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    वाजपेयी-आडवाणी की BJP के सहारे बढ़े ममता, नवीन, नीतीश, अब मोदी-शाह की भाजपा के सामने हिसाब चुकाने की बारी

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJune 16, 2026

    एक वक्त था जब क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई में बीजेपी एक सुविधाजनक सहयोगी लगती थी, लेकिन उन्हें बहुत देर से समझ आया कि मोदी-शाह की बीजेपी पहले वाली भाजपा से अलग है.

    2017 की एक उमस भरी दोपहर मैं सफदरजंग रोड स्थित एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के घर पर बैठा था. वह बेहद निराश थे. कांग्रेस लगातार कमज़ोर हो रही थी, लेकिन पार्टी नेतृत्व को न तो हालात की समझ थी और न ही कोई चिंता दिख रही थी.

    उन्होंने कहा, “वे बीजेपी को नहीं जानते. यह एक टिक की तरह है. यह यहां से (टखने की ओर इशारा करते हुए) आपकी नस में घुसती है और जब तक आपको पता चलता है, तब तक यहां (सिर की ओर इशारा करते हुए) पहुंच जाती है.” 2020 में वही नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.

    ममता बनर्जी शायद इस बात से पूरी तरह सहमत होंगी क्योंकि उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) आज बड़े संकट का सामना कर रही है. उन्हें शायद 1998 का लोकसभा चुनाव याद आए, जब उन्होंने बीजेपी से हाथ मिलाया था. वह दौर था जब अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी की राजनीतिक अस्पृश्यता खत्म करने की कोशिश कर रहे थे. इस गठबंधन से दोनों को फायदा हुआ. ममता बनर्जी की नई-नई बनी एआईटीसी को लोकसभा में सात सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को पश्चिम बंगाल से अपना पहला सांसद मिला— दमदम से तपन सिकदार. 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें बढ़कर दो हो गईं. उसी साल पार्टी को पश्चिम बंगाल में अपना पहला विधायक भी मिला—अशोकनगर से बादल भट्टाचार्य.

    इसके बाद की कहानी इतिहास है.

    जल्द ही वाजपेयी को ममता बनर्जी की बदलती राजनीतिक शैली का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ. 2001 में तहलका खुलासे के बाद उन्होंने एनडीए छोड़ दिया और उसी साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चली गईं. 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले वह फिर एनडीए में लौटीं, लेकिन 2006 के विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फिर गठबंधन छोड़ दिया. यह दोनों के बीच अंतिम अलगाव था. पिछले तीन चुनावों—दो विधानसभा और एक लोकसभा—में यह गठबंधन कोई खास असर नहीं दिखा पाया था. ममता के लिए वाम दलों के खिलाफ लड़ाई में बीजेपी की राजनीतिक उपयोगिता खत्म हो चुकी थी. आज शायद उन्हें इस बात का अफसोस होता हो कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को एक वैध और विश्वसनीय राजनीतिक ताकत बनने का मौका दिया. पूर्व ओडिशा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की भावनाएं भी कुछ ऐसी ही हो सकती हैं. दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में सक्रिय रहने वाले नवीन पटनायक अपने पिता बिजू पटनायनक के 1997 में निधन के समय डनहिल सिगरेट और फेमस ग्राउस व्हिस्की के शौकीन के रूप में जाने जाते थे.

    उस समय ओडिशा में बीजेपी की मौजूदगी बहुत सीमित थी. नवीन को जनता दल में अपने पिता के अनुभवी सहयोगियों से निपटने के लिए एक मार्गदर्शक और राजनीतिक सहारे की जरूरत थी. वाजपेयी और प्रमोद महाजन ने तुरंत उनका साथ दिया और बीजू जनता दल (बीजेडी) बनाने तथा उस पर नियंत्रण स्थापित करने में मदद की. इस गठबंधन से दोनों पक्षों को फायदा हुआ. 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को ओडिशा से अपने पहले सांसद मिले—और वह भी एक नहीं, पूरे सात. दो साल बाद दोनों दलों ने मिलकर कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया. हालांकि, बीजेपी इस गठबंधन में जूनियर पार्टनर ही रही. 2009 तक नवीन पटनायक एक अनुभवी नेता बन चुके थे और उन्हें बीजेपी के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से खतरा महसूस होने लगा था. उन्होंने 2009 के चुनाव से पहले बीजेपी से नाता तोड़ लिया, जिससे पार्टी अगले एक दशक तक राज्य में कमजोर बनी रही.

    वाजपेयी-आडवाणी दौर से उलट गई तस्वीर

    अब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देखिए. आज राजनीतिक हलकों में कई लोग उनके प्रति सहानुभूति जताते हैं. वे कहते हैं कि बीजेपी ने उनका इस्तेमाल किया और फिर उन्हें किनारे कर दिया. लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है. याद कीजिए, जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से अलग होकर 1994 में जॉर्ज फर्नांडेस के साथ समता पार्टी बनाई थी, तब वे कोई बड़े जननेता नहीं थे. जब समता पार्टी ने 1996 के आम चुनाव में बीजेपी से गठबंधन किया, तब वाजपेयी-आडवाणी की बीजेपी ज्यादा बड़ी राजनीतिक ताकत थी. इसके बावजूद दोनों नेताओं ने नीतीश कुमार को गठबंधन में बड़ा नेता बनने का मौका दिया और उन्हें अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बीजेपी का इस्तेमाल करने दिया.

    2010 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपमानित करने के लिए पटना में उनके सम्मान में रखा गया रात्रिभोज रद्द करने वाले नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी के धैर्य की कई बार परीक्षा ली. यह भी कहा जा सकता है कि बिहार के तथाकथित ‘पलटूराम’ ने बीजेपी को हमेशा असुरक्षित और सतर्क बनाए रखा.

    नवीन पटनायक, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी में क्या समानता है? पहली बात, इन तीनों ने वाजपेयी-आडवाणी की बीजेपी के सहारे खुद को बड़े राजनीतिक नेता के रूप में स्थापित किया. दूसरी बात, इन नेताओं ने बीजेपी की राजनीतिक अस्पृश्यता खत्म करने और अलग-अलग राज्यों में उसका विस्तार करने में मदद की. तीसरी बात, इनका रिश्ता काफी हद तक लेन-देन वाला था. इन क्षेत्रीय नेताओं को लगता था कि बीजेपी का इस्तेमाल अपनी जरूरत के मुताबिक किया जा सकता है और फिर उसे छोड़ा जा सकता है. जब बाल ठाकरे ने 1984 के चुनाव में शिवसेना के दो नेताओं को बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर उतारा था—जो आगे चलकर दोनों दलों के औपचारिक गठबंधन की भूमिका बना—तब शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा कि 30 साल बाद देवेंद्र फडणवीस की सरकार में शिवसेना को बीजेपी की जूनियर सहयोगी की भूमिका निभानी पड़ेगी.

    2019 में उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया और अंततः अपनी पार्टी भी एकनाथ शिंदे के हाथों गंवा बैठे. ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है. एक वक्त था जब क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई में बीजेपी एक सुविधाजनक सहयोगी लगती थी. पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ भी यही स्थिति थी. आज ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, ठाकरे और कई अन्य नेताओं के साथ जो हुआ है, उसकी एक बड़ी वजह यह है कि उन्होंने यह नहीं समझा कि मोदी-शाह की बीजेपी पहले वाली भाजपा से अलग है. और शायद यही पहला सबक है जो आज बीजेपी के सहयोगियों को सीखना चाहिए—वे मोदी-शाह की भाजपा का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि मामला उल्टा है.

    उपेंद्र कुशवाहा का मामला

    उपेंद्र कुशवाहा इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं. 2013 में, नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने से कुछ महीने पहले, कुशवाहा ने जनता दल (यूनाइटेड) छोड़कर अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई. बाद में वे एनडीए में शामिल हो गए और इसका बड़ा फायदा मिला. 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने जिन तीन सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर जीत हासिल की. उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद भी मिला, लेकिन कुशवाहा को शायद अपनी और अपनी पार्टी की लोकप्रियता को लेकर गलतफहमी हो गई. उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार और एनडीए छोड़ दिया.

    2019 के लोकसभा चुनाव और 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्हें वास्तविक राजनीतिक ताकत का अहसास हो गया. 2023 तक वे अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्टा (आरएलएम) के साथ फिर एनडीए में लौट आए. फिलहाल बीजेपी ने विधान परिषद चुनाव में उनके बेटे दीपक को टिकट देने से इनकार कर दिया है, जिससे सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में उनकी स्थिति मुश्किल हो गई है. इसकी वजह यह है कि कुशवाहा ने अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय करने से इनकार कर दिया. हालांकि, बीजेपी ने 2024 में उन्हें राज्यसभा भेजा था, लेकिन अब पार्टी चाहती है कि वे अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दें. जब बिहार के मुख्यमंत्री भी कुशवाहा समाज से आते हैं, तो बीजेपी को एक और कुशवाहा चेहरे की ज़रूरत क्यों होगी?

    आरएलएम प्रमुख अभी तक इस हकीकत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखते, लेकिन उनके पास विकल्प भी बहुत कम हैं. आज सारे पत्ते बीजेपी के हाथ में हैं. अगर वे एनडीए छोड़ना चाहते हैं और अपने बेटे को बिहार मंत्रिमंडल में जगह न मिलने के विरोध में राज्यसभा से इस्तीफा देना चाहते हैं, तो बीजेपी उन्हें मनाने के लिए फोन नहीं करेगी. यह पूरी तरह उनका अपना फैसला होगा.

    बीजेपी हमेशा जीतने वाले पक्ष में

    मोदी-शाह की गठबंधन राजनीति को समझने के लिए एक और उदाहरण देखते हैं. 2021 के असम विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, राज्य में बीजेपी की सहयोगी पार्टी बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट ने 2020 के बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जीत हासिल की थी. लेकिन बीजेपी ने सरकार बनाने के लिए दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल के साथ हाथ मिलाया और बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) में सरकार बना ली. ज़ाहिर है, राष्ट्रीय पार्टी बीपीएफ का दबदबा स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. इससे नाराज़ बीपीएफ 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के साथ चली गई, लेकिन अंत में उसे विपक्षी बेंचों पर बैठना पड़ा. सितंबर 2025 में बीपीएफ ने बीटीसी चुनाव में बीजेपी-यूपीपीएल गठबंधन को हराकर शानदार जीत दर्ज की.

    बीजेपी ने इसका जवाब कैसे दिया?

    असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने बीपीएफ को फिर से सरकार में शामिल कर लिया. इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपीपीएल को लगभग अकेला छोड़ दिया. बीजेपी ने बीपीएफ को 11 सीटें दीं और खुद बीटीआर क्षेत्र की चार अन्य सीटों पर चुनाव लड़ा. यूपीपीएल को अकेले चुनाव लड़ना पड़ा और उसे एक भी सीट नहीं मिली. असल में बीपीएफ और यूपीपीएल में से कोई भी क्षेत्रीय पार्टी जीते या हारे, बीजेपी को हमेशा जीतने वाले पक्ष में रहना है. अगर आज असम में यूपीपीएल या बिहार में आरएलएम खुद को इस्तेमाल किया हुआ महसूस कर रही हैं, तो उन्हें इसके साथ जीना सीखना होगा.

    यही मोदी-शाह की बीजेपी है. नवीन पटनायक, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने कभी अपने फायदे के लिए बीजेपी का इस्तेमाल किया था और भाजपा ने भी उनका इस्तेमाल किया था, लेकिन अब राजनीतिक हालात बदल चुके हैं. आज बीजेपी सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति है और सहयोगी दलों को टिके रहने के लिए उसके अधीन सहयोगी की भूमिका निभानी पड़ती है.

    फिलहाल उसे एन. चंद्रबाबू नायडू और एडप्पादी के. पलानीस्वामी जैसे नेताओं के साथ तालमेल बनाकर चलना पड़ रहा है, लेकिन यह केवल समय की बात है. भूमिकाएं अब बदल चुकी हैं. मोदी-शाह की बीजेपी को किसी भी तरह की “टिक” बर्दाश्त नहीं है. वैसे, जिस पूर्व कांग्रेस नेता ने मुझे बीजेपी को टिक बताया था, वह आज मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.

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