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    बापू के सपनों के स्वराज से कितनी दूर आ गए!

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldAugust 17, 2026

    महात्मा गांधी के अनुसार, डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आजाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है।

    कृष्ण प्रताप सिंह

    Published: 16 Aug 2026, 7:58 PM

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    आज की तारीख में हम स्वराज और स्वतंत्रता के अर्थों में गहरे अंतर के बावजूद दोनों का एक दूसरे के स्थान पर लगभग एक जैसा प्रयोग करते हैं। यह जाने बगैर और जानने के बावजूद कि स्वराज की अर्थ व्याप्ति स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा है। स्वतंत्रता जहां किसी बाहरी/विदेशी नियंत्रण, बंधन या शासन से मुक्ति का नाम है, स्वराज उसके साथ खुद पर खुद के शासन, दूसरे शब्दों में कहें तो, आत्मनियंत्रण की भी मांग करता है, जो उच्च नैतिक विकास के बगैर संभव नहीं है।

    चूंकि हम उस विकास के आस-पास भी नहीं फटक पाए हैं, इसलिए स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद भी स्वराज कल्पना ही बना हुआ है। हालांकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान, उन्हीं की जुबानी कहें, तो अपने तईं उसकी मुकम्मल तस्वीर गढ़ने में कुछ भी उठा नहीं रखा था।

    स्वराज के अब तक हासिल न हो पाने के कारण तलाशें तो ऐसा कतई नहीं कह सकते कि महात्मा को उसके रास्ते की इस बाधा का अंदाजा नहीं था या वह उसे समझते ही नहीं थे। 1909 में प्रकाशित अपनी बहुचर्चित कृति ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने लिखा था कि वह कहीं ज्यादा सादगी और त्याग वाले जिस स्वराज का सपना देख रहे हैं, देश अभी उसके लिए तैयार नहीं है।

    अलबत्ता, उन्होंने शायद ही कल्पना की हो कि देश उनके ऐसा लिखने के सौ से ज्यादा वर्षों बाद इक्कीसवीं शताब्दी के छब्बीसवें साल में भी उसके लिए तैयार नहीं हो पाएगा। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह अपने नागरिकों का अपेक्षित नैतिक विकास नहीं कर पाएगा, इसलिए भी कि उसके सत्ताधीश उसे स्वराज की नैतिक पात्रता हासिल करने की तैयारियों से ही अलग कर डालेंगे।

    नई पीढ़ी यह पढ़कर चौंक सकती है, इसलिए बताना जरूरी है कि उनका मानना था कि गुलामी के हालात में संस्थान देशवासियों के नैतिक पतन का कारण बन गए हैं और उनके आत्म-नियंत्रण को कमजोर, जबकि उन पर ब्रिटिश नियंत्रण को लगातार मजबूत करते जा रहे हैं।

    महात्मा गांधी का कहना था : स्वराज के लिए सब अधीर बन रहे हैं, लेकिन वह क्या है, इस बारे में ठीक राय पर नहीं पहुंचे हैं। अंग्रेजों को निकाल बाहर करना चाहिए, यह विचार बहुतों के मुंह से सुना जाता है, लेकिन उन्हें क्यों निकालना चाहिए, इसका कोई ठीक खयाल किया गया हो, ऐसा नहीं लगता।

    उनका सवाल था कि मान लीजिए, जितना हम मांगते हैं, उतना सब अंग्रेज़ हमें दे दें, तो फिर उन्हें यहां से निकाल देने की आप क्या जरूरत समझते हैं? अगर वे (हमारे देश का) धन बाहर न ले जाएं, नम्र बन जाएं और हमें बड़े ओहदे दें तो उनके रहने में (आपको) कुछ हर्ज है?

    अपने इस सवाल के जवाब में वे खुद इस विडंबना का जिक्र करते थे कि हमें ‘अंग्रेजी’ राज्य तो चाहिए पर अंग्रेज (शासक) नहीं चाहिए। उनके  निकट इसका मतलब यह था कि आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिन्दुस्तान को अंग्रेज बनाना चाहते हैं और हिन्दुस्तान जब अंग्रेज बन जाएगा, तब वह हिन्दुस्तान नहीं कहा जाएगा, लेकिन सच्चा इंग्लिश्तान कहा जाएगा, जो और कुछ भी हो, स्वराज नहीं होगा।

    क्यों भला? उनके पाठकों के इस सवाल का जवाब उन्हीं के अनुसार यह है कि ‘स्वराज को समझना आपको जितना आसान लगता है, उतना ही मुझे मुश्किल लगता है। इसलिए फिलहाल मैं आपको इतना ही समझाने की कोशिश करूंगा कि जिसे आप स्वराज कहते हैं, वह सचमुच स्वराज नहीं है।’

    देश की ‘सामूहिक प्रवृत्ति’ उन दिनों जिस ‘पार्लियामेंटरी ढंग के स्वराज’ की प्राप्ति को अपना ध्येय  बनाए हुए थी, महात्मा गांधी की नजर में उसकी भी अनेक सीमाएं थीं, जो आज उनके समय से कहीं ज्यादा स्पष्ट होकर हमारे सामने खड़ी हैं। उनके मुताबिक पार्लियामेंटरी स्वराज की सार्थकता इस संभावना पर आश्रित है कि लोग पार्लियामेंट के लिए अच्छे से अच्छे सदस्य चुनकर भेजेंगे, जो लोगों की भलाई के लिए वहां जाएंगे और कोई तनख्वाह नहीं लेंगे। वे खुद इतने सुशिक्षित और संस्कारी होंगे कि माना जाएगा कि उनसे कोई भूल नहीं होती।

    ऐसी पार्लियामेंट हो तो महात्मा गांधी के मुताबिक न उसको अर्जी की जरूरत होनी चाहिए, न ही दबाव की। उसका काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए। लेकिन… उन्होंने पार्लियामेंट के अपने समय के जो अनुभव लिखे हैं, उनके अनुसार इस ‘आदर्श’ का दूसरा बेहद असंगत पहलू भी है : पार्लियामेंट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं और सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है। जो काम आज किया, वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियामेंट ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती।

    वह यह भी देख रहे थे कि पार्लियामेंट में बड़े सवालों की चर्चा चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं। उस पार्लियामेंट में मेम्बर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते हैं। मेम्बर जिस पक्ष के हों, उस पक्ष के लिए अपना मत बगैर सोचे-बिचारे देते हैं, देने को बंधे हुए हैं। अगर उनमें कोई मेम्बर इसका अपवाद निकल आए तो उसकी कमबख्ती ही समझिए।

    उनके इस कथन को आज के हालात से मिलाकर देखने से बात पूरी तरह साफ हो जाती है, भले ही हमारे वर्तमान ‘लोकतांत्रिक’ ढांचे में वह  ‘बहुत असुविधाजनक’ भी लगने लगे। महात्मा इस असुविधा का समाधान अपने इस दृष्टिकोण में देखते थे कि जिस कारण से रोगी बीमार हुआ हो,  वह कारण दूर कर दिया जाए तो रोगी अच्छा हो जाएगा। इसी तरह जिस कारण से हिन्दुस्तान गुलाम बना, वह कारण दूर कर दिया जाए तो वह गुलामी के बंधन से मुक्त होकर स्वराज का मार्ग प्रशस्त करने लगेगा।

    उनके ही शब्दों में  : हिन्दुस्तान के बालकों में कोई न कोई कमी थी, इसलिए उसकी सभ्यता आफतों से घिर गई। लेकिन इस घेरे से छूटने की ताकत उसमें है, जो उसके गौरव को दिखाती है।…फिर सारा हिन्नदुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है और उसके पाश में फंस गए हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी दमड़ी के नाप से नापते हैं। अगर हम गुलाम हैं तो जगत को भी गुलाम मान लेते हैं। हम कंगाल दशा में हैं, इसलिए मान लेते हैं कि सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशा में हैं। दरअसल, ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी हमारी गुलामी सारे देश की गुलामी है, ऐसा मानना ठीक है। लेकिन ऊपर की बात हम ध्यान में रखें तो समझ सकेंगे कि अपनी गुलामी मिट जाए तो हिन्दुस्तान की गुलामी मिट गई, ऐसा मान लेना चाहिए।

    उनको अपनी इस मान्यता को लेकर भी कोई संदेह नहीं था कि हम अपने ऊपर राज करें, वही स्वराज है और वह हमारी हथेली में है। उन्होंने लिखा है कि इस स्वराज को आप सपने जैसा न मानें। मन से मानकर बैठे रहने का भी यह स्वराज नहीं है। यह तो ऐसा स्वराज है कि आप ने इसका स्वाद चख लिया हो तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप जिंदगी भर कोशिश करेंगे। 

    लेकिन, इसके बरक्स ‘मुख्य बात हर व्यक्ति के स्वराज भोगने की है।’ और महात्मा गांधी के अनुसार : डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा, लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आजाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर रहें तो हम उनका समावेश यहां कर सकते हैं। अगर अपनी सभ्यता के साथ रहना चाहें तो यहां उनके लिए जगह नहीं है, ऐसी हालत पैदा करना हमारे हाथ में है।… हम अपना घर साफ करें, फिर रहने लायक लोग ही उसमें रहेंगे। दूसरे अपने आप चले जाएंगे।

    अंत में एक पते की बात। गुलामी से लड़ाई में देशवासियों के लिए उनका एक सूत्रवाक्य यह भी था कि जो चीज तवारीख में नहीं देखी, वह कभी नहीं होगी, ऐसा मानना मनुष्य की प्रतिष्ठा में अविश्वास करना है। जो बात हमारी अकल में आ सके, उसे आखिर हमें आजमाना तो चाहिए ही। …अंग्रेजों को यहां लाने वाले हम हैं और वे हमारी बदौलत ही यहां रहते हैं। आप यह कैसे भूल जाते हैं कि हमने उनकी सभ्यता अपनाई है। (और यह सभ्यता ही हमारी गुलामी का सबसे बड़ा कारण बन गई है।) इसलिए आप उनसे जो नफरत करते हैं, वह नफरत आपको उनकी उस सभ्यता से करनी चाहिए, जिसने उनको आपका शोषक बना डाला है।

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