेक महिलाओं ने अपने घरों की छतों को और सीधी धूप वाली दीवारों को सफेद रंग से रंग दिया है – इससे किरणों का परावर्तन अधिक होता है और गर्मी के अवशोषण में कमी आती है – घर के अंदर का तापमान अपेक्षाकृत कम हो जाता है। इसके साथ ही छतों पर नारियल पर बुरादा और पत्तियां छिड़क दिया गया है जिससे तापमान और कम हो जाता है। बांग्लादेश में अब घर के कम से कम एक कमरे को हवादार और छायादार करने की मुहिम चल रही है। इंडोनेशिया के जकार्ता में महिलाओं ने सघन छायादार खुली जगहों को विकसित कर सामुदायिक स्थल बनाए हैं। इनसे गर्मी से बचाव के साथ ही सामाजिक मेलजोल भी बढ़ रहा है। सरकारी नीतियों में भी अत्यधिक तापमान से बचाव की नीतियों में महिलाओं के मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है।

    तमाम सबूतों और बढ़ते प्रभावों के बाद भी दुनिया जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि को रोकने के लिए जरा भी गंभीर नहीं है। पूंजीवाद और कट्टर दक्षिणपंथियों के सत्ता में आने के बाद से यह समस्या पहले से अधिक विकराल हो चली है।

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