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    घर में नमाज पर भी एतराज़ : ‘दूसरों’ की आस्था के लिए नहीं बची कोई जगह

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJanuary 24, 2026

    तीन दशक पहले का यह मामला सार्वजनिक जगह के इस्तेमाल को लेकर एतराज़ का था। पर हाल की घटना तो घर के भीतर की है, निहायत ज़ाती जगह, जिसके बारे में मकान मालिक हसीन ख़ां के भाई की बीवी ने मीडिया को बयान भी दिया कि उनकी इजाज़त लेकर लोग नमाज़ के लिए आए थे।

    प्रभात सिंह

    Published: 24 Jan 2026, 6:03 PM

    मीडिया की सनसनीखेज़ ख़बरों की भूख और सोशल मीडिया से इसे मिलने वाली ग़िज़ा ने ऐसा मंज़र बना डाला है कि सही-ग़लत, जायज़-नाजायज़, हक़ीर या अहम सब आपस में गड्डमड्ड होकर सनसनी पैदा करने का सामान बन गए हैं। अमूमन अमनपसंदी का क़ायल रहा हमारा शहर बरेली भी इसकी ज़द में है। इधर कुछ रोज़ से बिशारतगंज का एक छोटा-सा गांव मोहम्मदगंज सुर्ख़ियों में है। मीडिया और सोशल कहे जाने वाले मीडिया में भी हर किसी के पास कुछ न कुछ बताने को है, बताया भी जा रहा है। इस बार ज़ेर-ए-बहस जुमे की नमाज़ है।

    बीती 16 जनवरी की बात है। गांव में हसीन ख़ां के ख़ाली घर में गांव के ही कुछ लोग जमा होकर जुमे की नमाज़ पढ़ रहे थे। बताते हैं कि तेजपाल नाम के किसी शख़्स ने घर में घुसकर नमाज़ पढ़ते हुए लोगों का वीडियो बनाया, सोशल मीडिया पर पोस्ट किया और लोगों ने पुलिस से शिकायत की कि कामचलाऊ मदरसा बनाकर वहां नमाज़ पढ़ी जा रही है। बाद में सब-इंस्पेक्टर अनीस अहमद ने वीडियो से पहचान करके 15 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया और 12 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ़्तार लोगों को आंवला में एसडीएम के सामने पेश किया गया और उन्हें ज़मानत पर छोड़ दिया गया।

    भिंडौरा गांव का मजरा है मोहम्मदगंज, जिसकी आबादी एक हज़ार से भी कम है और जहां कुल बीस-बाइस घर मुसलमानों के हैं। जाने कितने अरसे से साथ रहते आए इस गांव के लोगों को नहीं मालूम, मगर हैरानी है कि मीडिया के धुरंधरों को भी इबादतगाह और पाठशाला का फ़र्क़ नहीं मालूम। टेलीविज़न और अख़बार की ख़बरों में भी हल्ला यही है कि ख़ाली घर पर क़ब्ज़ा करके उसे मदरसे में तब्दील करने की कोशिश हो रही है। इधर कुछ सालों से सूबे में मदरसों के ख़िलाफ़ जो माहौल बनाया गया है, उसने आम आदमी की चेतना पर यही असर किया है कि मदरसे तालीम की जगह समझे जाने के बजाय, ख़ौफ़ का ठिकाना समझे जाने लगे हैं।

    मोहम्मदगंज के मामले में गफ़लत का यह सिलसिला पिछले महीने तारिक का घर बनने के दौरान हुआ। 21 दिसंबर को भट्टे से ईंटें लेकर गांव आए तांगे वाले ने किसी से उसके ठिकाने का पता पूछते हुए कह दिया था कि जहां मदरसा बन रहा है, वहां ईंटें पहुंचानी हैं। इस बात को लेकर गांव में सुगबुगाहट तेज़ हुई और कुछ लोग इसकी शिकायत लेकर एसडीएम से मिलने आंवला गए। अगले रोज़ यानी 30 दिसंबर को एसडीएम ने लेखपाल और क़ानूनगो को जांच करने के लिए मौक़े पर भेजा।

    तारिक ने उन्हें लिखकर दिया कि वह जानवर और भूसा रखने के लिए हॉल बना रहे हैं, मदरसे के लिए नहीं। यह भी लिख दिया कि आइंदा अगर कभी इस हॉल का इस्तेमाल किसी मज़हबी काम के लिए हुआ तो किसी तरह की क़ानूनी कार्रवाई के ज़िम्मेदार वह ख़ुद होंगे।

    गांव के लोगों के बीच तनातनी का ऐसा ही एक वाक़या तीस साल पहले गुज़रा था। सन् 1995 में रमज़ान के महीने में ग्राम सभा की सार्वजनिक ज़मीन पर नमाज़ पढ़े जाने को लेकर मनमुटाव की नौबत आई थी। कुछ लोगों के ऐतराज़ करने पर गांव के शक़ील ख़ां, रहमत ख़ां, शराफ़त ख़ां और इंतज़ार वगैरह ने वायदा किया कि ईद बाद वहां नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी। इस पर आपस में रज़ामंदी हो गई। 15 मार्च को डीएम और एसएसपी को एक अर्ज़ी देकर गांव वालों ने कहा कि कुछ लोग अब भी ग्राम सभा की ख़ाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ रहे हैं और रोकने पर भी नहीं मानते। गांव के अमन का वास्ता देते हुए बिना इजाज़त नई धार्मिक गतिविधि रुकवाने का आग्रह किया गया।

    तीन दशक पहले का यह मामला सार्वजनिक जगह के इस्तेमाल को लेकर एतराज़ का था। पर हाल की घटना तो घर के भीतर की है, निहायत ज़ाती जगह, जिसके बारे में मकान मालिक हसीन ख़ां के भाई की बीवी ने मीडिया को बयान भी दिया कि उनकी इजाज़त लेकर लोग नमाज़ के लिए आए थे।

    1995 में सबकी रज़ामंदी का नतीजा यह है कि गांव में आज भी कोई मंदिर या मस्जिद नहीं है। इमाम नौशाद का कहना है कि वह पिछले 22 सालों से जुमे की नमाज़ पढ़ाते आ रहे हैं। चूंकि जुमे की नमाज़ समूह में पढ़ते हैं, इसलिए गांव के लोग इजाज़त लेकर किसी के ख़ाली घर में नमाज़ पढ़ते आ रहे हैं। इजाज़त उन्होंने इस बार भी ली थी। घर में घुसकर नमाज़ की वीडियो बनाने वालों ने अलबत्ता किसी से नहीं पूछा था। और फिर वही सब हुआ, जिसे न्यू नार्मल क़रार देकर ज़माना किनारा कर लेता है।

    मेरी पीढ़ी और बाद की पीढ़ी के भी तमाम लोग अभी नहीं भूले होंगे कि राह चलते या फिर रेलगाड़ी के सफ़र में अगर कोई नमाज़ी साथ चल रहे होते तो वक़्त होने पर वह वुज़ू के लिए उठ खड़े होते और फिर दो बर्थ के बीच की ख़ाली जगह में कपड़ा बिछाकर इबादत के लिए बैठ जाते थे। आसपास के मुसाफ़िर उतनी देर के लिए अपनी बर्थ पर हाथ-पांव सिकोड़कर बैठे रहते, सब जतन करते कि उनकी इबादत में ख़लल न पड़ने पाए। कहीं राह में होते तो किसी पेड़ की छांव या खुली जगह में जा-नमाज़ बिछा लेते और साथ वाले सुस्ताते हुए उनकी इबादत पूरी होने का इंतज़ार करते।

    कौन कहे उसी पेड़ के नीचे सिंदूर में लिपटी कोई बटिया, कुछ फूल और बुझे हुए दीये भी रखे मिल जाते। और कोई ख़ां साहब या मियां जी ही क्यों, सफ़र में मालापोश में अपनी सुमिरिनी फेरते हुए, जाप करते कोई बुज़ुर्ग मिल जाते तो उन्हें भी ऐसे ही एहतिराम के क़ाबिल समझा जाता रहा। सफ़र अपनी जगह और मुसाफ़िर की आस्था, उसकी अक़ीदत अपनी जगह। यह न्यू नहीं था, नार्मल था। उस समाज और लोगों के संस्कार थे, जिसमें हमारी परवरिश हुई। समाजी संस्कार और सियासी संस्कार में शायद बुनियादी फ़र्क़ भी यही है।

    कुछ साल पहले दिल्ली और गुरुग्राम और देश के कई हिस्सों में सार्वजनिक जगहों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर हुए बवाल के साथ ही यह भी याद रखना होगा कि सिखों ने अपने गुरुद्वारे और तमाम हिन्दुओं ने नमाज़ियों के लिए अपने घर खोल देने की पेशकश की थी। यह हमारी साझी विरासत से अलग कोई अनोखी बात नहीं थी।

    अपनी दस्तावेज़ी किताब ‘कोई एक सईदा’ में नेहा दीक्षित ने दिल्ली के करावलनगर इलाक़े की श्रीराम कॉलोनी के इकलौते पार्क पर क़ब्ज़े की कारगुजारी का ब्योरा दर्ज किया है, यह पार्क शादी-ब्याह, मुंडन, जन्मदिन के उत्सवों के साथ ही दशहरे के मौक़े पर रामलीला खेलने और रावण का पुतला जलाने के लिए इस्तेमाल होता, रमज़ान के दिनों में और ईद के मौक़े पर बस्ती के लोग वहां नमाज़ पढ़ते। कुछ नेताओं को बस यही रास नहीं आया। 2015 की ईद के मौक़े पर उन्होंने वहां अपना एक बड़ा कार्यक्रम करना तय किया, और किया भी। अब इसका निहितार्थ भला किसकी समझ में नहीं आएगा!

    मोहम्मदगंज गांव में मंदिर-मस्जिद या मदरसा नहीं है, पर एक प्राथमिक विद्यालय ज़रूर है। तो इस स्कूल के मैदान पर कनात वगैरह तानकर बुधवार से अखंड रामायण का पारायण शुरू हुआ, बृहस्पतिवार शाम को पाठ पूरा होने के बाद भंडारे का आयोजन हुआ। गांव और आसपास के लोगों ने जुटकर प्रसाद पाया। बिथरीचैनपुर से बीजेपी के विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा भी भंडारे में शिरकत करने के लिए पहुंचे। गांव के लोगों ने उनसे मिलकर दरोगा अनीस अहमद की शिकायत की, कहा कि वह जान-बूझकर पक्षपात कर रहे हैं और घर में इकट्ठा होकर जुमे की नमाज़ पढ़ने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

    मौज़ू कुछ और सही, पर आप चाहें तो फ़रहत एहसास का कहा गुनगुना सकते हैं:

    कभी अल्लाह-मियां पूछेंगे तब उनको बताएंगे

    किसी को क्यूं बताएं हम इबादत क्यूं नहीं करते।

     

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